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Wednesday, October 24, 2018

‘श्रीलाल नथमलजी जोशी : रचना संचयन’ लोकार्पण

राजस्थानी के प्रथम उपन्यासकार श्री श्रीलाल नथमलजी जोशी की आठवीं पुण्य तिथि पर आयोजित ‘श्रीलाल नथमलजी जोशी : रचना संचयन’ लोकार्पण-समारोह

















 बीकानेर/ 23 अक्टूबर/ श्रीलाल नथमलजी जोशी ने राजस्थानी कथा साहित्य के पायोनियर रचनाकार थे जिन्होंने प्रवाहमयी भाषा द्वारा जटिल से जटिल भावों को सहजता से अभिव्यक्त किया। उक्त उद्गार प्रसिद्ध कवि-चिंतक डॉ. नन्दकिशोर आचार्य ने श्रीलाल नथमलजी जोशी की आठवीं पुण्य तिथि पर आयोजित लोकार्पण समारोह की अध्यक्षता करते हुए व्यक्त किए। मुक्ति संस्था महाराजा नरेन्द्रसिंह ओडिटोरियम में डॉ. आचार्य ने राजस्थानी के मुद्दे पर बोलते हुए कहा कि मैं सैद्धांतिक रूप से मानता हूं कि शिक्षा का माध्यम मातृभाषा होना चाहिए, यह भाषिक मानवाधिकार की श्रेणी में आता है कि जिनकी मातृभाषा राजस्थानी है उन्हें आरंभिक शिक्षा राजस्थानी में मिले। उन्होंने श्रीलाल नथमलजी जोशी के अनेक संस्मरणों को बताते कहा कि ‘धोरां रा धोरी’ जैसे जीवनीपरक उपन्यास की परंपरा आगे विकसित होनी चाहिए थी। नए लेखकों को अपने पूर्ववर्ती लेखकों से सृजनात्मक रिश्ता उनकी भाषा में तलाशना चाहिए।
    मुख्य अतिथि ख्यातनाम कवि-संपादक भवानीशंकर व्यास ‘विनोद’ ने कहा कि श्रीलाल नथमलजी जोशी ने राजस्थानी के लिए बेजोड़ काम किया। अग्रजों के लिए उनमें श्रद्धा भाव था। व्यास ने कहा कि उनका उपन्यास ‘आभै पटकी’ राजस्थानी का पहला उपन्यास है जिसे शुद्ध सामाजिक उपन्यास कहा जा सकता है। जोशी के कार्यों पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि राजस्थानी गद्य के विकास में उनका अविस्मरणीय योगदान रहा है।
    लोकार्पित कृति ‘श्रीलाल नथमलजी जोशी : रचना संचयन’ पर अपने पत्रवाचन में कवि-आलोचक डॉ. नीरज दइया ने जोशी की पांच पुस्तकों के संकलन को पंचामृत की संज्ञा देते हुए उन्हें कालजयी गद्य लेखक बताया। डॉ. दइया ने कहा कि जोशी जी के हॄदय में मातृभाषा राजस्थानी के अपरिमित लगाव था जिसके रहते वे गद्य साहित्य को अपने जीवनकाल में विविध कथा-प्रयोगों से समृद्ध करते रहे।
    लोकार्पण समारोह के आरंभ में ठा.रामसिंह द्वारा लिखित और श्रीलाल नथमलजी जोशी को अतिप्रिय राजस्थानी वंदना का गायन प्रसन्ना पारीक और शिवानी पारीक ने प्रस्तुत किया। आगंतुकों का स्वागत करते हुए कवि-कहानीकार मालचंद तिवाड़ी ने श्रीलाल नथमल जोशी से जुड़े संस्मरण साझा करते हुए उन्हें राजस्थानी का अद्वितीय रचनाकार बताया और संचयन के प्रकाशन को निजी हर्ष का विषय कहा।
    रचना संचयन के संपादक द्वय श्रीमती कांता पारीक और श्रीमती प्रभा पारीक में से श्रीमती प्रभा ने अपनी बात रखते हुए बाऊजी के लेखन की विचार भूमि पर प्रकाश डालते हुए उनके द्वारा उन्हें लिखित दो पत्रों का भी वाचन किया। इस अवसर पर श्रीमती शशिकांता जोशी और साहित्यकार मधु आचार्य ‘आशावादी’ को संपादक द्वय द्वारा रचना-संचयन भेंट किया गया।
    व्यंग्यकार-कहानीकार बुलाकी शर्मा ने पुस्तक प्रकाशन की रूपरेखा पर प्रकाश डालते हुए बाऊजी से जुड़े अनेक संस्मरण साझा करते हुए कहा कि हमें श्रीलाल नथमलजी जोशी के कार्यों से प्रेरणा लेते हुए निरंतर राजस्थानी सृजन करना चाहिए। राजस्थानी उनके और हमारे मन से जुड़ी भाषा है। समारोह का संचालन बुलाकी शर्मा ने किया तथा अंत में वाचस्पति जोशी ने आभार ज्ञाप्ति किया। कार्यक्रम में साहित्यकार सरल विशारद, डॉ. श्रीलाल मोहता, लक्ष्मीनारायण रंगा, राजाराम स्वर्णकार, भंवर लाल भ्रमर, प्रमिला गंगल,राम प्रकाश मन्नू, बैजनाथ पारीक, कमला कोचर, ओमप्रकाश सारस्वत, प्रीति पारीक, शुभा पारीक, विश्वासिनी, किशन गोपाल पांडिया, गिरधर गोपाल व्यास, पी आर लील, नवनीत पाण्डे, पृथ्वीराज रतनू, प्रो. अजय जोशी, डॉ. मेधराज शर्मा, अविनाश व्यास, मुकेश व्यास, प्रमोद कुमार चमोली, दीपचंद सांख्ला, नदीम अहमद नदीम, गौरीशंकर प्रजापत आदि उपस्थित थे।

Tuesday, October 23, 2018

जोशी जी री आज आठवीं पुण्यतिथि माथै खास

पैली पीढी रा नायब कहाणीकार : श्रीलाल नथमल जोशी
डॉ. नीरज दइया


    श्रीलाल नथमल जोशी (1922-2010) रा दोय कहाणी-संग्रै प्रकाशित हुया। पैलो- परण्योड़ी-कंवारी (1973) राजस्थान साहित्य अकादमी सूं अर दूजो- मैंदी, कनीर अर गुलाब (1997) अकादमी री इमदाद सूं। जोशी जी राजस्थानी कहाणी री पैली पीढी रा नायब कहाणीकार है अर आप राजस्थानी कहाणी रै पैलै पांवड़ै फगत अर फगत कहाणियां लिखी। दूजै संग्रै री कहाणियां ई पैलै संग्रै रै आसै-पासै लिख्योड़ी लखावै। कहाणी-जातरा माथै विचार करां तो जोशी जी रा पगल्या पूजणजोग है। कहाणीकार अन्नाराम सुदामा, नृसिंह राजपुरोहित, विजयदान देथा, नानूराम संस्कर्ता, यादवेंद्र शर्मा चंद्र, करणीदान बारहठ अर मूलचंद प्राणेस सरीखै कहाणीकारां भेळै आधुनिक कहाणी नैं परवाण चढावण मांय आपरी कहाणियां नै उण बगत मुजब केई केई बातां मांय सिरै मान सकां।
    श्रीलाल नथमल जोशी री कहाणियां री खासियत है कै कम सबदां मांय आपरी बात कैवै। आकार मांय छोटी आं कहाणियां मांय पात्रां रो चरित्र-चित्रण अर नाटकीय संवादां मांय गजब रो नाप-तौल देख सकां। लोककथावां री बुणगट साव आंतरो राखती आं कहाणियां रो सीधै आपरै मरम तांई बिना किणी विषयांतर रै जावणो देखां तो लखावै कै आं कहाणियां री चरचा हुवणी चाइजै ही। इण बात में कोई सक कोनी कै दोनूं संग्रै बिचाळै एक बीसी सूं बेसी आंतरो हुयां रै उपरांत ई कहाणी कला री दीठ सूं दूजै संग्रै- मैंदी, कनीर अर गुलाब री कहाणियां संग्रै- परण्योड़ी-कंवारी सूं घणी आगै री कहाणियां कोनी। दोनूं संग्रै री कहाणियां रो जोड़ 44 है, ऐ कहाणियां आपरै बगत री साख भरै। कहाणियां रै मारफत कहाणीकार रै निजू जीवण रा केई रंग अर चितराम ई सोच मांय देख सकां।
    “नाटक” कहाणी री खासियत आ है कै इण मांय कोई नाटक नीं हुय’र अलसी जिंदगाणी मांय हुवण वाळै नाटक रा रंग राखण रो जसजोग काम कहाणीकार करियो है। सरल, सहज अर नुंवी बुणगट पेटै जूण नै अरथावती आ कहाणी मिनख रै रंग बदळतै मिजाज माथै सांवठो व्यंग्य करै। आजादी पछै रै पूंजीपति समाज रो सेठ मोवनलाल प्रतिनिधि पात्र है, उण रै चरित्र रै मारफत किणी रै दौगलै हुवण रो ऐसास कहाणी करावै। जाहिर है कै चावी कहाणी “किरकांटियो” अठै याद आवै। परण्योड़ी कंवारी, काळजै री कोर अर आगोतर कहाणियां मांय कागद नै कहाणी बुणगट मांय प्रयोग रूप परोटण री बानगी मिलै।
    श्रीलाल नथमल जोशी री कहाणियां मांय बां रो बीकानेर अर राजस्थानी भाषा खातर अपणायत देखी जाय सकै। कहाणी “कमला रो बाप” री ऐ ओळ्यां देखो- “एक दिन हूं कमला नै लियां लियां इटलीवासी, राजस्थानी भासा रै धुंरधर विद्वान स्व. डाक्टर टैसीटोरी री समाधी देखण नै गयो परो। पब्लिक बाग सूं निकळतै ई डावै हाथ खानी बीकानेर में टैसीटोरी री समाधी है। कमला नै म्हैं टैसीटोरी बाबत केई बातां बताई जद बींरी इटली रै विद्वान खातर घणी सरधा हुयगी।” (पेज-61)  दूजो दाखलो कहाणी “बधण री बेळा” सूं- “बीकानेर नगर रै उतराद खानी जस्सूसर रो दरवाजो है। रियासती जमानै में परकोटै रा दरवाजा रात नै दस बजी रै अड़ै-गड़ै ढकीज जावता अर झांझरकै च्यार बजी पाछा खुलता। देस आजाद हुआं पछै दरवाजा अस्टपौर खुला ई रैवै अर विग्यान री बढोतरी रै इण जुग में अबै बांनै ढकण में भी कीं सार कोनी।” (पेज-79) कहाणी मांय परिवेश रो ओ बखाण कहाणीकार री निजू ओळखाण अर बीजी केई बातां नैं खोलै।
    राजस्थानी कहाणी-जातरा मांय बुणगत अर कथानक नै परोटण री दीठ सूं “बधण री बेळा” कहाणी नैं बेजोड़ कैयी जावैला। इण कहाणी मांय पात्र खेजड़ो अर बोरड़ी कम उमर रै प्रेम माथै सखरी टीप करै अर बगतसर सही उमर आयां प्रेम नै पोखण री बात समझावै। कहाणी री सांकेतिक अर सूक्ष्मता देखणजोग है- “खेजड़ै कैयो- घबरावण री जरूरत कोनी। म्हारी बात सुण। अबार आपांरै बधण री बेळा है, अळूझण री नईं। तूं खूब बध, अर हूं ई खूब बधूं। जित्ता आपं ऊंचा चढ सकां बित्ता चढो। फेर तूं म्हारै खानी लुळ हूं थारै खानी लुळूं। आपां रा अंग आपस मएं रमर एकजीव बण जासी। फेर आपां किणी रै अटकां कोनी, खटकां कोनी। आपांरो मेळ जद मारग बैवतां नै छैयां देसी, तो पछै आपां नै कोई क्यूं अळगा करसी, क्यूं न्यारा करसी?” (पेज-84)
    जूनी पीढी रै कहाणीकारां मांय जोशी जी री कहाणियां मांय विषयगत नवीनता अर आगाऊ सोच कीं बेसी लाधै। “मैंदी कनीर अर गुलाब” अर “मोलायोड़ी लाडी” जिसी कहाणियां घणी-लुगाई रै संबंधां नै अरथावै। कहाणी मांय ओ नुंवो प्रयोग बुणगट री दीठ सूं कैयो जावैला कै प्रेम अर नर-नारी रै आदू रिस्ता नै न्यारी दीठ सूं ऐ कहाणियां समझावै। प्रेम रो सरूप घणो झींणो हुवै अर उण मांय जरा-सी’क बात सूं ठबक लाग जावै। मैंदी, कनीर अर गुलाब रै मारफत प्रेम रै त्रिकोणीय भेद नै खोलती कहाणी मांय जाणै प्रकृति पाठ पढ़ाय रैयी है। मोलायड़ी लाड़ी साव नाटकीय कहाणी है अर बेमेळ ब्यांव भेळै जनसंख्या री बात ई लेय’र चालै पण इण मांय सगळा सूं बेसी अचरज आळी बात कै जोशी जी री कमल सूं उण बगत एक लुगाई आपरै आदमी सांम्ही बोल रैयी है- “हूं थां में तीन लाख नूवे हजार नईं , तो खाली नूवे हजार रुपिया मांगूं। इण च्यार टाबरां मांय सूं थे खाली तीन रा ई बाप हो। दस हजार काटर चौथे टाबर रा नूवे हजार म्हारै हवालै करो।” (पेज32) किणी परणी रो च्यार टाबरा मांय एक टाबर खातर इण ढाळै री बात कहाणी मांय पैली बार आवै। इण बात री परख कियां हुवै? पण इण सूं अलगाव उपजै अर दस बरसां पछै ओ सळ निकळै कै घणी नै खुद सूं दूर राखण खातर आ कूड़ी ओळी कैयी ही।
    जोशी जी री आं कहाणियां री बोल्डनेस है कै “पोतै नै सांभो” जिसी कहाणी मांय भ्रूण-हत्या री खिलाफत करता कंवारी कन्या बेटै नै जलम देवै। भरी सभा मांय नाजायज टाबर माथै चरचा करी जावै। कहाणी संकेत करै कै किणी पण बात माथै मौकैसर बोलणो उण रै पख-विपख मांय बोलणो सरल नीं हुवै। मिनख री फितरत है कै रूप-रंग रै चक्कर मांय बो कांई रो कांई कर जावै। कहाणी “फिकर ना करो” रै मारफत मिनख री आदम भूख नै बखाणै। सेक्स साइकॉलोजी माथै पीएच.डी. कर रैयी डॉ. उर्मिला सूं कथानयक रात री एक रेल-जातरा मांय मिलै। पूरै सफर मांय नायक रो झूठ माथै झूठ बोलणो मिनख रै मन मांय बस्योड़ो लुगाई रै रूप रो लगाव है। कहाणी कैवै कै मिनख किण हद तांई लुगाई खातर आपरी आत्मा नै मार सकै पण खुद आ सहन नीं कर सकै कै उण री लुगाई किणी दूजै आदमी सूं मेळ-मुळाकात राखै या कदैई राखती ही। इणी विषय नै कहाणी- “आपरो सरूप” मांय कहाणीकार नुंवी उकरास सूं चवड़ै करै। कहाणी रो ओ अंश विचारणजोग है- “सिंझ्या पड़ी जद कमरै में गोपाल बाबू एकला हा, तो काच नै उठाय’र देखण लाग्या। एकाएक विचार में पड़ग्या। ब्याव पछै आं दस बरसां में बारै-तेरै छोरियां-लुगायां गोपाळ बाबू रै जीवण में आई अर बां मांय सूं च्यार-पांच नै बां कागद लिख’र दिया जिण में ऊमर भर बंधण रो बैण करियोड़ो हो। आंरै सागै जिकी-जिकी लीलावां करी ही, बै सगळी मुद्रावां गोपाल बाबू नैं एक-एक करनै दीसण लागगी। आज पैली जिकी लीला माथै बां कदेई गौर नईं करियो, बा अबै एक गंभीर चीज लागण लागगी। मन में तोल-जोख करण लागग्या- “म्हारो कसूर बड़ो’क प्रेमा रो?” काच में जाणै बांनै दोनूं चैरा अबै दीसण लागग्या- एक आप रो- काळो, तवै जिसो ; दूजो प्रेमा रो जिको साव निरमळ, गोरो निछोर, बाळपणै रो कागद जाणै एक काळो तिल बणनै उणरै मुखमंडळ री सोभा में बिरधी करतो हो।” (आपरो सरूप : पेज-39)      
    लोक-रंग अर सामाजिक काण-कायदा ई आं कहाणियां मांय खूब मिलै। बुणगट री दीठ सूं जीवण सूं जुड़्या घटना-प्रसगां रै मारफत कहाणी लिखणो कोई जोशी जी सूं सीखै। “भाड़ेती” कहाणी रै मारफत कहाणीकार अरथावै कै विपदा मांय आदमी कांई कांई नीं कर जावै। जात-पात रै बंधनां नै तोड़ती कहाणी- “प्रेम री मनवार” है तो गरीब नै सतावण री कहाणी “काल ले जाए” है। “कुंवारो चौधरी” मांय ठगां सूं बचाव री बात है तो “छतर –छैंया” अर “घरणी अर भरणी” धन सूं जुड़ी कहाणियां है। जोशी जी री कहाणियां रै नांवां नै लेय’र कैयो जाय सकै कै केई कहाणियां रा नांव साव जूनै ढाळै रा है।
    राजस्थानी भाषा अपणायत रा केई दाखल जोशी जी कहाणियां मांय देख सकां। जियां- “देख रामा, तूं जद जावै तो हरनाथ नै एक बात और अखराये, म्हारै नांव सूं, कै पैली तो तूं कागद राजस्थानी में लिख्या करतो अर अबै तूं कदेई हिंदी अर कदेई अंगरेजी में लिखै। गांव नै भूलग्यो, बाप नै भूलग्यो, पण तूं थारी मातभासा नै ई भूलग्यो। रामा तूं साफ कैय देईजै कै मनै कागद लिखै तो राजस्थानी में लिखै, नईं तो हूं बिना कागद ई सार लेसूं ; तू थारै है जठै राजी-खुसी रै।” (मंगळ बेळा में आंसू : पेज-103)
    “म्हारै हाथ में राजस्थानी भासा रो काणी-संग्रै। काण्यां तो हूं भी लिख्या करूं, पण इण लिखार री सूझबूझम कळपना, भासा माथै इधकार कहावतां-मुहावरां रो प्रयोग तथा दुनिया रो अनुभव देखर तो इयां लागण लाग्यो कै मनै म्हारी काण्यां छपण खातर भेजणी ई नईं चाईजै। एक-एक वाक्य नई, एक-एक सबद इण तरै जचायोड़ो कै थोड़ी-सीक छेड़छाड़ सूं सगळो ढांचो ई खिखर-बिखर हुजावै।” (कथणी अर करणी : पेज- 125)
    इण दूजै दाखलै मांय भाषा-प्रेम भेळै कहाणी पेटै आत्म-मंथन अर असूलां री बातां कहाणीकार कैयी है। आं बातां नै जोशी जी आपरै सांम्ही राख’र कहाणियां लिखी। अध्यात्म, दर्शन, चिंतन आद केई बातां सूं सजी आं कहाणियां रो लोक जोशी जी री खुद री दुनिया सूं जुड़्योड़ो है। लेखकीय दुनिया कीं दरसाव देखणा हुवै तो कहाणियां- “छेकड़ली बात”, “अमर मिनख” अर “कचरो, कादो, कमल” देखी जाय सकै।    
    तुर्गनेव, चेखव आद लिखारां नै कहाणी मांय याद करण रै मिस श्रीलाल नथमल जोशी राजस्थानी कहाणी नै घणी ऊंची जागा देखण रो सपनो देख रैया हा। “साधना नैं तो साधना री मां जाई है। इण साधना रा परताप है कै जे म्हारै इण उपन्यास “अमर मिनख” नै जूनै कागद माथै बोदी रोसनाई सूं रूसी भासा में मांडर तुर्गनेव री अलमारी में राख देवै तो लोग तुर्गनेव री सगळी रचनावां नै भूल जावै, अर “अमर मिनख” उणरी सरब-श्रेष्ठ कृति गिणीजण लाग जावै, अर दस लाख कापी इण री हाथोहाथ बिक जावै। अर जे तुर्गनेव कायम हुवै, अर इण उपन्यास नै रूसी में छप्योड़ो देख लेवै, तो बो सगळा काम धंधा छोड़नै उपन्यास-कळा सीखण खातर पक्कायत म्हारै कनै आवै। विदेसी लोग कला रा पारखी हुवै।“ (अमर मिनख : पेज - 136) आ बात भलाई व्यंग्य मांय कैयी गई हुवै पण इण नैं म्हैं सपनो मानूं। ओ सपनो आपरै बगत मांय जोशी जी री आंख मांय पळतो हो।


Monday, October 22, 2018

हिंदी के लाजबाब कवि और संपादक श्री सुधीर सक्सेना

हिंदी के लाजबाब कवि और संपादक श्री सुधीर सक्सेना के रचना संसार पर केंद्रित भाई रईश अहमद ‘लाली’ द्वारा संपादित पुस्तक ‘जैसे धूप में घना साया’ को सक्सेना जी हाथों प्राप्त करने का अपना सुखद अहसास है। वे न केवल सजग पत्रकार-संपादक है वरन भारतीय भाषाओं के बीच हिंदी के अद्वितीय कवि भी हैं, उनकी कविताओं का एक संचयन अजेस ई रातो है अगूण ( राजस्थानी) मैंने भी किया है और अनेक भाषाओं में उनकी कविताओं के अनुवाद का काम प्रकाशित हो चुका है, हो रहा है.... ऐसे विराट कवि व्यक्तित्व की आत्मीयता मेरी पूंजी है। उन्हें हाल ही में अनंग प्रकाशन द्वारा प्रकाशित ‘राजस्थानी कहानी का वर्तमान’ पुस्तक भेंट की और विविध विषयों पर कल देर तक हमारी चर्चा हुई।





Thursday, October 18, 2018

घिर घिर चेतै आवूंला म्हैं

पुस्तक : घिर घिर चेतै आवूंला म्हैं
लेखक : डॉ. संजीव कुमार
अनुवादक : डॉ. नीरज दइया
प्रकाशक : ज्योति पब्लिकेशंस, बीकानेर
संस्करण : 2018
मूल्य : 150/-
दोनों भाषाओं में दक्ष रचनाकार ही अच्छा अनुवाद कर सकता है। अनुदित रचना को पढ़ते हुए मूल रचना का आस्वाद आए, तब अनुवाद की सफलता है। डॉ. नीरज दइया हिंदी और राजस्थानी दोनों भाषाओं में निष्णात होने से उन के द्वारा अनूदित रचनाओं को पढ़कर पाठक मूल रचना की आत्मा से साक्षात करते हैं। हिंदी के सुपरिचित कवि डॉ. संजीव कुमार के आठ हिंदी कविता संग्रहों से चुनिंदा कविताओं का चयन कर उन्होंने उनका राजस्थानी में मौलिक सदृश्य अनुवाद किया है, इस पुस्तक- ‘घिर घिर चेतै आवूंला म्हैं’ में। इस के माध्यम से राजस्थानी पाठक डॉ. संजीव कुमार के कवि मन से परिचित होंगे।
(दैनिक भास्कर, 18-अक्टूबर-2018, पेज-11)
आभार : श्री मधु आचार्य ‘आशावादी’, श्री बुलाकी शर्मा



Saturday, October 13, 2018

प्रख्यात साहित्यकार सांवर दइया की 70 वीं जयंती

सांवर दइया जयंती पर तीन किताबों का लोकार्पण
राजस्थानी के प्रख्यात साहित्यकार स्व. सांवर दइया की 70 वीं जयंती के अवसर पर 10 अक्टूबर को तीन पुस्तकों का लोकार्पण वरिष्ठ कवि-आलोचक डॉ. आईदान सिंह भाटी, कवि-विचारक डॉ. संजीव कुमार, पत्रकार-साहित्यकार मधु आचार्य ‘आशावादी’ एवं कहानीकार-संपादक डॉ. मदन सैनी ने किया। साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्था ‘मुक्ति’ द्वारा आयोजित कार्यक्रम में सांवर दइया के कहानी संग्रह ‘छोटा-छोटा सुख-दुख’ (संपादक बुलाकी शर्मा), डॉ. संजीव कुमार की कविताओं का राजस्थानी अनुवाद ‘घिर-घिर चेतै आवूंला म्हैं’ (अनुवाद डॉ. नीरज दइया) तथा ‘राजस्थानी कहानी का वर्तमान’ (संपादक डॉ. नीरज दइया) को लोकार्पित किया गया।
            कार्यक्रम के आरंभ में सांवर दइया के चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित कर उनका स्मरण किया गया। मुख्य अतिथि डॉ. आईदान सिंह भाटी ने कहा कि मुझे बेहद खुशी है कि स्व. सांवर दइया ने लोकभाषा में आधुनिकता का प्रवेश करवा समृद्ध किया उनकी कहानी-यात्रा में आज एक नया कहानी संग्रह ‘छोटा-छोटा सुख-दुख’ जुड़ रहा है। राजस्थनी कहानी में सांवर दइया ने आधुनिक युगबोध और नवीता का सूत्रपात किया उनके साहित्य में समाज और जीवन का अविस्मरणीय रूप झलका है। हम अगर व्यक्तिपरक लिखेंगे त़ो हमारा नाम बहुत दूर तक नहीं जाएगा। जबकि सांवरजी लोक-मन के कवि-कथाकार थे। डॉ. नीरज दइया ने युवा साहित्यकारों के सामने ‘राजस्थानी कहानी का वर्तमान’ देकर एक प्रतिमान प्रस्तुत किया है।
            कार्यक्रम में प्रख्यात रंगकर्मी और साहित्यकार मधु आचार्य ‘आशावादी’ ने कहा कि सांवर दइया ने कहानी में नाटक के अनेक तत्वों का प्रयोग करते हुए कहानी की रूढ़ता को निरंतर दूर करते हुए संवेदनशील रचनाकार होने का परिचय दिया। डॉ. नीरज दइया की राजस्थानी भाषा में गहरी पकड़ को इस अनूदीत कृति में देखा जा सकता है, उन्होंने कविता को ठेठ राजस्थानी भाषा के मुहावरे में ढालने में सफलता अर्जित की है। आलोचना के क्षेत्र में डॉ. नीरज के कार्यों की सराहना करते हुए उन्होंने कहा कि वे पूरी समझ, सूझबूझ और दृष्टि के साथ कार्य कर रहे हैं।
    वरिष्ठ कहानीकार-संपादक डॉ. मदन सैनी ने कहा कि सांवर दइया आधुनिक गद्य साहित्य की धूरी थे। उनकी कहानियां अपने आप में एक मिशाल है। वे समाज के केंद्र में रखकर लिखते थे इसलिए आधुनिक साहित्य में अग्रिम पंक्ति के रचनाकार कहे जाते हैं। उनकी कहानी को लेकर सूक्ष्म दृष्टि अनुकरणीय है। नीरज दइया अपने पिता के पद्चिह्नों पर चलते हुए राजस्थानी-हिंदी साहित्य में ख्यातिप्राप्त रचनाकार के रूप में पहचाने जाने लगे हैं। उनकी दोनों भाषाओं में समान अधिकार के चलते डॉ. संजीव कुमार की कविताओं का उन्होंने बेहद पठनीय और उपयुक्त अनुवाद किया है। आलोचना के क्षेत्र में जो कमी है उसे डॉ. नीरज निरंतर अपने सृजन से पूरा कर रहे हैं। बुलाकी शर्मा ने सांवर दइया की दस अप्रकाशित कहानियों को प्रस्तुत कर सराहनीय कार्य किया है।
            व्यंग्यकार कहानीकार बुलाकी शर्मा ने अपने उद्बोधन में कहा कि सांवर दइया की कहानी कला अपने आरंभिक काल से युवाओं के लिए प्रेरक और प्रतिमान के रूप में पहचानी जाने लगी थी। उन्होंने राजस्थानी कहानी को आगे बढ़ाते हुए अनेक शैल्पिक प्रयोग किए। डॉ. नीरज दइया विविध विधाओं में लिखते हुए राजस्थनी के गौरव में अभिवृद्धि करने वाले युवा साहित्यकार है। शर्मा के कहा कि राजस्थानी कहानी का वर्तमान जैसी पुस्तक से राजस्थानी कहानी का यश दूर दूर तक फैलेगा।
    इस अवसर पर कवि डॉ. संजीव कुमार ने अपनी चयनित बोलते पत्थर, कौन कहता है, चुक जाता है एक दिन इत्यादि कविताएं सुनाकर दाद बटोरी तो वहीं मन के सूनेपन पर कविता ने सोचने के लिए विवश किया। डॉ. नीरज दइया ने संग्रह से अनूदीत कविताओं का पाठ किया तथा अपनी रचना-प्रक्रिया पर प्रकाश डाला। संस्था द्वारा कवि डॉ. संजीव कुमार, डॉ. आईदानसिंह भाटी, मधु आचार्य आशावादी, अनंगपाल सिंह चौहान, मनमोहन कल्याणी, सरल विशारद, मयंक पारीक आदि अतिथियों का संस्था द्वारा शॉल ओढ़ाकर सम्मान किया गया। इस अवसर पर डॉ. नीरज दइया ने अपने परिजनों और साहित्यकारों को पुस्तकें भेंट की।
            लोकार्पण समारोह में साहित्यकार हरदर्शन सहगल, सरदार अली परिहार, सरल विशारद, अनंगपाल सिंह चौहान, विद्यासागर आचार्य, डॉ. मुरारी शर्मा, ओम प्रकाश सारस्वत, चंद्र शेखर जोशी, सरजीत सिंह, अनिरूद्ध उमट, मंदाकिनी जोशी, मोनिका गौड़, लोकेश आचार्य, राकेश टी. कांतिवाल, सन्नू हर्ष, जाकिर अदीब, प्रो. अजय जोशी, सरल विशारद, मोनिका गौड़, मयंक पारीक, नंदलाल दइया, जेठमल सोलंकी, रवींद्र यादव, नगेंद्र किराडू, विनोद सारस्वत, हरीश बी. शर्मा, प्रमोद शर्मा, योगेंद्र पुरोहित, डॉ. नमामीशंकर आचार्य, डॉ. गौरीशंकर आचार्य आदि उपस्थित थे।
            स्वागत भाषण में कवि-कहानीकार राजाराम स्वर्णकार ने आगंतुकों का स्वागत करते हुए सांवर दइया को आधुनिक साहित्य का पुरोधा बताया। उन्होंने कहा कि बीकानेर में राजस्थानी लेखकों और किताबों की संख्या बढ़ती जा रही है। अंत में आभार कवि-कहानीकार नवनीत पाण्डे ने ज्ञापित किया तथा कार्यक्रम का संचालन कवि-कहानीकार राजेंद्र जोशी ने किया।

राजेंद्र जोशी
सचिव- मुक्ति













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स्मृति में यह संचयन "नेगचार"

स्मृति में यह संचयन "नेगचार"
श्री सांवर दइया; 10 अक्टूबर,1948 - 30 जुलाई,1992

डॉ. नीरज दइया (1968)
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