Sunday, October 11, 2015

“पाछो कुण आसी” लोकार्पण-समारोह

कवि-कथाकार स्व. सांवर दइया की जयंती पर “पाछो कुण आसी” का लोकार्पण
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नीरज की कविताएं प्रेम की कोमल अनुभूतियों का गुलदस्ता है
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बीकानेर/10 अक्टूबर/ सुप्रसिद्ध कवि-कथाकार स्व. सांवर दइया की जयंती के अवसर पर मुक्ति संस्था के तत्वावधान में महाराजा नरेन्द्र सिंह ऑडिटोरियम में कवि आलोचक डा. नीरज दइया के काव्य संग्रह ”पाछो कुण आसी” का लोकार्पण किया गया।
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि डा. आईदान सिंह भाटी ने लोकार्पित कृति की कविताओं की चर्चा करते हुए कहा कि आज के समकालीनता और विकास के दौर में नीरज की कविताएं स्वाभिमान में साथ इंसानियत को बचाने तथा अपने होने का अहसास कराती है। भाटी ने कहा कि उत्तरआधुनिकता के युग में विवेक, तर्क, ज्ञान, बुद्धि के लक्षणों से रू-ब-रू होते हुए राजस्थानी परम्परा को छोड नहीं सकते। उन्होने कहा कि नीरज की कविताओं में समाज सापेक्ष प्रेम, राजनीति पर व्यंग्य, निजी अंतरंगता भी है। उन्होंने कहा कि नीरज की कविताओं में भाषा के साथ संस्कृति भी है। कार्यक्रम के अध्यक्ष वरिष्ठ साहित्यकार भवानी शंकर व्यास ‘विनोद’ ने कहा कि काव्य संग्रह में अधुनातन संवेदना की कविताएं हैं जो स्वयं के परिवेश में पाठकों से सीधे संवाद करती है। उन्होंने कहा कि कविताएं शब्द-चयन के प्रति अतिगंभीर, तार्किकता, तथ्यात्मकता, वैज्ञानिक चिंतन से ओतप्रोत है। उन्होंने कहा कि नीरज की कविताओं में अस्तित्व-बोध, मनुष्यत्व के राग, आत्मीयता, भाषा का स्वाभिमान छलक रहा है। कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि पत्रकार-साहित्यकार मधु आचार्य ‘आशावादी’ ने कहा कि नीरज की कविताओं में भारतीय समाज, राजनीति का यथार्थ रूप है। उन्होने कहा कि नीरज की कविताएं सामाजिक सरोकार के साथ प्रेम की कोमल अनुभूतियों का गुलदस्ता है। कार्यक्रम में उर्जावान कवि नाटककार हरीश बी. शर्मा ने काव्य संग्रह पर पत्रवाचन करते हुए कहा कि काव्य-संग्रह की 57 कविताएं, 14 गद्य कविताओं में सम्पूर्ण संसार समाया हुआ है। कार्यक्रम के संयोजक मुक्ति के सचिव राजेन्द्र जोशो ने डा. नीरज दइया की रचनाओं को कालजयी बताया।

कार्यक्रम में कवि नीरज दइया ने अपने काव्य-संग्रह की रचना पाप-पुन्न, छाणस, पाछो कुण आसी, कोनी लिखी कविता, चालो माजी कोटगेट सहित चुनिंदा कविताओं का पाठ किया। कार्यक्रम में व्यंग्यकार बुलाकी शर्मा ने अतिथियों का स्वागत किया। कार्यकम के प्रारंभ में कवि नवनीत पांडे ने स्व. सांवर दइया का स्मरण करते हुए कहा कि स्व. सांवर दइया ने रांगेय राघव की भांति कम उम्र में कहानी, कविता, व्यंग्य को समृद्ध कर साहित्य जगत को अविस्मरणीय योगदान दिया है। पांडे ने कहा कि उनके पुत्र नीरज दइया ने उनके अप्रकाशित साहित्य को प्रकाश में लाने का महत्ती कार्य किया है। कार्यक्रम में वरिष्ठ साहित्यकार देवकिशन राजपुरोहित, कथाकार भंवरलाल ‘भ्रमर’, कवि गौतम अरोडा, नंदलाल दईया, जेठमल सोलंकी, प्रदीप कच्छावा, रामदेव दईया, सरजीत सिंह, मो. अयूब, सुश्री मंदाकिनी जोशी को लोकार्पित काव्य-संग्रह भेंट किया गया। कार्यकम में माल्यार्पण और शॉल ओढ़ाकर अतिथियों का सम्मान किया गया। कवि राजाराम स्वर्णकार ने धन्यवाद ज्ञापित किया।

राजेन्द्र जोशी, सचिव, मुक्ति संस्था, बीकानेर


 
 
 
 


‘पाछो कुण आसी’ (2015) डॉ. नीरज दइया, 
प्रकाशक : सर्जना, शिवबाड़ी रोड, बीकानेर- 334003, 
पाना : 96, कीमत : 140/-
आवरण : श्री राम किशन अडिग
आं कवितावां बाबत ......

कवि- नीरज दइया


‘पाछो कुण आसी’ कविता-संग्रै री कवितावां सबदां रै असवाड़ै-पसवाड़ै लुकमीचणी रमै, जिकी सवालां रै पगोथियै ऊभ’र मानखै सूं कदैई सीधी बंतळ करै अर कदैई उण सूं सवालां री भासा में बात करै। ओळूं अर सपनां में रळ्योड़ी इण कवितावां री संवेदना थार री बेकळू सूं लेय’र आभै रै बादळां तांई पूगै अर पाठक नै संवेदित करै।
नीरज दइया री अै कवितावां आज अर बीत्योड़ै काल री कवितावां तो है ईज, आवणआळै काल रा पळका ई आं कवितावां में पड़ै। बदळती जिंदगाणी, बदळता संबंधां, बदळती तकनीक, बदळता काण-कायदां बिच्चै लड़थड़तो आदमी मिरगलै दांई भटकै है। भटकाव री इण तिरस रा विचारात्मक अर संवेदनशील बिम्ब नीरज आत्मीयता सूं रचिया है। भासा अर शिल्प ई इण में सांतरो है। गद्य-कविता सूं लेय’र छंद री लय तक रो इण में प्रयोग कियोड़ो है।

—आईदानसिंह भाटी


राजस्थानी लेखण रै मौजूदा दौर में अेक कवि अर आलोचक रै रूप में नीरज दइया आपरी ठावी पिछाण राखै। मौलिक सिरजण अर साहित्यिक अंवेर-परख रै समचै ई वै राजस्थानी री नवी कविता रा लूंठा हिमायती पण जाणीजै। वांरी कविता में जीवण रा राग-रंग, लोकराज में मिनखीचारै रा माण-मोल अर हेत-प्रेम रा मानवी रिस्तांं रा मोवणा चित्राम वंारै काळजै री कळ-झळ अर कंवळै अंतस री साख भरै। वै किणी अमूरत भावलोक कै सबदां री कळा-कोरणी में नीं, आम लोगां रै जीवण-वैवार में ई कविता री असल कमाई, अरथाव अर आगोतर देखै। म्हनै आ बात कैवण में राई भर संको नीं कै नीरज दइया आपरै सिरजणहार जीसा (सांवर दइया) री विरासत अर सिरजण-संवेदना री पूरी अंवेर साथै खुद री काव्य-संवेदणा नै ओपती पिछाण दीवी है।
—नंद भारद्वाज

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