Saturday, October 10, 2015

सांवर दइया का अविस्मरणीय और विस्मयकारी साहित्यिक अवदान

नवनीत पाण्डे
      राजस्थान से जिस तरह रांगेय राघव हिन्दी में उसी तरह सांवर दइया राजस्थानी कहानी, कविता एवं व्यंग्य साहित्य में एक पुंज एक युग के रूप में सदा स्मरणीय है। यदि इस संसार की कोई नियामक शक्ति है और वह हमारी उम्र का हिसाब रखती है तो कहना होगा कि बहुत कम उम्र लिखा के इस धरा पर सांवर दइया आए, लेकिन इतना कुछ कर गए कि जिसके लिए एक उम्र भी कम पड़ जाती है। उनका जन्म 10 अक्टूबर 1948, बीकानेर में हुआ और वे मात्र 42 की उम्र में इस लौकिक दुनिया से कूच कर गए। उनकी सृजन-यात्रा का समापन 30 जुलाई 1992 उन के निधन के साथ ही असमय हो गया किंतु जो रचता है वह बचता है। एक सुखद संयोग हर रचनाकार के साथ नहीं होता किंतु सांवर दइया ने अपने जीवनकाल में बड़े बेटे नीरज को साहित्यिक संस्कार दिए और उसी के बल पर वह आज अपनी पीढ़ी में सर्वाधिक चर्चित और उल्लेखनीय रचनाकार के रूप में विख्यात है।
      सांवर दइया की अधूरी सृजन-यात्रा को काफी हद तक एक मुकाम पर लाने के प्रयासों में डॉ. नीरज दइया की पितृ-भक्ति कही जा सकती है कि उनके अप्रकाशित साहित्य को प्रकाश में लाने का श्रमसाध्य कार्य कर दिखाया। राजस्थानी-हिन्दी दोनों भाषाओं में समानाधिकार से सांवर दइया ने अपने जीवनकाल में लेखनी का जौहर दिखाया तो वे राजस्थानी में कहानी-प्रयोग, हाइकू एवं व्यंग्य विधा के लिए विशेष चर्चित रहे। कहना ना होगा कि राजस्थानी व्यंग्य को न केवल प्रतिष्ठित किया अपितु उनकी ऊंचाई तक आज तक कोई राजस्थानी व्यंग्यकार नहीं पहुंच सका है। पेशे से शिक्षक के रूप में जुड़े दइया का अधिकतम कहानी लेखन अपनी ही शिक्षक बिरादरी और घर-परिवार के इर्द- गिर्द रहा। उनका मानना भी था कि जो दुनिया मेरी अपनी है जिस दुनिया को देखा-भोगा है उसे ही कोई रचनाकार प्रमाणिक ढंग से अभिव्यक्त कर सकता है। साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली से पुरस्कृत उनके राजस्थानी कहानी संग्रह ‘एक दुनिया म्हारी’ की दस कहानियों में हमें अध्यापकों की ही उनकी जानी-पहचानी दुनिया का बेहद प्रमाणिकता के साथ साक्षात होता है। गोविंद से भी श्रेष्ठ कहे जाने वाले गुरु की निजी दुनिया की बेरंग होती दुनिया का दस्तावेज है ‘एक दुनिया म्हारी’ जिसका हिंदी अनुवाद साहित्य अकादेमी द्वारा ‘एक दुनिया मेरी’ भी शीर्षक से प्रकाशित है।
      सांवर दइया के सात कहानी संग्रह- असवाड़ै-पसवाड़ै 1975 (तीन पुरस्कारों से सम्मानित) धरती कद तांई घूमैली 1980 (राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी, बीकानेर से गद्य पुरस्कार) एक दुनिया म्हारी 1984  (साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली से सर्वोच्चय पुरस्कार) एक ही जिल्द में 1987, पोथी जिसी पोथी 1996 (निधनोपरांत), छोटा-छोटा सुख-दुख (राजस्थानी में अप्रकाशित कहानी संग्रह- प्रेस में) एक दुनिया मेरी भी (हिन्दी अनुवाद) के अलावा उकरास 1991 (संपादन); छ: कविता संग्रह- मनगत (लघु कविताएं) 1976, काल अर आज रै बिच्चै (दो संस्करण 1977, 1982), आखर री औकात (हाइकू संग्रह), आखर री आंख सूं (दो संस्करण 1988, 1990), हुवै रंग हजार 1993 (निधनोपरांत) राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी, बीकानेर से ‘गणेशीलाल व्यास उस्ताद पद्य पुरस्कार’ से सम्मानित, आ सदी मिजळी मरै 1996 (निधनोपरांत) पंचलड़ी कविताओं का संग्रह एवं एक व्यंग्य संग्रह इक्यावन व्यंग्य 1996 (निधनोपरांत) राजस्थानी तथा हिन्दी-साहित्य के अंतर्गत दर्द के दस्तावेज (ग़ज़ल संग्रह), उस दुनिया की सैर के बाद 1995 (कविता संग्रह निधनोपरांत) के अलावा स्टेच्यू 2000 (अनुवाद) अनिल जोशी के गुजराती निबंधों का राजस्थानी अनुवाद साहित्य अकादेमी से प्रकाशित (निधनोपरांत) है।
              डॉ. नीरज दइया के अनुसार उनके पिता की पांडुलिपियों में दो बड़े उपन्यासों को देखकर जब उन्होंने अपने पिता से पूछा कि इनको प्रकाशित क्यों नहीं करवाते, सांवर दइया का जबाब था कि ये तो हाथ साफ करने के लिए लिखें थे। राजस्थानी में विलक्ष्ण प्रतिभा के धनी सांवर दइया ने कहानी के नाम पर लिखी जा रही लोककथाओं को साफ कर आधुनिक और नई कहानी की स्थापना की। उनकी कहानियों के अनुवाद सारिका, जनसत्ता एवं साप्ताहिक हिंदुस्तान जैसी प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए तो साथ ही अनेक रचनाओं के गुजराती, मराठी, तमिल, मलयालम, अंग्रेजी आदि भाषाओं में भी हुए हैं।
      वे राजस्थान शिक्षा विभाग की पत्रिका ‘शिविरा’ और ‘नया शिक्षक’ पत्रिकाओं का संपादन करने के अलावा अपने समकालीन रचनाकारों को सदा प्रेरित-प्रोत्साहित किया करते थे। राजस्थान साहित्य अकादेमी, मारवाड़ी सम्मेलन मुम्बई, राजस्थानी ग्रेजुएट नेशनल सर्विस ऐसोसिएशन मुम्बई, राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी सहित अनेक साहित्यिक संस्थाओं से पुरस्कृत एवं सम्मानित होने के उपरांत भी उनकी साहित्यिक साधना को देखते हुए लगता है कि असल में वे पुस्कारों को ग्रहण कर पुरस्कारों को सम्मानित करते रहे। इतनी कम उम्र में इतनी अधिक उपलब्धियां हासिल करनेवाले सांवर दइया आज हमारे बीच होते तो निश्चय ही राजस्थानी साहित्य भण्डार न जाने कितना समृध्द होता और वे इसे किस शिखर तक पहुंचाते। उनकी जयंती पर उनके अविस्मरणीय और विस्मयकारी अवदान को शत-शत नमन!
·         नवनीत पाण्डे, 2 डी -2, पटेल नगर, पवनपुरी, बीकानेर-334003
 

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