अब ओछी राजनीति छोड़ सृजन को समर्पण की बात करो

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रचनाकारों को ओछी राजनीति छोड़ अकादेमी कार्यकारणी समिति में हुए निर्णयों का सम्मान करना चाहिए। किसी कृति पर पुरस्कार सामाजिक स्वीकृति का सामूहिक दस्तावेज होता है। उसकी गरिमा होती है जिसे बनाए रखने की जिम्मेदारी लेखकों की है। जनता के सामने आ गया है कि साहित्य क्या है और उसकी राजनीति क्या है? दो नावों पर सवार होने की बजाय पहली शर्त रचनात्मक साहित्य के प्रति समर्पण रहे तो बेहतर।
- नीरज दइया
(दैनिक भास्कर, बीकानेर / शनिवार 24 अक्टूबर, 2015 / पृष्ठ 16 पर प्रकाशित अभिमत)
यह सराहनीय है कि साहित्य अकादेमी ने बढ़ती असहिष्णुता की निंदा कर रचनाकारों की सामूहिक भावनाओं को अभिव्यक्ति किया है, साथ ही पुरस्कार वापिस ग्रहण की अपील भी अनुकरणीय है। लेखकों को भारतीय भाषाओं के वरिष्ठ रचनाकारों की भावनाओं का सम्मान करना चाहिए। उज्ज्वल पक्ष की कीर्ति और निंदनीय पक्ष का विरोध प्रदर्शन ही साहित्य का उद्देश्य रहा है, इसी की पूर्ति हेतु कलमकारों को जनभावनाओं के अनुरूप सक्रिय लेखन कर समाज के नई दिशा देने की मुहिम तेज करनी चाहिए। आज के दौर में जहां संवेदनाओं का ह्रास हो रहा है तो हमें हमारे पाठकों के भीतर भारतीयता की भावना को प्रेरित-प्रोत्साहित करने की आवश्यकता को समझना चाहिए।
- नीरज दइया
@ Navjyoti Bikaner
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