Saturday, October 10, 2015

पाछो कुण आसी : समै री निसरनी पर सबदां री ताण चढ़तौ सबदधर्मी

// हरीश बी.शर्मा//
नीरज दइया री इण कविता री पोथी पेटे अेक बात साव समझ में आवै क अब वै साहित्य री सांसारिकता सूं कीं आगे निसरग्या है। कीं दफै तो म्हनै यूं भी लखावै के वै सांसारिकता रे सीधे अरथ सूं भी अब बेपरवा है। पैली आ बात नीं ही, उणां री सिरजणां में कीं कणूकां तो साव इण खातर व्हैता क बात अंडरलाइन हुवै। लोग नोटिस करे। पण ’पाछो कुण आसी’ सूं निसरती वेळा म्हनैं जिको कवि लाध्यौ है, वो एक शिक्षक, संपादक अर अनुवादक सूं बेसी एक इस्यौ मिनख है जको घर, समाज अर भायलां खातर करतौ-करतौ धापग्यौ है। जस री दो ओळयां बिहूणो ओ मिनख लोभी अर सुवारथी असवाड़े-पसवाड़े सूं आखतौ आयग्यौ है अर इण औस्था नै भी वो भोग नीं रियो है बल्कि भोगणे रे दरद सूं कदै उबर चुक्यौ है। अब होठों पर मुळक चेप ली है। इण मुळक री चालणी सूं कणै टोंट करै तो कणै तूंबो बरगो हुयनै थू-थू करावै।
मजे री बात तो आ क उण नै इण बात री भी परवा ई नीं है क उण री बातां लोगों ने रुचै क नीं रुचै। लारली बार आप म्हनैं हेत रे हिलोरां में लाध्या तो हूं केवण में नीं चूक्यो क नींद उचटी कियां? वे उण वेळा तो पडुत्तर नीं दियौ, पण ’पाछो कुण आसी’ उणांरी लारली पोथी ’उचटी हुई नींद’ रो पडुत्तर है। नीरज दइया प्रेम रे चरम सूं मुगति रे आणंद तईं री जात्रा रा एक ऐड़ा सफल जात्री बणर सामीं आया है जकां नै इण माया-नगरी सूं कीं नीं चइजै।
कीं नीं चावण री आ चावणा रो ओ जात्री अब म्हनैं मोह-माया में पड़तौ लागै कोनी पण कविता, कविता ईज हुवै, बायोडाटा या रिपोर्टकार्ड नीं। फेर भी राजस्थानी री आ पोथी आपरी 57 कवितावां अर 14 गद्य कवितावां रे पेटे खास है। गद्य कवितावां रो राजस्थानी में प्रयोग नुवो है। हिंदी में इण नांव सूं अेक जुदा शैली चाल खड़ी हुई है। राजस्थानी में नीरज दइया इण रा आगीवाण बण्या है पण राजस्थानी रो पाठक संग्रै री गद्य-कवितावां ने किसी भी दूसरे रूप में नीं पढ़ैला, खतावळ में ई केयौ जाय सके। गद्य-कवितावां री रिदम अर फ्रेम तो है पण राजस्थानी रा मुट्ठीभर पाठक इण नै कियां लेवै, समै पर छोड़ सकां।
पण इण सूं पैली 57 कवितावां में जका फ्रेम नीरज दइया बांध्या है, बेजोड़ है। अे कवितावां सरलता री हदां तोड़ती निजर आवै।  लोगां ने लखावै क उणां रे घर-आंगण, चूला-बासण, रोटी-रासण सूं जुडिय़ोड़ी बातां है, पण जियां-जियां पाठक कपड़छान करै कवितावां रो ग्राफ बधते-बधते आखै दुनिया ने परोट लेवै। जीवण री अबखाई, इधकारां रो हनन, जुलम अर ज्यादती सूं आखते मानखै ने आस अर विश्वास जगावणनै कवि खड़ो दिसै तो कई बार कवि सगळा अत्याचारां रे बाद भी यूं मुळके जाणै बैरी-दुस्मीं ने कीं मानण ने ईज त्यार नीं है। 
म्हनै लागै क अेक सिरजक री आ औस्था आदर्श है। समै री निसरनी पर सबदां री ताण चढ़तो-चढ़तौ सबद-धर्मी जे इण औस्था नै पा लेवै तो फैरूं वो मलंग हुय जावै। दाय आवै ज्यूं बोलै। खरी-खरी कैवे। खतरा सूं बेपरवा रैवे।
खतरो हुवै भी किण सूं?
उण नै तो कोई बात करण जोगो ई नीं लागै अर लागै तद एक भाटो उछाळै, ’पाछो कुण आसी’।
ओ पाछो कुण आसी, सवाल है क चेतावणी? सीख है क टोंट? कोई नीं जाणै। व्याकरण रो ज्ञान राखणिया डॉ.नीरज दइया अठै हुंवता तो स्यात लारै कोई चिन लगा देंवता, पण ओ तो मलंग है, फकीर बरगो। कीं सबद है। अर सबद उछाळै। कविता बण जावै। कविता जकी भारतीय भाषाओं री बीजी कविताओं सूं सीधी लड़त मांडै अर कई दफै अेकदम सांमी जायर खड़ी हुय जावै। ’काळजो’ अर ’म्यानों चावूं म्हैं’ बरगी कवितावां रा अे सुर काव्य-जगत में चावा हुयसी इण में दो राय नीं है। पण इस्या चितराम तो घणखरा है। वे आप रै पाठकां ने पूरौ समय देवै अर केवै, सोधता रैवो थे क पाछो कुण आसी। आप भाटे पर दोय कवितावां भी लिखी है। पैली कविता म्हारी इण बात रे नेड़े-तैड़े ई है।
पैली कविता ई भाटे आळै ज्यूं उछाळै।
इण संग्रै री पैली कविता में कवि केवै, ’कदै तो सुणैला थूं’। पैली कविता ही अेक सवाल है, कुण है जकै ने कवि सुणावणौ चावै?
परमात्मा क परमात्मा जैड़ो कोई देहधारी?
किण री अणसुणाई ने मैणो है?
अर थोड़ा’क आगे जावां तो वैमाता सूं बात करता कवि इणी तरयां री फेरूं बात करै। आ बात आप रै हुवण री हूंस सूं जुड़ी है। आप रै हुवण रे कारणां सोधता कवि रिस्तां री पड़ताल करै अर अेक ओळमो भी देवै जका उण रे हुवण रा कारण है, वै ही क्यों उण नै खारिज करण रा कारण बणै। इण ढाळै कवि लेवै तो आप पर ई सारी बातां है पण वो मिनख रे मन में बैठे उण दरद पर मार करै, जको लोकाचारै री आड़ में नीं तो बतायौ जावै अर न सह्यौ जावै।
अर इसी ई अेक जगां कवि दरद ने दबावंतौ केवै, ’लोग मौका ताके, घणौ सीधो-सादो हुवणो ठीक कोयनी।’
अठै सूं आगै की पावंडा बधां तो ’भरयो समंदर धूड़ सूं’ कविता मिळै, अठै भी एक परमात्मा या परमात्मा जेड़ो कोई देहधारी रो अभेळको हुवै। कवि केवै, ’मालक! मरणो है मंजूर। पण तिरसायौ मत मार...’ अठै आ साव मुगति री कामना नीं है। आ फगत मिरगतिरसणा भी नीं है। मिनख रो मन खुद ने खुस राखण खातर आप रै आसै-पासै कीं फूल उगाय लेवै का रंग भर लेवै। अे जद फूल अर  रंग जेड़ो व्यौवार नीं करै तद मन तिड़के अर संबंधां ने बचावण री हद ताणी जुगत रे बाद भी खरचिजतै समै सूं अरदास क्ररै।
मन सिरैनांव सूं दोय कवितावां में अेके खानी मन ने सैं खेल रो खिलाड़ी बतावै तो अेक दूजी ठौड़ उण पर चढिय़ै मैल ने उण री नुगराई या के निगराई रो कारण मानै, मन में कंवळाई चावणियौ कवि चावै तो फगत मायनौ। केवै भी है, ’मायनो चावूं म्हें...।’ आपरी अेक कविता ’माटी रा ढगळया’ परवत सूं नदी तई री जात्रा करणियै भाटै रे गोळ गड्डे रे बणन री कथा याद करावै जकै में सिव तो कदै साळगराम मिळै।
’जीवण री घाटी, तिसळता जावां, घिसता जावां, घिसतां जावां...’  पण सवाल ओ है क कईं सगळा दगड़ पूजिजै। जे जवाब नीं है तो सवाल दगड़ रो है क क्यों नीं? किसी कमी रैयगी क सागै-सागै तिसळता दोय दगड़ सरीसी ठौड़ नीं पाय सकिया?
अेक इसी ही कविता ’म्हैं जद गाडी री बात करूं, आप राकेट री सुणनी चावौ...’ में कवि सामले री कसौटी री बात करे। आपसी संबंधां में फैलती खटास री वजै पर आपरी दीठ बात करता कवि विसंगति अर असंतुलन पर चोट करै। वे बतावै क जद म्हारै कनै उण री चावना पूरी करन रो साधन ई नीं है तो फेर संबंध कद तक ढोईजे ला? 
कवि डॉ.नीरज दइया री कविता इण तरियां रे सवालां सूं लगोलग भिड़ंत मांडै अर आगे बधती जावै। उणां री कविता हारै नीं है। ’मिनख अेकलो कोनी’ केवता थकां वे कोरी दिलासा ई नीं दे, तरक सूं आपरी बात ने साबित भी करै। वै जद केवै, ’कोई भी छियां बायरो नीं है...’ एक भरोसो जगावै क सैं कनै आप रै पांती री छियां भी है। खुद रो जित्तो डील उत्ती छियां। अर आगे आ बात भी करै क पेट री आग मेटणो ई कोई बडो काम नीं है। घणखरा लोग जिका रोटी रे आळै-दोळै ई आप री जिनगाणी काढ़ देवै, कवि उणां ने ’थाळी अर हथाळी’ रे मारफत आडै हाथां लेवै।
’आगळ खोले कुण’ कविता अबोलेपण रे कारण बधती दूरी रे बीच तड़पता रिस्तां री बात करै तो ’न्यारी-न्यारी धरती’ इणी भावां रो अेक नुवीं जमीन सूं समझावण री कोसिस है। फेर ’आपां रे मून रैया मर जावैला सगळा मारग’ अेक मोरल रे रूप में आवै।
कवि आप रै समय ने समझावणौ चावै। उण ने परवा है आवणिये समाज री। अेक कवि ही आ अरज कर सकै। अेक कवि ही तोड़ सकै मून अर सवाल करै क मिनख मांय रा राम हुया करै न्यारा?
मानव मन री घाण-मथांण अर गतापम रा इस्या घणखरा चितराम ’पाछो कुण आसी’ रे पन्ना मंडियोड़ा है। अेकलव्य रे अंगूठे री बात नुवै फ्रेम में सामीं आवै जद अंगूठे ने टीको कढ़ावण में बरतणै री बात कवि करै। ओ टीको काढ़णौ व्यंजनापूर्ण है। इसी ज अेक कविता पोमीजा अपां में फेरूं इण व्यंजना री आवृत्ति आवै, ’थू म्हारै टीको काढ़...’
मुहावरां री दुनिया में टीको काढ़णो दो तरयां सूं प्रकट हुवै। नीरज दइया री आ खासियत है कि वे पाठक ने अवसर देवै क पाठक दोनूं तरयां सूं समझतौ थको आप रै भाव सागै कवि रे भाव ने रळावै अर कविता रो आनंद उठावै। इणी तरयां पोथी रो सिरेनांव भी हर बार नुवै-नुवै अरथ में प्रकटै। स्यात ओ ई कविकर्म री सफलता हुवै उणरी कवितावां फगत आप रै अरथ सूं ईज नीं, नुवै-नुवै अरथां ने जोवण री खेचळ सूं भी पिछाणी जावै। आप रै पाठक ने कवि इत्ता अवसर देवै क वो कई बार कवि रे अरथ रे परबार जाय परो भी कीं नुवीं बात काढ़ लावै।
कवि सबदां री मंत्रशक्ति सूं भी वाकिफ है। उण नै नेहचो है क सबद ने ब्रह्म केवण री बात साव कूड़ नीं है पण वो जाणै है क सबद आप री धार गमावंता जा रिया है। भोंथरा हुवण लाग्या है। अर उण सबदां ने जोवण में लाग्यौ है। अरदास करै क ’लाधेला बे सबद, जिण सूं रचीज सकै कोई साच, केवां जागौ! जाग जावै मानखो। केवां-चेतो! अर चेत जावै मानखो।’
समै में बदळाव सागै ई बजार में आयै सबद अर साहित्य सूं कदास कवि निरास है। आखर रे खरण सूं। सबद री सत्ता रे मरण सूं कवि बेचेन है। उण ने इण बात रो दुख है कि सबद री ताकत खतम कियां हुंवती जा री है। सबद री ताकत ने जगावण री अरदास करतौ कवि माने है क सबद या तो अडाणै है या ताकत बिहूणा। इण तरयां आज रे लोकतंत्र ने चेतावणी देवतो लखावै।  इण संग्रै में कवि, कविता पर भी कविता लिखी है। कविता री मसीन लगावणियै कवियां ने भी नीं बख्से और केवै भी है कि कविता ने कारखाने में बणावणी बंद कर देणी चाइजै। आप रै मांय एक व्यंग्यकार री विरासत समैटे नीरज दइया जद केवै, ’म्हारी कविता कठै अड़ै भाई थारै’ तो वे अभिव्यक्ति माथै आवणियै वैश्विक संकट री बात करै और ’कविता कियां लिखीजै? इण माथै कोई किताब कोनी, कविता क्यूं लिखीजै? इण माथै कोई जवाब कोनी’ लिखता थकां रातोरात कवि बणनै री जुगत भिड़ानियां माथे चोट करै। अर कविता रे क सूं भी नावाकिफ लोग जद मानै नीं अर लिखता रेवै निसरमाई सूं तो वे केवै, ’धूड़ है बां नै, जिका न्हाखै, आंख्यां मीच’र कविता माथै धूड़।’ कविता रे पेटे डॉ.दइया चौफाळिया ई हुय जावै। अेके कानीं वे सबद री सत्ता री थापना करणी चावै तो दूजी ठौड़ वे कविता रे सागै ज्यादती भी सहन करणै रा पखी नीं है। आ ही नीरज दइया रे इण संग्रै री खासियत है। वे इण पांवडे तक आंवते-आंवते अेक वैतरणी पार करण जेेड़ी उरमा दरसावै।
सैं की जाण जावण रे बाद जिकी तसल्ली मिळै, वा इण संग्रै में है। जरूरत इण बात री है कि इण तसल्ली ने जोवण खातर नीरज दइया तईं पूगणो पड़सी। अर इण पूग सारु अेक परंपरा ने जीवणो पड़सी।
म्हें सदा ई कविता रे पेटे अेक सवाल सूं भचीड़ा खाऊं। फेर कविता ई क्यूं, अपने आप रे प्रकटण रे हर तरीके ने अंगेजण सूं पैली ओ सवाल करूं क म्हें क्यों कर रियौ हूं या के कोई क्यूं लिखै? नीरज दइया री कवितावां सूं भी इणी तरयां बंतळ करूं तो लखावै क डॉ.दइया रा ट्रीटमेंट सैजरा नीं है। आप री कवितावां सीधी नीं चालै। कीं चतुर-सुजान जका कविता री पैली ओळी ने पढ़तां ईज कविता री नाड़ झाल लैवे उणां रे खातर तो नीरज दइया री कवितावां चुनौती सूं कम नीं है। कई बार आडी ज्यूं लखावै। क्यूंकि वे कविता ने अचाणचक अेक ट्विस्ट देवै अर ओ ट्विस्ट चकारियै आळै ज्यूं पाठक ने उंडौ उतरण खातर मजबूर कर देवै। जे पाठक उंडौ उतरै तो उण नै मिळै भी मोती है।
आ ईज वा जगै है जठै ऊभ परो कवि कैय सकै क आ है कविता। कविता, जकी साव ठोकर खावण बाद रो रोवणो नीं हुवै, हुवै सबक। कविता, जकी री पैली ओळी रा चार सबद, दूजी ओळी रा दोय अर तीजी ओळी रा तीन सबद सतोळियौ नीं है, क मेल दिया एक-दूजे पर दगड़-खोरिया दावै ज्यूं। इणां रो हुवै कीं अरथ। खोलनी पड़ै पड़त। फेर नीरज दइया री कवितावां रा तो स्पेस भी कीं केवै अर आ ईज वजै है कि उणां री कवितावां बीजी भारतीय भाषावां री कवितावां रे बीच जाणीजै। केय सकां कि नीरज दइया भी अेक इसा कवि है जिकां री वजै सूं आधुनिक कविता रे पेटे राजस्थानी आदरीजै। अेक कवि रे रूप में नीरज दइया जिण जगां है वा हरखजोग है, ओ संग्रै राजस्थानी कविता ने और जगचावी बणावैलो, इण भाव सागै-
जय राजस्थान
जय-जय राजस्थानी
 (पत्र-वाचन / हरीश बी. शर्मा 10-10-2015)

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