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Sunday, July 04, 2021

राजस्थानी साहित्य का व्यापक परिदृश्य : सृजन संवाद / डॉ. मंगत बादल

नीरज दइया की नई पुस्तक आई है ‘सृजन संवाद। इस पुस्तक में उनके द्वारा लिए गए कुल दस राजस्थानी साहित्यकारों के साक्षात्कार हैं जो केंद्रीय साहित्य अकादमी नई दिल्ली द्वारा पुरस्कृत हो चुके हैं। श्री कन्हैया लाल सेठिया, श्री मोहन आलोक, श्री यादवेंद्र शर्मा चंद्र’, अर्जुनदेव चारण, डॉ. कुंदन माली, मंगल बादल, श्री अतुल कनक, डॉ. आईदान सिंह भाटी, श्री मधु आचार्य, श्री बुलाकी शर्मा के साक्षात्कार समाहित हैसाथ ही सात रचनाकारों द्वारा समय-समय पर लिए गए डॉ. नीरज दइया के साक्षात्कार एवं उनका आत्मकथा भी प्रकाशित है जिससे पुस्तक की उपादेयता कुछ और बढ़ जाती है।

साक्षात्कार विधा का विकास हिंदी भाषा में अंग्रेजी भाषा से हुआ है। हालांकि संस्कृत में गुरु-शिष्य संवाद, शुक-शुकी संवाद, रामचरित मानस में की राम कथा चार वक्ताओं और चार श्रोताओं के माध्यम से आगे बढ़ती है किंतु इससे पाठक को रचनाकार के विषय में कुछ भी मालूम नहीं पड़ता जबकि साक्षात्कार के माध्यम से साक्षात्कार कर्ता रचनाकार की उन सच्चाइयों से भी रू--रू कराता है जो रचना एवं रचनाकार की पृष्ठभूमि में रह जाती है। साक्षात्कार कर्ता अपने बेधडक प्रश्नों के माध्यम से उन धुंधलके को प्रकाश में परिवर्तित कर देता है जो रचनाकार के व्यक्तित्व एवं रचना पर छाया होता है। वह अपनी बेबाक टिप्पणियों एवं निर्मम प्रश्नों के माध्यम से लेखक के भीतर उसी भांति गहरे उतर कर सत्य को तलाश कर लेता है जिस प्रकार कोई गोताखोर समुद्र से मोती। अन्य विधाओं की अपेक्षाकृत यह विधा राजस्थानी भाषा के लिए नई है। यद्यपि पत्र-पत्रिकाओं में राजस्थानी भाषा के साहित्यकारों के साक्षात्कार प्रकाशित होते रहे हैं किंतु पुस्तक रूप में यह पहला प्रयास है। यहां यह भी ध्यातव्य है कि यह पुस्तक राजस्थानी भाषा में ना होकर हिंदी में क्यों है? इसका सीधा सा मतलब है जो पाठक राजस्थानी नहीं पढ़ समझ सकते उन तक इन लेखकों का अवदान पहुंचाने का प्रयास किया गया है। कम से कम हिंदी भाषा भाषी क्षेत्रों तक इन रचनाकारों के साहित्य की जानकारी तो पहुंचे। इस दृष्टि से इस प्रयास को स्तुत्य कहा जा सकता है।

साक्षात्कार करती बार डॉ. नीरज दइया इस बात का पूरा ध्यान रखा है कि रचनाकार अपनी रचनाओं के विषय में खुलकर बतला सके तथा अपनी रचना-प्रक्रिया पर प्रकाश डाल सके। कन्हैया लाल सेठिया हों या मोहन आलोक, कुंदन माली हों या अर्जुन देव चारण सभी से बेबाकी से प्रश्न पूछे हैं। सेठिया जी से तो पुरस्कार ग्रहण न करने और फिर ग्रहण करने के प्रश्न बड़ी निर्ममता से पूछ कर यह जता दिया कि जो आलोचक संबंधों को मध्य नजर रखकर समीक्षा या आलोचना करेगा वह सफल नहीं हो सकता। हां एक बार वाह-वाही अवश्य प्राप्त कर लेता है। इसी प्रकार राजस्थानी भाषा का रचनाकार राजस्थानी के अतिरिक्त हिंदी अथवा किसी इत भाषा में भी लेखन करता है इसके प्रत्युत्तर में प्रायः सभी रचनाकारों ने प्रकाशन की अपनी-अपनी चिंता की है राजस्थानी भाषा की मान्यता को लेकर भी सवाल पूछे गए हैं तथा मान्यता मिलने के बाद की संभावनाओं पर विचार किया गया है इस प्रकार इन साक्षात्कारों से जो एक दृष्टि बनती है, वह यही कि आज राजस्थानी का रचनाकार रचना करने और भाषा की मान्यता संबंधी दो मर्चों पर एक साथ लड़ रहा है। राजस्थानी का रचनाकार अपने अस्तित्व की इस लड़ाई में साहित्य के प्रत्येक क्षेत्र की न्यूनता को पूर्णता में बदलने के लिए कटिबद्ध है तथा इसके लिए अपनी जेब से पैसे खर्च करके पुस्तकें पुस्तकें प्रकाशित करता है तथा पाठकों तक मुफ्त पहुंचाता है।

पुस्तक का प्रथम भाग अपने आस-पास शीर्षक से प्रकाशित है जबकि दूसरा भाग भीतर-बाहर और तीसरा भाग आत्मकथ्य शीर्षक से। दूसरे भाग में डॉ. नीरज दइया के सात साक्षात्कार हैं जो समय-समय पर वरिष्ठ लेखकों यथा सर्वश्री देवकिशन राजपुरोहित, नवनीत पांडे, डॉ. लालित्य ललित, राजेंद्र जोशी, डॉ. मदन गोपाल लढ़ा, डॉ. लहरी राम मीणा और राजू राम बिजारणिया द्वारा लिए गए हैं इन साक्षात्कारों में डॉ. नीरज दइया ने केवल अपने रचना-कर्म पर प्रकाश डाला है बल्कि अपने आलोचकीय दृष्टिकोण को भी साफ कर दिया है उन्होंने जता दिया है कि आलोचना कर्म में अपने-पराए की बात जो लोग करते हैं, वे बकवास करते हैं यदि आप वास्तव में साहित्यकार हैं तो आपकी नजर में साहित्य ही रहेगा, पारस्परिक संबंध नहीं आत्मकथ्य के अंतर्गत उन्होंने अपने उन दो भाषणों को प्रकाशित किया है जो बाल साहित्य की पुस्तक ‘जादू रो पेन’ और आलोचना की पुस्तक बिना हासिलपाई पर पुरस्कार ग्रहण करते हुए दिए थे इनमें उनकी ईमानदारी और मेहनत तो झलकती ही है साथ ही साथ ही अपने साहित्यकार पिता श्री सांवर दइया के प्रति प्रेम और समर्पण का भाव भी छलक-छलक पड़ता है सृजन-संवाद के लिए डॉ. नीरज दइया को शुभकामनाएं

पुस्तक का नाम : सृजन संवाद

विधा – साक्षात्कार ; संस्करण – 2020 पृष्ठ संख्या – 128 ; मूल्य – 300/- रुपए

प्रकाशक – किताबगंज प्रकाशन, सवाई माधोपुर

Wednesday, June 16, 2021

हमसफ़र : यात्राओं पर केंद्रित जीवनानुभवों का महत्त्वपूर्ण दस्तावेज

 

जीवन स्वयं में एक यात्रा है और हम जीवनपर्यंत विभिन्न माध्यमों से बाहर और भीतर अनेक यात्राएं करते हैं। ऐसी ही कुछ बाहर-भीतर की यात्राओं पर केंद्रित जीवनानुभवों का महत्त्वपूर्ण दस्तावेज है- ‘हमसफ़र’, जिसे लघुकथाओं का दस्तावेज कहा गया है। कहानीकार मुकेश पोपली ने इसे अपनी हमसफ़र कवयित्री कविता मुकेश को समर्पित किया है। भूमिका के रूप में लिखे अग्रलेख ‘मुझे कुछ कहना है...’ में लेखक का कहना है- ‘बहुत सी घटनाओं को अपनी आंखों से देखा और बहुत सी बातों, घटनाओं और रोचक किस्सों को मैंने इन छोटी-बड़ी कहानियों में समेटने की कोशिश की है।’ संग्रह की छोटी-बड़ी कहानियों को छह खंडों में व्यवस्थित रूप से प्रस्तुत किया गया है और प्रत्येक खंड में किसी न किसी यात्रा का विशेष संदर्भ है। संग्रह के आरंभिक खंड की रचनाओं में लेखक का गीत-संगीत के प्रति आकर्षण भी यहां प्रभावी रूप से देखा जा सकता है।

कहानीकार मुकेश पोपली के पास संवेदना से लबरेज भाषा के साथ कहानी कहने का अपना अंदाज है। वे यथार्थ को रोचक ढंग से प्रस्तुत करते हुए डायरी और संस्मरण विधा के करीब जाते हैं जो उन्हें कथेतर श्रेणी का लेखक भी बनाता है।कहानी और लघुकथा विधा के शास्त्रीय मानकों से इतर कुछ रचनाओं को प्रयोग के रूप में उनके साथ यात्रा संदर्भ होने से संग्रह में शामिल किया गया है।  दिल्ली, जयपुर और बीकानेर के विशेष संदर्भों से सजी इन रचनाओं में लेखक की अनेक व्यक्तिगत अनुभूतियों को आंशिक परिवर्तित कर संजोया गया है। नगर और महानगर के बीच दौड़ती भागती जिंदगी में यहां मानव मन की अनेक दुविधाओं-दुष्चिंताओं के साथ प्रेम, हर्ष, उल्लास, आशा-निराशा, संदेह-विश्वास और जीवन के प्रति प्रश्नाकुलता हमें प्रभावित करती है। कहना होगा कि ‘हमसफ़र’ संग्रह विभिन्न यात्राओं के आस-पास और साथ-साथ जन्मी कुछ खरी और सच्ची घटनाओं पर केंद्रित रचनाओं का संग्रह है। इसमें निर्भया हत्या कांड का हवाला भी है तो साथ ही सामाजिक जड़ताएं, रूढ़ियां और पिछड़पन को भी लेखक समय के प्रतिबिंबों के रूप में रेखांकित करता है।  मुकेश पोपली की पहली पुस्तक 'कहीं ज़रा सा....' (कहानी संग्रह) के प्रकाशन के एक लंबे अंतराल के पश्चात उनके इस लघुकथा संग्रह का स्वागत किया जाना चाहिए।  इस सुरुचिपूर्ण और पठनीय संग्रह को कलमकार मंच जयपुर ने प्रकाशित किया है।

डॉ. नीरज दइया


 

Thursday, May 06, 2021

प्रयोगधर्मिता रो दूजो नांव मोहन आलोक / डॉ. नीरज दइया

    डॉ. अर्जुनदेव चारण आपरी आलोचना पोथी ‘बगत री बारखड़ी’ मांय लिखै- ‘आधुनिक राजस्थानी कविता खेतर में तीन कवि कविता रै स्तर माथै कियोड़ा प्रयोगां सारू ओळखीझै। पैला प्रेमजी प्रेम, दूजा मोहन आलोक अर तीजा सांवर दइया। यूं तो ऐ कवि सन 1976 रै ऐड़ै गैड़ै राजस्थानी कविता में आपरी ओळखांण करावण लाग गिया हा पण वांरी ओळख वांरै कियोड़ा प्रयोगां सारू कीं बेसी मानीजैला।’ (पेज-133) तीनूं ई कवि आज संसार में कोनी पण बां री रचनावां रै पाण कविता जातरा मांय काव्य-प्रयोग पेटै कीरत अखंड रैवैला। 
    इणी आलेख में डॉ. चारण सवाल करै कै राजस्थानी काव्य परंपरा में छंदां री लूंठी हेमांणी रै होवता ऐ कवि उण परंपरा नै छोड परदेसी छंद क्यूं अपणाय रैया है? कांई वांरी अभिव्यक्ति री अपूरणता सूं जुडिय़ोड़ी तलास है? या वे राजस्थानी कविता नै एक नुंवौ संस्कार देवण सारू आफळ रैया है? दोनूं कारणां नै स्वीकारतां डॉ. चारण मानै कै ‘वां री आफळ सरावण जोग मानीजणी चाइजै क्यूं कै इण सूं राजस्थानी कविता रै सामाजिक सांम्ही रचनात्मकता री नुंवी बणगट परगट होई। उण कव्यानुभव नै एक नुंवै सरूप में ढळियोड़ौ देखियौ।’ (पेज-133)
    कविता रै हरेक दौर मांय काव्यानुभव न्यारा-न्यारा छंदा मांय राखीजता रैया। हरेक कवि आपरी जमीन सोधै अर परंपरा मांय कीं नवो करण री हूंस पाळै।  डॉ. पुरुषोत्तम आसोपा मुजब- ‘नूवी जमीं री तलाश सारू प्रयोग री अनिवार्यता आंकीजण लागी। आपरी परंपरावां नै जींवतो राखणो एक जुदा बात ही अर नूवी सिरजणा नै आगीनै लावणो सफा दूजी तरां री बात है। यूं भी साहित्य रै मांय परंपरावां रो निभाव प्रयोग री शर्ता माथै हीज तय हुया करै। प्रयोग रै नूवा पणां सूं हीज एक परंपरा सूं विद्रोह हुवै अर दूजी परंपरावां रो समारंभ व्हैया करै। हर टेम री नूवी काव्य चेतना बदळियोड़ी हालातां रै मांय नूवोपण लावणी चावै। ऐ कसमसीजती अनुभूत्यां प्रयोग री आधारभूमि सूं हीज अंकुरित व्हैया करै।’ (जागती जोत : सितम्बर 1987)  
    राजस्थानी आधुनिक कविता मांय जे गिणती करां तो सगळा सूं बेसी प्रयोग मोहन आलोक रै खातै।     जनकराज पारीक मुजब- ‘मोहन आलोक रै समूद सृजन संसार नै एकै साथै देखां तो ठाह पड़ै कै वै एक विराट मेधा रा असाधारण कवि है, जिण मांय नवादू अनै प्राचीन रो इसौ अद्भुत संगम है कै कोई वांनै नवीन पुरोधा कैवै, तो कोई पुरातन रो प्रबळ पखपाती।’ कवि आलोक अेक दिव्य काव्यपुरुष हा, जिण री परख महानतम कवि रै रूप में होवैला। बां आखी जूण नवी-जूनी सगळी काव्य पोथ्यां फिरोळी, बां री कविता री परिभासा ई नीं खेतर ई घणो लांबो-चौड़ो हो। वां रै करियोड़ा अनुवाद ग्रंथ इण बात री साख भरै। जुदा जुदा काव्य-रूप कवि अर अनुवाद रै रूप राजस्थानी नै सूंपणिया कवि आलोक वेळियै छंद मांय आपरै घर-परिवार री ओळखाण इण भांत करावै-
‘माया’ आण प्रथम बांध्यो ‘मुझ’,
‘चिन्ता’ जलमी तणै चित।
अति चिन्तन ‘आनन्द’ उपज्यो,
हुई तणै ‘सन्तोष’ हित॥
    अभिधा मांय आ ओळख- मुझ (कवि), माया (कवि-पत्नी), चिन्ता (बड़ी बेटी), आनन्द (बेटो) अर सन्तोष (बेटी) साम्हीं आवै। इणी छंद नै व्यंजना मांय देखां तो कवि नीति काव्य-परंपरा सूं जुड़ जावै। बरस 2003 में छप्यै कवि मोहन आलोक (1942-2021) रै कविता-संग्रै ‘चिड़ी री बोली लिखौ’ मांय लारलै पानां माथै ‘रिपियो पियो हुयो प्रथ उपर’ खंड मांय 51 वेळियो छन्द देख सकां। वेळियो छन्द पत्रिका ‘मरूगंगा’ में छप्या अर संपादक मनोहर शर्मा री टीप ही- ‘राजस्थानी भासा रो डिंगळ शैली प्रख्यात है। इण भासा शैली में प्रभूत रचनावां हुई है। ध्यान राखणो चाइजै कै आ काव्य-परम्परा आज भी प्रचलित अर लोकप्रिय है। उण लब्ध प्रतिष्ठित राजस्थानी कवी री प्रस्तुत रचना इणी शैली में विरचित है।’
    राजस्थानी साहित्य में वेलि काव्य परंपरा 11 वीं सदी रै कवि रोडा रचित ‘राउलवेल’ मानीजै। प्रिथीराज री ‘क्रिसन रुकमणी री वेलि’ घणी चावी मानीजै। आधुनिक काल मांय कवि मोहन आलोक जठै जूनै छंद-विधान माथै रचनावां करी बठै ई केई नवा छंद- डांखळा, सानेट ई राजस्थानी में थापित करिया। नवगीत रै सीगै  राजस्थानी में कवि मोहन आलोक रो काम जसजोग। बां रै नवगीतां री पैली पोथी ‘ग-गीत’ (1981) नै साहित्य अकादेमी रो मुख्य पुरस्कार ई मिल्यो। इण पोथी रो नीरज दइया रै करियोड़ो हिंदी अनुवाद साहित्य अकादेमी सूं बरस 2004 मांय साम्हीं आयो। उण पछै अकादेमी सूं बांगला भासा में अनुवाद ई छप्यो।
    आज डांखळा राजस्थानी मांय अेक काव्य-रूप थरपीज चुक्यो। मोहन आलोक आधुनिक कविता रै रसिका नै डांखळा जिसी विधा सूं पकड़्या अर सानेट जिसी गंभीर विधा तांई लेय’र गया। डांखळा नै आधुनिक कविता रो सांवठो काव्य-रूप अर धारा रूप विगसावण मांय मोहन आलोक रो मोटो नांव। अबै केई कवि डांखळा लिखै अर केई कवियां री डांखळा पोथ्यां ई छपी। खुद मोहन आलोक री तीन पोथ्यां डांखळा री आपां साम्हीं है- ‘डांखळा’ (1983), डांखळा (2012) डांखळा नॉट आउट (2021)। इत्तो ई नीं इणी डांखळा छंद नै बां पंजाबी में डक्के नांव सूं चावो करियो अर इणी नांव सूं बरस 2001 में पंजाबी में एक पोथी छप्योड़ी है। डक्के राजस्थानी पोथी रो अनुवाद कोनी। अठै आ बात ई उल्लेखजोग है कै कवि आलोक जिण विधा रा प्रणेता बणिया उण विधा नै काळजै चेप’र राखी अर डांखळो तो बां रो प्रिय छंद हो। नोनसेंस अभिव्यक्ति रै डांखळा (लिमरिक) छंद रो एक दाखलो देखां-
गादड़ै नै लूंकड़ी बावड़’र पाछी
बोली- तेरी मेरी सिकल मिलै है साची ;
गादड़ बोल्यो- चाल परै
क्यूं डी-ग्रेड करै
भेडिय़ो सो बतावती तो लागती आछी।
    डॉ. मदन गोपाल लढ़ा डांखळा बाबत लिखै- ‘आपरै मूळ में हास्य नैं अंवेरतां थकां डांखळां जीवण री विसंगतियां-विडम्बनावां नैं इण ढब चवड़ै लावै कै उणरी गूंज बिसरायां ई नीं बिसरै अर लाम्बै बगत तांई मन-मगजी में गूंजती रैवै। डांखळो बांचण रै सागै हियै रम जावै अर उणरो अरथ-अनुभव उणियारै मुळक-रूप सांचर जावै। इण दीठ संू डांखळा लोक सम्पृक्त विधावां में सै संू सिरै कथीज सकै।’ हास्य अर व्यंग्य माथै कवि मोहन आलोक री पकड़ सगळा स्वीकार करी। ‘बकरी’ कविता रो व्यंग्य-बोध जबरदस्त है।
    किण पण विधा री परंपरा मांय उण रचनाकार रो बेसी माण हुया करै जिको उण विधा रै विगसाव सारू लगोलग लिखै अर प्रयोग करै। उण री एकरसता नै बदळ’र नवा भाव अर बुणगट सारू नित नवी खेचळ करै। जे आपां कवि रै न्यारा-न्यारा छंद रूपां री बात छोड’र फगत नवी कविता पेटै ई बात करां तो आलोक री कविता मांय भाव-बुणगट रा केई प्रयोग साम्हीं आवै। विसयां री हद सूं बै बारै निसरता थका जूण सूं जुड़ी हरेक बात नै कविता मांय लावै।
    नवी कविता री रेंज मांय जिकी बात फिट नीं हुवै उण सारू जूनै काव्य-रूपां नै परोटता परहेज कोनी करै तो बात कैवण सारू बांनै किणी देसी-विदेसी छंद नै राजस्थानी में घणो लावणो रुचै। म्हैं उण सूं बंतळ करता सवाल करियो कै सानेट क्यूं लिख्या? तद बां कैयो कै जीवण रै एक छोटै से सरल अर सामान्य अनुभव नै जिकी बात नै कविता मांय कोनी कैय सकां बा सानेट मांय लिखी और कैयी जाय सकै। पैली बां आपरी पोथी ‘चित मारो दुख नै’ में सानेट खातर नांव ‘चउदसा’ राख्यो पण बरस 1991 में बां सौ सानेट पोथी रो सिरैनांव राखता उण नै छोड़ दियो। ‘सौ सानेट’ रै 67 सानेट मांय कवि री ओळ्यां देखो-
‘नवो बखत है, नया छन्द सोधणा पड़ैला
पीड़ नई है, नया बन्ध सोधणा पड़ैला।’
      कवि आलोक नवा छंद अर बंध राजस्थानी खातर कविता, कहाणी अर अनुवाद खातर सोध्या। कहाणीकार-कवि सांवर दइया सौ सानेट री भूमिका में लिख्यो- ‘कवि मोहन आलोक रा सौ सानेट जिंदगाणी रै न्यारै-न्यारै पखां रा साच उजागर करै। अठै कवि री मांयली दुनिया (रचना प्रक्रिया) अर बारली दुनिया (प्रकृति अर सामाजिक परिवेश) रा साच लाधैला।’
    आधुनिक राजस्थानी साहित्य मांय जसजोग काम करणियां हरावळ नांवां माथै बात करां तो मोहन आलोक रो लूंठो काम निगै आवै। डॉ. मंगत बादल मुजब- ‘श्री आलोक एक प्रयोगधरमी कवि है। रोज नवां प्रयोग करै। उण री कवितावां रो तर-तर विगसाव हुयो है। कठैई ठहराव या दुहराव कोनी। सत्तर बरसां री उमर में भी आज बै पूरी तरां सक्रिय है। उण रो कविता प्रेम दीवानगी री हद तांई है। जद तांई बै पूरी तरां संतुष्ट नीं हुवै कविता नै प्रकासित कोनी करै। हर बारी उण री आगली पोथी नवैं तेवर अर नवैं भाव-बोध साथै आवै।’ (राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी सूं प्रकासित विनिबंध ‘मोहन आलोक’, पेज- 8)
    कवि मोहन आलोक म्हारै एक सवाल रै जबाब में कैयो- ‘कविता लिखणो म्हारो धंधो कोनी। म्हैं कोई नियमित लेखक-कवि कोनी। अेक दिन में दस-बारै रुबाइयां लिखी अर अेक दिन में दस सानेट ई लिख्या। केई केई बार तो म्हैं दो-तीन बरसां तांई कीं कोनी लिख्यो, जाणै म्हैं कीं लिखीजण नै उडीकतो होवूं। ‘रुत बसंत भाव बहे बाहळा। क्यूं कळ-कळ कवियां कवित्त। पृथ उतरै बसंत छवि परखण। गत कवियां आत्म पवित’ सो म्हैं बसंत रुत में ई प्रयोग करिया करूं जे अेक बसंत टिपग्यो तो फेर दूजै बसंत नै उडीकतो रैवूं।’
    आलोचना अर रचना रै संबंधां नै लेय’र मोहन आलोक रो ओ सानेट घणो चावो हुयो-
ऐ आजकाल रा आलोचक श्री, ऐ छोरा
कोई कविता री, कहाणी री, एकाध मांड
’र ओळी, अर अब बणियोडा साहित्य सांड
पग चोडा कर-कर चालै जिका घणा दो’रा
आंनै बूझो जे थे साहित रो अरथ, बैठ
अर बूझौ भई! समीक्सा कांई चीज हुवै
तो ऐ कै’सी साहित्यकार री खीज हुवै
एक दूजै पर, आंरी लाधैली आ ही पैठ
ऐ इणी पैठ पर करिया करै है, गरज-गरज,
आपरी परख नूंई-सी कोई फि़ल्म देख
रात नै, दिनूगै गाणा गा-गा लिखै लेख
अर ढूंढै थारी कवितावां रै मांय तरज ।
जे आप इण री मितर-मंडळी रा सदस्य
नीं हो तो नहीं आपरै लेखन रो भविस्य ।
    महाकवि अपणै आप मांय घणो मोटो खिताब हुवै अर महाकवि उण नै कैयो जाय सकै जिको कोई महाकाव्य रचै। आधुनिक कविता री हेमाणी रूप आपां मोहन आलोक रै महाकाव्य- ‘वनदेवी : अमृता’ (2002) नै चेतै कर सकां। खेजड़ली बलिदान माथै रचीज्यै इण ग्रंथ नै सुंदरलाल बहुगुणा पर्यावरण पुराण कैयो तो राजस्थानी रै किणी कवि री पोथी में पैली बार मूळ पाठ रै साथै अंग्रेजी अनुवाद पाठ ई अठै देख सकां। प्रयोग महाकाव्य रै लक्षणां नै साधता थका भासा, भाव अर बुणगट रै स्तर माथै देख सकां।  
    ‘गोरबंद’ पत्रिका रै बरस 1988 अंक मांय ‘एकर फेरू राजियै’ नै सिरै नांव सूं कवि मोहन आलोक रो सोरठा सतक साम्हीं आयो। वैणसगाई अलंकर री सोवणी मनमोवणी छटा साथै कवि वरतमान नै लिखै-
मांणस हुयौ मसीन, कळ संगत सूं आजकल।
दुनिया हुयगी दीन, राम रयौ नीं राजिया॥
    ‘बानगी’ संग्रै रै रचना-खंड ‘खेत खेत खेजड़ी’ में खेजड़ी अर रोहिड़ै रै माहातम नै बखाणता इक्यावन परंपराऊ कुंडलिया छंदां री बानगी देखी जाय सकै। किणी छंद सूं मोहन आलोक मोहित हुय जावता। डूब’र लिखणो बां री आदत ही। जद ईस्वर नै केंद्र मांय राख’र रुबाइयां लिखण लाग्या तो ‘आप’ (2001) नांव सूं न्यारै न्यारै रूपां मांय उण निराकार नै सबदां मांय जाणै साकार करियो। एक छोटी सी पोथी फोल्डर रूप छापी। इणी पोथी री रुबाइयां नै केई नवी रुबाइयां साथै पोथी ‘बानगी’ (2011) में देख सकां। 
    बरस 2010 में छपी पोथी- ‘मोहन आलोक री कहाणियां’ (संचै : नीरज दइया) इण बा री साख भरै कै मोहन आलोक कवि जित्ता लूंठा  है उण रो बरोबर का इक्कीस कहाणीकार रूप ई काम है। बरस 1973 सूं कहाणियां लिखणी चालू करी पण पोथी नीं आवण सूं बां रै कहाणीकार रूप री चरचा कोनी हुई। संस्कृत मांय कैयो जावै- ‘गद्यं कवीनां निकषं वदन्ति’ तो आ पोथी अर ‘अभनै रा किस्सा’ (2015) मांय कवि री कसौटी गद्यकार रूप करा तो कवि री दिव्यता रो लखाव हुवै।
    ‘आप जे चावो/ कै म्हारी कविता रो/ जिको आप चावो/ बो अरथ नीसरै/ अर आप री दीठ/ म्हारी दीठ सूं/ हरभांत सूं समरथ नीसरै/ ..../ तो माफ करिया भाई!/ आप म्हारी कविता नै नई/ म्हनै बांचणो चावो हो,/ म्हारो आप सूं हळको हुवणो/ तो आप धार ई राख्यो है,/ आप तो फगत/ आपरै भारी हुवण नै/ जांचणो चावो हो।’ (बानगी : ‘म्हारी कविता’, पेज-138)
    कवि आलोक रो मानणो है कै कविता रो असर तन माथै नीं होय’र मन माथै हुवै अर कविता ई है जिकी मन री जंग खायोड़ी तलवार नै पाणी देय देय’र धार देवै। उण नै धो-पूंछ’र नवा संस्कार देवै। बां रै मुजब कविता मिनख री मा हुवै। बै कविता नै मा मान’र आखी जूण हेत करता रैया। इण हेताळू रै संसार सूं विदा हुया आज कविता री आंख्यां गीली लखावै, जाणै कविता कैवती हुवै- फेर इसो कवि कुण हुवैला।
    मोहन आलोक मरसिया परंपरा मांय चंद्रसिंह बिरकाळी अर सांवर दइया माथै आपरै मन रै भावां खातर कीं मुक्तक ई लिख्या। सांवर दइया खातर लिख्यै मोहन आलोक री आं ओळ्यां नै आज आपां खुद कवि खातर कैय सकां-
‘भासा री, थारी रवानी पिसन आई,
अर वा ही थारी-जुबानी पिसन आई।
तेड़ बुला लिन्धा, सुरगां रै स्वामी, नै
आपरी कवितावां, कहाणी, पिसन आई।’
(चिड़ी री बोली लिखो : ओळ्यूं ‘भाई सांवर दइया’ पेज-84)


Sunday, March 21, 2021

डॉ. नीरज दइया की प्रकाशित पुस्तकें :

हिंदी में-

कविता संग्रह : उचटी हुई नींद (2013), रक्त में घुली हुई भाषा (चयन और भाषांतरण- डॉ. मदन गोपाल लढ़ा) 2020
साक्षात्कर : सृजन-संवाद (2020)
व्यंग्य संग्रह : पंच काका के जेबी बच्चे (2017), टांय-टांय फिस्स (2017)
आलोचना पुस्तकें : बुलाकी शर्मा के सृजन-सरोकार (2017), मधु आचार्य ‘आशावादी’ के सृजन-सरोकार (2017), कागद की कविताई (2018), राजस्थानी साहित्य का समकाल (2020)
संपादित पुस्तकें : आधुनिक लघुकथाएं, राजस्थानी कहानी का वर्तमान, 101 राजस्थानी कहानियां, नन्द जी से हथाई (साक्षात्कार)
अनूदित पुस्तकें : मोहन आलोक का कविता संग्रह ग-गीत और मधु आचार्य ‘आशावादी’ का उपन्यास, रेत में नहाया है मन (राजस्थानी के 51 कवियों की चयनित कविताओं का अनुवाद)
शोध-ग्रंथ : निर्मल वर्मा के कथा साहित्य में आधुनिकता बोध
अंग्रेजी में : Language Fused In Blood (Dr. Neeraj Daiya) Translated by Rajni Chhabra 2018

राजस्थानी में-

कविता संग्रह : साख (1997), देसूंटो (2000), पाछो कुण आसी (2015)
आलोचना पुस्तकें : आलोचना रै आंगणै(2011) , बिना हासलपाई (2014), आंगळी-सीध (2020)
लघुकथा संग्रह : भोर सूं आथण तांई (1989)
बालकथा संग्रह : जादू रो पेन (2012)
संपादित पुस्तकें : मंडाण (51 युवा कवियों की कविताएं), मोहन आलोक री कहाणियां, कन्हैयालाल भाटी री कहाणियां, देवकिशन राजपुरोहित री टाळवीं कहाणियां
अनूदित पुस्तकें : निर्मल वर्मा और ओम गोस्वामी के कहानी संग्रह ; भोलाभाई पटेल का यात्रा-वृतांत ; अमृता प्रीतम का कविता संग्रह ; नंदकिशोर आचार्य, सुधीर सक्सेना और संजीव कुमार की चयनित कविताओं का संचयन-अनुवाद और ‘सबद नाद’ (भारतीय भाषाओं की कविताओं का संग्रह)

स्मृति में यह संचयन "नेगचार"

स्मृति में यह संचयन "नेगचार"
श्री सांवर दइया; 10 अक्टूबर,1948 - 30 जुलाई,1992

डॉ. नीरज दइया (1968)
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आंगळी-सीध

आलोचना रै आंगणै