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Thursday, May 06, 2021

प्रयोगधर्मिता रो दूजो नांव मोहन आलोक / डॉ. नीरज दइया

    डॉ. अर्जुनदेव चारण आपरी आलोचना पोथी ‘बगत री बारखड़ी’ मांय लिखै- ‘आधुनिक राजस्थानी कविता खेतर में तीन कवि कविता रै स्तर माथै कियोड़ा प्रयोगां सारू ओळखीझै। पैला प्रेमजी प्रेम, दूजा मोहन आलोक अर तीजा सांवर दइया। यूं तो ऐ कवि सन 1976 रै ऐड़ै गैड़ै राजस्थानी कविता में आपरी ओळखांण करावण लाग गिया हा पण वांरी ओळख वांरै कियोड़ा प्रयोगां सारू कीं बेसी मानीजैला।’ (पेज-133) तीनूं ई कवि आज संसार में कोनी पण बां री रचनावां रै पाण कविता जातरा मांय काव्य-प्रयोग पेटै कीरत अखंड रैवैला। 
    इणी आलेख में डॉ. चारण सवाल करै कै राजस्थानी काव्य परंपरा में छंदां री लूंठी हेमांणी रै होवता ऐ कवि उण परंपरा नै छोड परदेसी छंद क्यूं अपणाय रैया है? कांई वांरी अभिव्यक्ति री अपूरणता सूं जुडिय़ोड़ी तलास है? या वे राजस्थानी कविता नै एक नुंवौ संस्कार देवण सारू आफळ रैया है? दोनूं कारणां नै स्वीकारतां डॉ. चारण मानै कै ‘वां री आफळ सरावण जोग मानीजणी चाइजै क्यूं कै इण सूं राजस्थानी कविता रै सामाजिक सांम्ही रचनात्मकता री नुंवी बणगट परगट होई। उण कव्यानुभव नै एक नुंवै सरूप में ढळियोड़ौ देखियौ।’ (पेज-133)
    कविता रै हरेक दौर मांय काव्यानुभव न्यारा-न्यारा छंदा मांय राखीजता रैया। हरेक कवि आपरी जमीन सोधै अर परंपरा मांय कीं नवो करण री हूंस पाळै।  डॉ. पुरुषोत्तम आसोपा मुजब- ‘नूवी जमीं री तलाश सारू प्रयोग री अनिवार्यता आंकीजण लागी। आपरी परंपरावां नै जींवतो राखणो एक जुदा बात ही अर नूवी सिरजणा नै आगीनै लावणो सफा दूजी तरां री बात है। यूं भी साहित्य रै मांय परंपरावां रो निभाव प्रयोग री शर्ता माथै हीज तय हुया करै। प्रयोग रै नूवा पणां सूं हीज एक परंपरा सूं विद्रोह हुवै अर दूजी परंपरावां रो समारंभ व्हैया करै। हर टेम री नूवी काव्य चेतना बदळियोड़ी हालातां रै मांय नूवोपण लावणी चावै। ऐ कसमसीजती अनुभूत्यां प्रयोग री आधारभूमि सूं हीज अंकुरित व्हैया करै।’ (जागती जोत : सितम्बर 1987)  
    राजस्थानी आधुनिक कविता मांय जे गिणती करां तो सगळा सूं बेसी प्रयोग मोहन आलोक रै खातै।     जनकराज पारीक मुजब- ‘मोहन आलोक रै समूद सृजन संसार नै एकै साथै देखां तो ठाह पड़ै कै वै एक विराट मेधा रा असाधारण कवि है, जिण मांय नवादू अनै प्राचीन रो इसौ अद्भुत संगम है कै कोई वांनै नवीन पुरोधा कैवै, तो कोई पुरातन रो प्रबळ पखपाती।’ कवि आलोक अेक दिव्य काव्यपुरुष हा, जिण री परख महानतम कवि रै रूप में होवैला। बां आखी जूण नवी-जूनी सगळी काव्य पोथ्यां फिरोळी, बां री कविता री परिभासा ई नीं खेतर ई घणो लांबो-चौड़ो हो। वां रै करियोड़ा अनुवाद ग्रंथ इण बात री साख भरै। जुदा जुदा काव्य-रूप कवि अर अनुवाद रै रूप राजस्थानी नै सूंपणिया कवि आलोक वेळियै छंद मांय आपरै घर-परिवार री ओळखाण इण भांत करावै-
‘माया’ आण प्रथम बांध्यो ‘मुझ’,
‘चिन्ता’ जलमी तणै चित।
अति चिन्तन ‘आनन्द’ उपज्यो,
हुई तणै ‘सन्तोष’ हित॥
    अभिधा मांय आ ओळख- मुझ (कवि), माया (कवि-पत्नी), चिन्ता (बड़ी बेटी), आनन्द (बेटो) अर सन्तोष (बेटी) साम्हीं आवै। इणी छंद नै व्यंजना मांय देखां तो कवि नीति काव्य-परंपरा सूं जुड़ जावै। बरस 2003 में छप्यै कवि मोहन आलोक (1942-2021) रै कविता-संग्रै ‘चिड़ी री बोली लिखौ’ मांय लारलै पानां माथै ‘रिपियो पियो हुयो प्रथ उपर’ खंड मांय 51 वेळियो छन्द देख सकां। वेळियो छन्द पत्रिका ‘मरूगंगा’ में छप्या अर संपादक मनोहर शर्मा री टीप ही- ‘राजस्थानी भासा रो डिंगळ शैली प्रख्यात है। इण भासा शैली में प्रभूत रचनावां हुई है। ध्यान राखणो चाइजै कै आ काव्य-परम्परा आज भी प्रचलित अर लोकप्रिय है। उण लब्ध प्रतिष्ठित राजस्थानी कवी री प्रस्तुत रचना इणी शैली में विरचित है।’
    राजस्थानी साहित्य में वेलि काव्य परंपरा 11 वीं सदी रै कवि रोडा रचित ‘राउलवेल’ मानीजै। प्रिथीराज री ‘क्रिसन रुकमणी री वेलि’ घणी चावी मानीजै। आधुनिक काल मांय कवि मोहन आलोक जठै जूनै छंद-विधान माथै रचनावां करी बठै ई केई नवा छंद- डांखळा, सानेट ई राजस्थानी में थापित करिया। नवगीत रै सीगै  राजस्थानी में कवि मोहन आलोक रो काम जसजोग। बां रै नवगीतां री पैली पोथी ‘ग-गीत’ (1981) नै साहित्य अकादेमी रो मुख्य पुरस्कार ई मिल्यो। इण पोथी रो नीरज दइया रै करियोड़ो हिंदी अनुवाद साहित्य अकादेमी सूं बरस 2004 मांय साम्हीं आयो। उण पछै अकादेमी सूं बांगला भासा में अनुवाद ई छप्यो।
    आज डांखळा राजस्थानी मांय अेक काव्य-रूप थरपीज चुक्यो। मोहन आलोक आधुनिक कविता रै रसिका नै डांखळा जिसी विधा सूं पकड़्या अर सानेट जिसी गंभीर विधा तांई लेय’र गया। डांखळा नै आधुनिक कविता रो सांवठो काव्य-रूप अर धारा रूप विगसावण मांय मोहन आलोक रो मोटो नांव। अबै केई कवि डांखळा लिखै अर केई कवियां री डांखळा पोथ्यां ई छपी। खुद मोहन आलोक री तीन पोथ्यां डांखळा री आपां साम्हीं है- ‘डांखळा’ (1983), डांखळा (2012) डांखळा नॉट आउट (2021)। इत्तो ई नीं इणी डांखळा छंद नै बां पंजाबी में डक्के नांव सूं चावो करियो अर इणी नांव सूं बरस 2001 में पंजाबी में एक पोथी छप्योड़ी है। डक्के राजस्थानी पोथी रो अनुवाद कोनी। अठै आ बात ई उल्लेखजोग है कै कवि आलोक जिण विधा रा प्रणेता बणिया उण विधा नै काळजै चेप’र राखी अर डांखळो तो बां रो प्रिय छंद हो। नोनसेंस अभिव्यक्ति रै डांखळा (लिमरिक) छंद रो एक दाखलो देखां-
गादड़ै नै लूंकड़ी बावड़’र पाछी
बोली- तेरी मेरी सिकल मिलै है साची ;
गादड़ बोल्यो- चाल परै
क्यूं डी-ग्रेड करै
भेडिय़ो सो बतावती तो लागती आछी।
    डॉ. मदन गोपाल लढ़ा डांखळा बाबत लिखै- ‘आपरै मूळ में हास्य नैं अंवेरतां थकां डांखळां जीवण री विसंगतियां-विडम्बनावां नैं इण ढब चवड़ै लावै कै उणरी गूंज बिसरायां ई नीं बिसरै अर लाम्बै बगत तांई मन-मगजी में गूंजती रैवै। डांखळो बांचण रै सागै हियै रम जावै अर उणरो अरथ-अनुभव उणियारै मुळक-रूप सांचर जावै। इण दीठ संू डांखळा लोक सम्पृक्त विधावां में सै संू सिरै कथीज सकै।’ हास्य अर व्यंग्य माथै कवि मोहन आलोक री पकड़ सगळा स्वीकार करी। ‘बकरी’ कविता रो व्यंग्य-बोध जबरदस्त है।
    किण पण विधा री परंपरा मांय उण रचनाकार रो बेसी माण हुया करै जिको उण विधा रै विगसाव सारू लगोलग लिखै अर प्रयोग करै। उण री एकरसता नै बदळ’र नवा भाव अर बुणगट सारू नित नवी खेचळ करै। जे आपां कवि रै न्यारा-न्यारा छंद रूपां री बात छोड’र फगत नवी कविता पेटै ई बात करां तो आलोक री कविता मांय भाव-बुणगट रा केई प्रयोग साम्हीं आवै। विसयां री हद सूं बै बारै निसरता थका जूण सूं जुड़ी हरेक बात नै कविता मांय लावै।
    नवी कविता री रेंज मांय जिकी बात फिट नीं हुवै उण सारू जूनै काव्य-रूपां नै परोटता परहेज कोनी करै तो बात कैवण सारू बांनै किणी देसी-विदेसी छंद नै राजस्थानी में घणो लावणो रुचै। म्हैं उण सूं बंतळ करता सवाल करियो कै सानेट क्यूं लिख्या? तद बां कैयो कै जीवण रै एक छोटै से सरल अर सामान्य अनुभव नै जिकी बात नै कविता मांय कोनी कैय सकां बा सानेट मांय लिखी और कैयी जाय सकै। पैली बां आपरी पोथी ‘चित मारो दुख नै’ में सानेट खातर नांव ‘चउदसा’ राख्यो पण बरस 1991 में बां सौ सानेट पोथी रो सिरैनांव राखता उण नै छोड़ दियो। ‘सौ सानेट’ रै 67 सानेट मांय कवि री ओळ्यां देखो-
‘नवो बखत है, नया छन्द सोधणा पड़ैला
पीड़ नई है, नया बन्ध सोधणा पड़ैला।’
      कवि आलोक नवा छंद अर बंध राजस्थानी खातर कविता, कहाणी अर अनुवाद खातर सोध्या। कहाणीकार-कवि सांवर दइया सौ सानेट री भूमिका में लिख्यो- ‘कवि मोहन आलोक रा सौ सानेट जिंदगाणी रै न्यारै-न्यारै पखां रा साच उजागर करै। अठै कवि री मांयली दुनिया (रचना प्रक्रिया) अर बारली दुनिया (प्रकृति अर सामाजिक परिवेश) रा साच लाधैला।’
    आधुनिक राजस्थानी साहित्य मांय जसजोग काम करणियां हरावळ नांवां माथै बात करां तो मोहन आलोक रो लूंठो काम निगै आवै। डॉ. मंगत बादल मुजब- ‘श्री आलोक एक प्रयोगधरमी कवि है। रोज नवां प्रयोग करै। उण री कवितावां रो तर-तर विगसाव हुयो है। कठैई ठहराव या दुहराव कोनी। सत्तर बरसां री उमर में भी आज बै पूरी तरां सक्रिय है। उण रो कविता प्रेम दीवानगी री हद तांई है। जद तांई बै पूरी तरां संतुष्ट नीं हुवै कविता नै प्रकासित कोनी करै। हर बारी उण री आगली पोथी नवैं तेवर अर नवैं भाव-बोध साथै आवै।’ (राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी सूं प्रकासित विनिबंध ‘मोहन आलोक’, पेज- 8)
    कवि मोहन आलोक म्हारै एक सवाल रै जबाब में कैयो- ‘कविता लिखणो म्हारो धंधो कोनी। म्हैं कोई नियमित लेखक-कवि कोनी। अेक दिन में दस-बारै रुबाइयां लिखी अर अेक दिन में दस सानेट ई लिख्या। केई केई बार तो म्हैं दो-तीन बरसां तांई कीं कोनी लिख्यो, जाणै म्हैं कीं लिखीजण नै उडीकतो होवूं। ‘रुत बसंत भाव बहे बाहळा। क्यूं कळ-कळ कवियां कवित्त। पृथ उतरै बसंत छवि परखण। गत कवियां आत्म पवित’ सो म्हैं बसंत रुत में ई प्रयोग करिया करूं जे अेक बसंत टिपग्यो तो फेर दूजै बसंत नै उडीकतो रैवूं।’
    आलोचना अर रचना रै संबंधां नै लेय’र मोहन आलोक रो ओ सानेट घणो चावो हुयो-
ऐ आजकाल रा आलोचक श्री, ऐ छोरा
कोई कविता री, कहाणी री, एकाध मांड
’र ओळी, अर अब बणियोडा साहित्य सांड
पग चोडा कर-कर चालै जिका घणा दो’रा
आंनै बूझो जे थे साहित रो अरथ, बैठ
अर बूझौ भई! समीक्सा कांई चीज हुवै
तो ऐ कै’सी साहित्यकार री खीज हुवै
एक दूजै पर, आंरी लाधैली आ ही पैठ
ऐ इणी पैठ पर करिया करै है, गरज-गरज,
आपरी परख नूंई-सी कोई फि़ल्म देख
रात नै, दिनूगै गाणा गा-गा लिखै लेख
अर ढूंढै थारी कवितावां रै मांय तरज ।
जे आप इण री मितर-मंडळी रा सदस्य
नीं हो तो नहीं आपरै लेखन रो भविस्य ।
    महाकवि अपणै आप मांय घणो मोटो खिताब हुवै अर महाकवि उण नै कैयो जाय सकै जिको कोई महाकाव्य रचै। आधुनिक कविता री हेमाणी रूप आपां मोहन आलोक रै महाकाव्य- ‘वनदेवी : अमृता’ (2002) नै चेतै कर सकां। खेजड़ली बलिदान माथै रचीज्यै इण ग्रंथ नै सुंदरलाल बहुगुणा पर्यावरण पुराण कैयो तो राजस्थानी रै किणी कवि री पोथी में पैली बार मूळ पाठ रै साथै अंग्रेजी अनुवाद पाठ ई अठै देख सकां। प्रयोग महाकाव्य रै लक्षणां नै साधता थका भासा, भाव अर बुणगट रै स्तर माथै देख सकां।  
    ‘गोरबंद’ पत्रिका रै बरस 1988 अंक मांय ‘एकर फेरू राजियै’ नै सिरै नांव सूं कवि मोहन आलोक रो सोरठा सतक साम्हीं आयो। वैणसगाई अलंकर री सोवणी मनमोवणी छटा साथै कवि वरतमान नै लिखै-
मांणस हुयौ मसीन, कळ संगत सूं आजकल।
दुनिया हुयगी दीन, राम रयौ नीं राजिया॥
    ‘बानगी’ संग्रै रै रचना-खंड ‘खेत खेत खेजड़ी’ में खेजड़ी अर रोहिड़ै रै माहातम नै बखाणता इक्यावन परंपराऊ कुंडलिया छंदां री बानगी देखी जाय सकै। किणी छंद सूं मोहन आलोक मोहित हुय जावता। डूब’र लिखणो बां री आदत ही। जद ईस्वर नै केंद्र मांय राख’र रुबाइयां लिखण लाग्या तो ‘आप’ (2001) नांव सूं न्यारै न्यारै रूपां मांय उण निराकार नै सबदां मांय जाणै साकार करियो। एक छोटी सी पोथी फोल्डर रूप छापी। इणी पोथी री रुबाइयां नै केई नवी रुबाइयां साथै पोथी ‘बानगी’ (2011) में देख सकां। 
    बरस 2010 में छपी पोथी- ‘मोहन आलोक री कहाणियां’ (संचै : नीरज दइया) इण बा री साख भरै कै मोहन आलोक कवि जित्ता लूंठा  है उण रो बरोबर का इक्कीस कहाणीकार रूप ई काम है। बरस 1973 सूं कहाणियां लिखणी चालू करी पण पोथी नीं आवण सूं बां रै कहाणीकार रूप री चरचा कोनी हुई। संस्कृत मांय कैयो जावै- ‘गद्यं कवीनां निकषं वदन्ति’ तो आ पोथी अर ‘अभनै रा किस्सा’ (2015) मांय कवि री कसौटी गद्यकार रूप करा तो कवि री दिव्यता रो लखाव हुवै।
    ‘आप जे चावो/ कै म्हारी कविता रो/ जिको आप चावो/ बो अरथ नीसरै/ अर आप री दीठ/ म्हारी दीठ सूं/ हरभांत सूं समरथ नीसरै/ ..../ तो माफ करिया भाई!/ आप म्हारी कविता नै नई/ म्हनै बांचणो चावो हो,/ म्हारो आप सूं हळको हुवणो/ तो आप धार ई राख्यो है,/ आप तो फगत/ आपरै भारी हुवण नै/ जांचणो चावो हो।’ (बानगी : ‘म्हारी कविता’, पेज-138)
    कवि आलोक रो मानणो है कै कविता रो असर तन माथै नीं होय’र मन माथै हुवै अर कविता ई है जिकी मन री जंग खायोड़ी तलवार नै पाणी देय देय’र धार देवै। उण नै धो-पूंछ’र नवा संस्कार देवै। बां रै मुजब कविता मिनख री मा हुवै। बै कविता नै मा मान’र आखी जूण हेत करता रैया। इण हेताळू रै संसार सूं विदा हुया आज कविता री आंख्यां गीली लखावै, जाणै कविता कैवती हुवै- फेर इसो कवि कुण हुवैला।
    मोहन आलोक मरसिया परंपरा मांय चंद्रसिंह बिरकाळी अर सांवर दइया माथै आपरै मन रै भावां खातर कीं मुक्तक ई लिख्या। सांवर दइया खातर लिख्यै मोहन आलोक री आं ओळ्यां नै आज आपां खुद कवि खातर कैय सकां-
‘भासा री, थारी रवानी पिसन आई,
अर वा ही थारी-जुबानी पिसन आई।
तेड़ बुला लिन्धा, सुरगां रै स्वामी, नै
आपरी कवितावां, कहाणी, पिसन आई।’
(चिड़ी री बोली लिखो : ओळ्यूं ‘भाई सांवर दइया’ पेज-84)


Sunday, March 21, 2021

Monday, March 15, 2021

कविताओं में ईश्वर होने के मायने की तलाश / डॉ मदन गोपाल लढ़ा

सुप्रसिद्ध कवि एवं संपादक सुधीर सक्सेना अपनी रचनात्मकता के साथ-साथ यायावरी के लिए भी जाने जाते हैं। उन्होंने एक यायावर के रूप में दुनिया को जोड़ने का कार्य किया है। डॉ. नीरज दइया ने अनुवाद के माध्यम से उनकी कविताई को राजस्थानी भाषा से जोड़ दिया है। सुधीर सक्सेना की प्रतिनिधि कविताओं के संग्रह ’अजेस ई रातो है अगूण’ के बाद अब उनके कविता संग्रह ’ईश्वर: हां, नीं...तो’ का राजस्थानी अनुवाद के रूप में आना बहुत सुखद है। यह राजस्थानी मिट्टी की तासीर ही है कि अब सुधीर सक्सेना किसी दूसरी भाषा के कवि नहीं लगते बल्कि ठेठ राजस्थानी कवि के रूप अपनी उपस्थिति दर्ज करवाते हैं। एक कवि का भाषायी दायरों को लांघकर इस तरह पाठक-मन में जगह बनाना अनुवाद व कविताई की साख बढ़ाने वाला है।

ईश्वर को लेकर दुनिया भर की भाषाओं में इतना कुछ लिखे जाने के बाद भी वह अज्ञात-अगोचर है। यह दुनिया किसने बनाई है तथा इसका संचालन करने वाला कौन है? वह कौन है जो अनगिनत जीवों में जीवन-ऊर्जा भरता है? वह कौन है जो फूल-पत्तियों में विभिन्न रंगों के रूप में खिलता है। जन्म से पहले व मृत्यु के बाद के जीवन व सृष्टि के गूढ़ रहस्यों को जानने की आदिम आकांक्षा अनादिकाल से मानव-मन को मथती रही है। इसी जिज्ञासा की काव्यात्मक अभिव्यक्ति है आलोच्य कविता संग्रह ’ईस्वरः हां, नीं...तो’। इन कविताओं में कवि ने परम सत्ता के साथ सीधा संवाद स्थापित किया है। कभी वह ईश्वर से सवाल करता है तो कभी ईष्वरीय सत्ता की चिन्ताओं में सहभागी बनता है। कहीं ईश्वर के तौर-तरीकों से नाराज हो जाता है तो कहीं उससे प्रार्थना करने लगता है। खास बात यह है कि सुधीर सक्सेना का ईश्वर किसी पंथ विशेष या कर्मकाण्ड के बंधनों में बंधा हुआ नहीं है। वह इन सबसे ऊपर व सर्वव्यापक है। ईश्वर के दुखों का हिसाब संभवत- हिन्दी की समकालीन कविता में पहली बार ही लिखा गया होगा- “माई लाई मांय थे ई नापाम सूं दागीज्या/हिरोशिमा में हिवाकुशा दांई/रेडियोधर्मिता सूं घायल/ईस्वर/आजै तांई थांरै दुखां रो छेड़ो कोनी / कै हिंसाळू अर अराजक बगत है ओ“। यहाँ कभी कवि ईश्वर के अथाह दुखों के निवारण की अरदास करता है तो कभी उसके अकेलेपन को तोड़ने की चिंता करता है। इससे भी आगे बढ कर वह ईश्वर के लिए एक आचार-संहिता लिखी जाने को जरुरी समझता है। कहना न होगा, इन कविताओं का आत्मीयतापूर्ण पाठ पाठक को एक ऐसे भाव-लोक में ले जाता है जहाँ ईश्वर अपनी अलौकिकता से बाहर निकलकर उसके बराबर खड़ा महसूस होता है। कविताओं से गुजरने के बाद भी उनकी अनुगूँज पाठक के मन में बनी रहती है जो किसी भी काव्य-रचाव की सफलता का एक निकष कहा जा सकता है। निष्चय ही यह गूँज ही कवि के बहाने हर संवेदनशील व्यक्ति के मन में उठने वाले ऐसे सवालों का उत्तर खोजने का मार्ग प्रशस्त करती है।
एक अनुवादक के लिए यह सबसे बड़ी चुनौती होती है कि वह मूल रचना की आत्मा को ठेस पहुँचाए बिना इतनी खूबसूरती के साथ भाषांतर करें कि पाठक को पता ही न चलें। इन कविताओं को पढ़ते समय लगता कि हम राजस्थानी में मौलिक रचाव को बांच रहे हैं। निश्चित रूप से इसके लिए अनुवादक के साथ डॉ.नीरज दइया का समर्थ कवि-मन श्रेय का हकदार है। प्रसिद्ध कथाकार बुलाकी शर्मा की यह बात सोलह आना खरी है कि जो कवि और अनुवादक है वह उन रचनाओं को अपनी भाषा के पाठकों तक पहुँचाना जरूरी समझता है जो उस भाषा के कथ्य, बुणगट व चिंतन आदि के स्वरूप के बारे में नए तरीके से सोचने के लिए विवष करें। मायड़ भाषा के चर्चित कथाकार-पत्रकार मनोज कुमार स्वामी को समर्पित इस कविता संग्रह से राजस्थानी अनुवाद का सफरनामा दो फलांग आगे बढ़ा है इसमें संदेह नहीं है। प्रफुल्ल पळसुलेदेसाई के मनमोहक आवरण चित्र व गौरीशंकर आचार्य की लाजवाब साज सज्जा के साथ बेहतरीन छपाई-बंधाई वाली इस कृति को पाठकों तक पहुंचाने के लिए सूर्य प्रकाशन मंदिर साधुवाद का अधिकारी है।
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'ईस्वर: हां, नीं..तो' (सुधीर सक्सेना की कविताओं का राजस्थानी अनुवाद) अनुवादक: नीरज दइया, सूर्य प्रकाशन मंदिर, बीकानेर, प्रथम संस्करण 2021, पृष्ठ 80, मूल्य 200₹
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डॉ मदन गोपाल लढ़ा

Sunday, March 14, 2021

प्यास के मरुथल का इतिहास / डॉ. नीरज दइया

मनुष्य-जीवन किसी तिलस्मी पहेली की भांति अनादिकाल से चुनौतीपूर्ण विषय रहा है। जीवन की महायात्रा कब से चल रही है? जीवन का गूढ़ रहस्य क्या है? इसके अनेक उतार-चढ़ाव और झंझावात हैं तो यह कितने यथार्थ और काल्पनिकता का मिश्रण है। सच-झूठ और सुख-दुख का लंबा इतिहास है फिर से यह मन किससे पूछे और यह पूछना भी कितना सार्थक है। निर्थकता के बीच असार जीवन में सार की दिशा हमें ज्ञात भी है अथवा हम अज्ञात दिशाओं में जीवन भर भ्रमित होते रहते हैं। ऐसी ही कुछ पृष्ठभूमि लिए और अपने पूरे विषय को गहना से समेटती हुई डॉ. मंगत बादल की यह काव्य-कृति- ‘साक्षी रहे हो तुम’ अनुपम रचना है। इस में कवि ने अनंत जीवन के गूढ़ रहस्य को बहुत सधी हुई भाषा में जानने-समझने का पुनः पुनः काव्यात्मक उपक्रम किया है। इसे एक काव्य-प्रयोग कहना अधिक उचित होगा। आरंभिक पंक्तियां देखें-
हे अनंत! हे काल!
महाकाल हे!
हे विराट!
यह महायात्रा चल रही कब से
नहीं है जिसका प्रारंभ
मध्य और अंत
केवल प्रवाह...
प्रवाह!
यह रचना इसी प्रवाह और निरंतर प्रवाह में स्वयं कवि के साथ अपने पाठकों को भी प्रवाहित और प्रभावित करते हुए चलती है। इसे एक संबोधन काव्य कहना उचित होगा। यह निसंदेह अनंत, काल, महाकाल और विराट को संबोधित है किंतु इन सभी के अंशी आत्म रूपा हमारी आत्मा को भी प्रकारांतर से संबोधित काव्य है। कवि ने ज्ञान, विज्ञान और इतिहास की विभिन्न अवधारणाओं का न केवल स्पर्श किया है वरन उन विराट अवधारणाओं को विराट रूप में ग्रहण करते हुए हमें इस संबंध में अनेक विकल्पों के साथ अपने उत्स के प्रश्न से जूझने और जानने की अकुलाहट-बेचैनी और गहन त्रासदी के भंवर में खड़े होने और खड़े रहने का आह्वान किया है। यह एक भांति से हमारा आत्म-साक्षात्कार है। इसमें प्रकृति के विविध अंगों-उपांगों में कवि के साथ पाठक भी अपने परिचय और पहचान को ढूंढ़ते हुए अपनी महायात्रा में उमड़ते हुए जैसे बरसने लगता है। इस महायात्रा के विषय में यह पंक्ति इसके विस्तार को जैसे शब्दबद्ध करतीं हुई भले हमारी गति के विषय में संदेह देती है किंतु विचार को एक दिशा देती है। यह रचना एक प्यास है और जो प्यास के मरुस्थल का इतिहास अपनी समग्रता-सहजता में अभिव्यक्त करती है।
गगन, पावक, क्षिति, जल
और फिर
चलने लगे पवन उनचास
निःशब्द से शब्द
आत्म से अनात्म
सूक्ष्म से स्थूल
अदृश्य से दृश्य
भावन से विचार की ओर।
निशब्द से शब्द, आत्म से अनात्म, सूक्ष्म से स्थूल, दृश्य से अदृश्य अथवा भावना से विचार का यह एक लंबा गीत है। पाठक प्रश्नाकुल होकर इस दिशा में विचार करने लगता है कि वास्तव में जीवन का रहस्य क्या है? आत्मीय स्पर्श से भरपूर यह एक कवि का आत्मा-संवाद है और इसमें कवि की स्थिति में पाठक का पहुंचना इसकी सार्थकता है। यह छोटे मुंह से बहुत बड़ा सवाल है कि पृथ्वी को गति कौन देता है? हमारी गति और पृथ्वी की गति के मध्य सापेक्षता के विषय में विचार होना चाहिए। असीम के बीच हमारी मानव जाति की सीमाओं के संबंध में यह भले नया विचार ना हो किंतु इस कठिन डगर पर चलना भी बेहद कठिन है। एक आदिम प्रश्न को लेकर उसको नई कविता के शिल्प में पाठकों को बांधते हुए निरंतर किसी दिशा में प्रवाहित होना अथवा प्रवाहित किए रखना एक कौशल है जिसे कवि डॉ. मंगत बादल की निजी उपलब्धि कहना होगा। कवि कहता है-
साक्षी रहे हो तुम
इन सब के होने के
पुनः लौट कर
बिंदु में सिंधु के
तुम ही तो हो
ब्रह्मा, स्रष्टा, प्रजापति, रचयिता
पालन कर्त्ता विष्णु
तुम ही आदिदेव
देवाधिदेव! शिव!
त्रिदेव! हे प्रणवाक्षर!
यह एक प्रार्थना गीत भी है जो स्वयं की तलाश में जैसे भटकते भटकते कहीं पहुंचने को व्याकुल और आतुर है। हमारे धार्मिक मिथकों और विश्वासों के बीच अपने होने और न होने के विषय पर चिंतन करते हुए यहां कवि की निरंतर अभिलाषा अभिव्यक्त हुई है कि वह किसी बिंदु पर स्थिर हो जाए। अनेक बिंदुओं और अनेक धाराओं के बीच किसी एक दिशा में कोई कैसे प्रवाहित रह सकता है। प्रकृति के एक अंश के रूप में यह किसी अनाम और नाम के जाल में उलझे एक वनफूल का अपने पूरे रहस्यमयी पर्यावरण से प्रश्न है।
कौन है मेरे होने
या नहीं हूंगा तब
कारण दोनों का
साक्षी हो तुम, बोलो!
रहस्य पर पड़े आवरण खोलो!
यहां कर्म और भाग्य फल के साथ मनुष्य जीवन के अनेक स्मरण है जिसमें आत्मा और अनात्मा के बीच अस्थित्ववाद और चेतन-अचेतन के द्वारों को खटकाते हुए अनेक रंग बिखरे हुए हैं। यह अपने अर्थ को अर्थ की दीवारों की परिधि से बाहर झांकने का सबल प्रयास है।
आत्मा भी क्या
आकार कर धारण
शब्द का कहीं
बैठी है
अर्थ की दीवारों के पार?
इस कृति की आत्मीयता और विशिष्टता का प्रमाण यह भी है कि कवि ने अध्ययन-मनन-चिंतन द्वारा विभिन्न अवधारणाओं से ना केवल परिचित करते हुए अपने द्वंद्व व्यंजित किए है वरन उन सब में हमारे भी प्रश्नाकुलित मन को शामिल किया है। यहां परंपरा और मिथकों की साक्षी में कर्म और भाग्य के अनेक प्रश्न बहुत सुंदर ढंग से प्रस्तुत हुए हैं। आत्मा-परमात्मा, विनाश-महाविनाश के बाद फिर-फिर जीवन की अवधारणा के विभिन्न स्तर यहां प्रभावित करने वाले हैं। आत्मा और शरीर के मध्य क्या और कैसा संबंध है इसकी झलक देखना जैसे कवि का एक उद्देश्य रहा है। यह पग-पग पर संदेह और भटकाव का अहसास भी है तो कुछ पाने की छटपटाहट भी, इसलिए कवि ने कहा है-
मृत्यु-भीत मानव का
बैद्धिक-विलास
कोरा वाग्जाल मृगजल...
या प्रयास यह उसे जानने का
समा गया जो
गर्भ में तुम्हारे
छटपटा रहा किंतु
मनुष्य के
ज्ञान के घेरों में आने को।
जीवन और मृत्यु के दो छोरों के बीच यह गति अथवा किसी ठहराव, भटकन को उल्लेखित करती पूरी कविता जैसे नियति और जीवन को बारंबार परिभाषित करती है। यहां कवि की कामना है कि प्रत्येक जीवन अपने आप में परिपूर्ण और उद्देश्यपूर्ण हो।
अस्तु यह कृति जाग और नींद के मध्य एक पुल निर्मित कर जड़ और चेतना के बीच बिलखती काव्य-आत्मा का ही प्रलाप और हाहाकार है। यह अपनी हद में अनहद की यात्रा है। यह प्रकाश और अंधकार के बीच अपनी नियति की तलाश है- ‘अंधकार का अंश होना ही / क्या अंतिम नियति है मेरी?’ अथवा ‘बदल जाएंगी भूमिकाएं / हम सब की / बदल जाएगा यह रंगमंच / नहीं बदलोगे केवल तुम!’
यह जीवन हमारा जागरण है अथवा पूरा जीवन ही एक निद्रा है। यह रहस्य वह सर्वज्ञ ही जानता है जिसने इस जटिल मार्ग पर चलने की कवि को प्रेरणा दी है। अकूत संभावनाओं से भरे इस पूरे इतिवृत्त को ‘काल महाकाव्य’ के रूप में परिभाषित किया जा सकता है। हमारे रचयिता के संबंध में यह एकालाप अथवा प्रलाप ‘मनुष्य’ को जानने-समझने का अनूठा उपक्रम है। किसी तयशुदा निकस पर कवि हमें नहीं ले कर जाता वरन वह जीवन के रहस्य को पहचानने का अलग अलग बिंदुओं दृष्टिकोणों से आह्वान करता है। इस रूप में यह काव्य-रचना एक आह्वान-गीत भी है कि हम स्वयं को जाने, हम क्या हैं? इसका पाठ अपने आत्म और उत्स के अनेक आयामों को खोजना और सांसारिक सत्यों के साथ आत्म-साक्षात्कार करना तो है ही, साथ ही साथ जन्म-मरण और पुनर्जन्म की अबूझ पहेली में उतराना-डूबना, फिर-फिर उतराना-डूबना भी है। निसंदेह यह रचना दीर्घ कविता के क्षेत्र में अपनी विषय-वस्तु, शिल्प-संरचना और भाषा-पक्ष के लिए लंबे समय तक एक उपलब्धि के रूप में स्मरण की जाएगी।
- डॉ. नीरज दइया 


डॉ. नीरज दइया की प्रकाशित पुस्तकें :

हिंदी में-

कविता संग्रह : उचटी हुई नींद (2013), रक्त में घुली हुई भाषा (चयन और भाषांतरण- डॉ. मदन गोपाल लढ़ा) 2020
साक्षात्कर : सृजन-संवाद (2020)
व्यंग्य संग्रह : पंच काका के जेबी बच्चे (2017), टांय-टांय फिस्स (2017)
आलोचना पुस्तकें : बुलाकी शर्मा के सृजन-सरोकार (2017), मधु आचार्य ‘आशावादी’ के सृजन-सरोकार (2017), कागद की कविताई (2018), राजस्थानी साहित्य का समकाल (2020)
संपादित पुस्तकें : आधुनिक लघुकथाएं, राजस्थानी कहानी का वर्तमान, 101 राजस्थानी कहानियां, नन्द जी से हथाई (साक्षात्कार)
अनूदित पुस्तकें : मोहन आलोक का कविता संग्रह ग-गीत और मधु आचार्य ‘आशावादी’ का उपन्यास, रेत में नहाया है मन (राजस्थानी के 51 कवियों की चयनित कविताओं का अनुवाद)
शोध-ग्रंथ : निर्मल वर्मा के कथा साहित्य में आधुनिकता बोध
अंग्रेजी में : Language Fused In Blood (Dr. Neeraj Daiya) Translated by Rajni Chhabra 2018

राजस्थानी में-

कविता संग्रह : साख (1997), देसूंटो (2000), पाछो कुण आसी (2015)
आलोचना पुस्तकें : आलोचना रै आंगणै(2011) , बिना हासलपाई (2014), आंगळी-सीध (2020)
लघुकथा संग्रह : भोर सूं आथण तांई (1989)
बालकथा संग्रह : जादू रो पेन (2012)
संपादित पुस्तकें : मंडाण (51 युवा कवियों की कविताएं), मोहन आलोक री कहाणियां, कन्हैयालाल भाटी री कहाणियां, देवकिशन राजपुरोहित री टाळवीं कहाणियां
अनूदित पुस्तकें : निर्मल वर्मा और ओम गोस्वामी के कहानी संग्रह ; भोलाभाई पटेल का यात्रा-वृतांत ; अमृता प्रीतम का कविता संग्रह ; नंदकिशोर आचार्य, सुधीर सक्सेना और संजीव कुमार की चयनित कविताओं का संचयन-अनुवाद और ‘सबद नाद’ (भारतीय भाषाओं की कविताओं का संग्रह)

स्मृति में यह संचयन "नेगचार"

स्मृति में यह संचयन "नेगचार"
श्री सांवर दइया; 10 अक्टूबर,1948 - 30 जुलाई,1992

डॉ. नीरज दइया (1968)
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आंगळी-सीध

आलोचना रै आंगणै