Tuesday, May 16, 2017

बंतळ / डॉ. मदन सैनी सूं डॉ. नीरज दइया


अनुवाद इच्छा सूं करां तो आणंद आवै

(ऊरमावान साहित्यकार डॉ. मदन सैनी ‘फुरसत’ कहाणी रै मारफत घणा चरचा में रैया। ‘फुरसत’ नांव सूं ई आप रो कहाणी संग्रै प्रकाशित हुयो, जिण नै राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी, बीकानेर रो मुरलीधर व्यास ‘राजस्थानी’ कथा पुरस्कार ई मिल्यो। दूजो कहाणी संग्रै ‘भोळी बातां’ अर निबंध संग्रै ‘सिरजण री साख’ ई चरचा में रैया। डॉ. मदन सैनी री ओळखाण शोध अर संपादन रै सीगै ई जसजोग मानीजै। आप ‘राजस्थानी काव्य में रामकथा’ विषय माथै शोध अर ‘रामरासौ’, ‘सीत-पुराण’, ‘कृष्णावतार’ अर ‘रामरास’ आद मेहतावू पोथ्यां रो संपादन करियो। राजेन्द्र केडिया रै हिंदी उपन्यास रो उल्थो ‘मदन बावनियो’ (2011) नांव सूं आप करियो, जिण माथै आपनै साहित्य अकादेमी रो अनुवाद पुरस्कार 2015 अरपित करीजैला। विविध विधावां में लगोलग लिखणिया सैनी जी री केई पोथ्यां हिंदी में ई छप्योड़ी। आप आं दिनां राजकीय महाविद्यालय, नोखा में हिंदी व्याख्याता रो कारज संभाळै। चावा-ठावा कवि-आलोचक डॉ. नीरज दइया आप सूं आ बंतळ करी है।  -संपादक)

·         सब सूं पैली आपनै अनुवाद पुरस्कार खातर बधाई। आपनै अनुवाद-पुरस्कार रो सुण’र कियां लाग्यो?
·         अनुवाद पुरस्कार मिलणो अप्रत्यासित-सो लाग्यो। हालांकै म्हैं आ मनै-गनै जाणतो कै अनुवाद तो चोखो करियो है, ओ अठै युगपक्ष छापै में धारावाहिक छप्यो भी अर खूब तारीफ ई मिली।  
·         आप ओ अनुवाद करियो क्यूं?
·         हिंदी में जद म्हैं राजेन्द्र केडिया रो उपन्यास बांच्यो तद लाग्यो कै हिंदी में हुवतां थकां ई अठै रै परिवेस, लोकरंग, संस्कृति, मनोरंजन, छळ-छदम री केई-केई बातां जूनी ओळूं दांई इण में अंबेरियोड़ी है, तो लाग्यो कै ओ तो राजस्थानी भाषा में हुवणो चाइजै। इण री कथा-वस्तु सूं म्हैं घणो प्रभावित हुयो।
·         केडिया जी तो राजस्थान रा है अर राजस्थानी जाणै तद बां हिंदी में क्यूं लिख्यो?
·         उपन्यासकार राजेन्द्र केडिया राजस्थान रा है, सो म्हैं जद बात करी, बां नै कैयो कै ओ तो राजस्थानी में लिखणो हो तद बै कैयो- म्हैं तो शेखावाटी बोलणी जाणूं, जिकी प्रोपर राजस्थानी सूं दूर पड़ै.... सो म्हैं हिंदी में लिख्यो। म्हैं कैयो- प्रोपर राजस्थानी तो म्हारी है, जे आप कैवो तो म्हैं अनुवाद करूं। बै बोल्या- आप चावो तो करो, म्हनै हरख हुवैला। म्हारो मानणो है कै जे आपां अनुवाद इच्छा सूं करां तो आणंद आवै।
·         कांई इण नै संजोग कैवां कै आपरै नांव रो पात्र इण उपन्यास मांय घणो जोरदार है अर कांई इण रो नांव आपरै नांव सूं मिलै सो आप अनुवाद करण री सोची?  
·         हां ओ संजोग है कै इण उपन्यास रो मुख्य पात्र मदन है। म्हैं केडिया जी नै कैयो कै ओ मदन बावनियो के चीज है? बै कैयो- मदन जी, ओ संजोग है कै म्हारै उपन्यास में बावनियै रो नाम मदन है, आप म्हारै ध्यान में नीं हा। ओ म्हारो पात्र है। म्हैं कैयो- भिजवाओ मैं बांचू अर बांच’र लाग्यो कै ओ छोटी कद-काठी रो बावनियो दलित व्यक्ति घणो प्रभावित करण री खिमता राखै। ओ मदन बावनियो सामाज में संघर्ष कर’र ठावी ठौड़ ई प्राप्त नीं करै जद कै नवी थरपणावां ई करै। इसा प्रेरक चरित्र साहित्य में आवणा चाइजै। इण ढाळै री पोथ्यां राजस्थानी में कमती है। छप्यां म्हैं जद डॉ. भूपतिराम साकरिया नै आ पोथी भेजी तद बां फोन करियो- अरे मदन तूं तो डीगो हुतो रै, बावनियो कद हुयग्यो? म्हैं कैयो- गुरुजी म्हैं नीं ओ उपन्यास रो चरित्र है। बै बोल्या- ठीक है भाई म्हैं पढ’र बताऊं कै तूं है कै कोई ओर है। 
·          ‘मदन बावनियो’ पोथी बरस 2013 सूं पुरस्कार री दौड़ में सामिल ही पण पैली इण नै इनाम क्यूं कोनी मिल्यो?
·         हुय सकै पैलड़ा निर्णायकां नै आ पोथी ठीक नीं लागी हुवैला। अबकाळै लागी तद मिलग्यो। इण पोथी रो ओ आखरी साल हो। आ कोई अचरज री बात कोनी। अकादमी री आपरी रीति-नीति है। केई बार इयां हुवै कै पैलै बरस में जिकी रिजेक्ट हुय जावै, बा आवतै बरस पास करीज जावै। जे म्हारी आ पोथी अबै योग्य घोषित हुई तो पैली भी योग्य ही का कोनी ही?
·         पुरस्कार री दौड़ में जियां अबकी म्हारी खुद अर दूजा अनुवादकां री पोथ्यां सामिल ही। तो कांई ओ पुरस्कार अनुवाद री गुणवत्ता रो माळीपानो है का इण रो अरथाव है कै जिण नै नीं मिल्यो बै इण पोथी सूं कमजोर किताबां है?
·         म्हारो मानणो एकदम साफ है कै जिकी किताब बठै पूगगी बै कमजोर तो है ई कोनी। पुरस्कार तो तीन निर्णायकां माथै टिक्योड़ो है अर किणी एक नै मिलणो हुवै। हरेक रो आपरो तरक अर चयन हुवै। ओ अनुवाद पुरस्कार तीन निर्णायकां रो सामूहिक एक चयन है। अठै आ जरूर है कै कमी-बेसी बतावतां जिकी पोथ्यां आयै बरस एकर रिजेक्ट हुवै बै आगली बार फेर सामिल हुय’र पुरस्कार लेय सकै। नांव गिणावण री जरूरत कोनी पण इसा केई दाखला आपां सब रै ध्यान में है।
·         पोथी में मूळ लेखक री बात तो फ्लैप माथै आप दी हो, पण मदन बावनियै रै अनुवाद पेटै आपरी बात नीं लिखी।
·         म्हैं मूळ लेखक री बात ई आगै लाय रैयो हूं सो मूळ लेखक री बात दी है। म्हैं तटस्थ रैय’र बस अनुवाद करियो है। म्हारी बात आप पूछ रैया हो सो म्हारी बात अलायदी ई आसी।
·         पोथ्यां कमती हुवण रो एक कारण प्रकाशन री अबखायां है, इण बाबत कीं बताओ।
·         उपन्यासकार री मंजूरी पछै जद म्हैं इण रो अनुवाद कर’र केडिया जी नै भेज्यो तद बां कैयो- अनुवाद तो चोखो हुयग्यो, अब कांई करियो जावै। तद म्हैं कैयो- कीं सैयोग करो तो छपावां। बै बोल्या- पांच हजार रिपिया भिजवाऊं थांनै, बाकी थे देख लिया। जद म्हैं विकास प्रकाशन सूं बात करी तद बै बोल्या- लोग राजस्थानी री किताब खरीदै तो कम है, जे आधो स्सारो थे लगाओ तो आधो म्हैं लागाऊं। तो इयां छपग्यो, छप्यां बाद अकादेमी री प्रक्रिया में पांच पोथ्यां प्रकाशक सूं मांगी जावै तो म्हारी ई मांगी गई। म्हारो प्रकाशक म्हनै बतायो- पांच-पांच किताबां दो बार दिल्ली गई है। म्हनै लग्यो- आपां नै पुरस्कार मिल सकै अर मिलग्यो।
·         ‘मदन बावनियो’ पोथी छप्यां नै पांच बरस हुयग्या, कांई आप फेर कोई अनुवाद नीं करियो?
·         नीं क्यूं, करियो है नीं। म्हैं अकादेमी नै एक प्रस्ताव भेज्यो कै भगवती कुमार शर्मा रै पुरस्कृत गुजराती उपन्यास ‘असूर्यलोक’ रो राजस्थानी अनुवाद करणो चावूं, जिको मंजूर हुयग्यो अर म्हैं अनुवाद कर’र भेज ई दियो।
·         कांई ओ अनुवाद मूळ गुजराती सूं करियो का हिंदी सूं, क्यूं कै ओ उपन्यास अकादेमी हिंदी में आगूंच छाप राख्यो है?
·         म्हैं शोध रै दिनां गुजरात-प्रवास में गुजराती सीख ली, पण पूरो अधिकार नीं हुवण रै कारण ओ अनुवाद म्हैं हिंदी सूं करणो स्वीकार करियो, पण बिचाळै मूळ सूं मिलान ई करियो। ‘अंधारलोक’ नांव सूं करीजियोड़ै इण अनुवाद सारू म्हारो मानणो है कै इण रो जिको हिंदी अनुवाद हुयोड़ो है, ओ उण सूं इधको है। इण उपन्यास में तीन पीढियां रै आंधै लोगां री कथा है। बै सगळा काम कर’र समाज में एक मानक स्थापित करै। ओ संयोग है कै मदन बावनियो है अर अठै आंधां लोगां री कथा है। मुख्य धारा सूं लारै रैयोड़ा दलित-शोषित अर पीड़ित चरित्र म्हनै घणा अपील करै।
·         आप तो खुद चावा-ठावा कहाणीकार हो अर केई बेजोड़ चरित्र कहाणियां रै मारफत रचिया हो, तो क्यूं नीं उपन्यास अनुवाद री ठौड़ कोई मूळ उपन्यास ई राजस्थानी में लिखो।
·         कहाणी छोटी बैठक में तैयार हुय जावै, उपन्यास में युगबोध अर युग संदर्भ हुवै तो टैम लागै। मूळ राजस्थानी में आछो उपन्यास लिखण री म्हारै मन में है अर थोड़ो नेठाव सूं बरस-दो बरस में लिखसूं। सगळा चरित्र अर विषयवस्तु म्हारै ध्यान में है बस हाथ मांयला काम कर’र जराक ओसाण मिल जावै तो लिखूंला।
·         राजस्थानी रै लेखकां नै हिंदी आवै अर केई तो मानै कै हिंदी अर राजस्थानी में फरक ई कोनी। आपरो कांई मानणो है?
·         आपां रै अठै पाठ्यक्रम में हिंदी माध्यम हुवण सूं सगळां नै हिंदी आवै। हालत आ हुयगी कै राजस्थानी बांचण में अठै लोगां नै रुचि नीं है अर अळगत आवै। अठै तांई सुणां कै हिंदी हुवती तो पढ लेवता राजस्थानी तो संस्कृत दांई घणी अबखी है। अबै होळै होळै राजस्थानी रै प्रति जागरूकता आय रैयी है- दूरदर्शन, आकाशवाणी, इंटरनेट, पत्र-पत्रिकावां, सिनेमा अर बोर्ड-विश्वविद्यालया में घणो काम हुय रैयो है। अबै राजस्थानी रो पाठक वर्ग बध रैयो है।       
·         म्हारो असल सवाल है कै आपां हिंदी री रोटी खावां, फेर राजस्थानी भाषा में क्यूं लिखां। जद कै केई अबखायां है?
·         हिंदी आजीविका रो माध्यम है अर राजस्थानी मातृभाषा है। हिंदी में पढाई करी अर सुणतां रैया कै दो आंक सीख लेसी तो काम आसी। मतलब हिंदी रा दो आंक राजस्थानी रै माध्यम सूं सीख’र इण लेखै जुड़िया। आ परिवेश री बात है कै राजस्थानी पेटै आपां रो मोह बेसी है। दूजी भाषा करतां अपणायत अर आत्मिक सुख सारू राजस्थानी भाषा आपां खातर घणी सबळ है। आपां आपणी भाषा में लिखां तो चोखी बात है। अबखायां तो है पण इत्ती ई कोनी कै आपां परबस हुय जावां। हिंदी-अंग्रेजी अनुवाद रै माध्यम सूं आपां री राजस्थानी रचनावां बड़ै पाठक वर्ग तांई पूग ई रैयी है।
·         राजस्थानी करतां हिंदी रो पाठक वर्ग बेसी है। राजस्थानी में मान्यता कोनी, अकादमी बंद पड़ी है, पत्र-पत्रिकावां कमती है अर पोथ्यां माथै छपण-बिकण रो संकट है। इसै माहौल अर आं हालात नै देखता थका राजस्थानी में क्यूं लिखां?
·         आ बात सही कही कै व्यापक प्रचार-प्रसार अबार कोनी। मीडिया अर प्रकाशन तंत्र में गुंजाइस निजर नीं आवै, पण लिखण मांय तो कोई पाबंदी कोनी। जूना हस्तलिखित ग्रंथ अजेस ग्रंथालयां में भरिया पड़िया है, पांडुलिपियां है जिकी संपादित कोनी हुई, छपी कोनी, पण बै लोग लिख्या हा तो क्यूं नीं आपां स्वातः सुखाय आत्मिक सुख खातर कोई चीज आछी लागै तो लिखां। मौलिक लिखां अर अनुवाद ई करां तद ई बातां चालसी।
·         कांई राजस्थानी में लिखणो फगत आत्मिक सुख ई है का कोई दूजो लाभ ई अठै मिलै।
·         म्हैं म्हारी बात करूं तो ओ आत्मिक सुख है। कहाणी लिखूं अर जद छप्यां पाठकां रो कोई फोन आवै तो समझूं मोटो पुरस्कार मिलग्यो। लिखणो-छपणो तो जस री कामना सूं ई हुवै। आप रो जिको संकेत पुरस्कार आद कानी है बा तो मामूली बात है। नगद रिपियां सूं बेसी हुवै- सामाजिक सरोकार अर सामाजिक दायित्व निभावणै रो काम। म्हैं खुद रै संतोख अर समाज-हित सारू ई लिखूं।
·         साहित्य अकादेमी सूं भारतीय भाषावां री हिंदी में आगूंच छपी मोटी-मोटी पोथ्यां रा केई कीमती अनुवाद छप्या है, जद कै बांचण अर खरीदणवाळां री कमी है। इण बाबत आपरो कांई मानणो है?
·         बै अगर हिंदी में छप्योड़ी है तो म्हारो कैवणो है लोग पैली बां नै ई पढ लेसी। पाठक राजस्थानी में ज्यादा रुचि नीं लेवैला। चायै कित्तो ई अच्छो अनुवाद क्यूं नीं हुवै। जिकी हिंदी में नीं हुवै बां रो अनुवाद हुवै तो सावळ बात मानीजै।
·         राजस्थानी रा लेखक हिंदी जाणै अर जे बै हिंदी में लिखसी तो घणा लोग पढ लेसी, फेर राजस्थानी में लिखै ई क्यूं?
·         म्हैं पैली कैय दियो कै लेखन अर अनुवाद कारज आत्मिक संतोख खातर करीजै। आपां जे खुद री भाषा में लिख’र राजी हुय रैयां हां तो आ एक मोटी बात है। हिंदी री कोई बात सावळसर राजस्थानी में लिखां अर बांचां तो आपां नै आणंद मिलै। अनुवाद इच्छा सूं करां तो आणंद मिलै, म्हैं आप नै बतायो हो।
·         एक रचनाकार किणी विचार नै मगज मांय लेवै, उण सूं प्रभावित हुवै तद रचना रो विचार आवै। उण टैम भाषा रो चुनाव कियां करीजै, म्हारो सवाल है कै माध्यम भाषा रो चुनाव कांई किणी विकल्प रै रूप मांय हुवै? आप कांई मानो।
·         रचना रै केंद्र में कोई खास विचार मन में हुयां उण री खबसूरती नै थोड़ै-सै सबदां मांय प्रगट करां तो माध्यम कविता हुवै। कविता में ई परिवेस मोटी बात हुवै, देखां कै परिवेस घोरां री घरती रो है, तद राजस्थानी में अर जद सीतल प्रदेश का समदर री छोळां री बातां करां कै पहाड़ां री तो इण स्थिति में बै संस्कार अठै रा नीं हुवण सूं आपां माध्यम हिंदी लेवां क्यूं कै बठै आपां उण परिवेस सूं आपां जुड़ियोड़ा हां।
·         आप कैवणी चावो कै भाषा लेखक रै मन-मगज री स्वतंत्रता है?
·         हां, आपां अधिकार अर विषय रै हिसाब सूं भाषा नै लेवां। तद ई कविता, कहाणी अर उपन्यास में ढाळतां आपां न्याय करालां अर बड़ो आणंद आवैला। प्राथमिकता इणी हिसाब सूं तय करीजै।
·         केई लेखक एक रचना नै दोनूं भाषावां में मौलिक बता’र छपावै। किणी रचना री कोई एक मूळ भाषा हुया करै अर कांई मूळ लेखक जद उण रो अनुवाद दूजी भाषा में करै तद बा रचना मूळ हुय जावै?
·         इण नै इयां देखो कै म्हैं एक राजस्थानी में भोत चोखी रचना लिख ली अर जियां म्हारी एक चावी कहाणी ‘भेड़ें’ जिकी म्हैं राजस्थानी में लिखी। उण नै हिंदी में बांचसो तो लागसी कै राजस्थानी में अनुवाद करियोड़ो है। बा मूळ मधुमती रै युवा कथाकार विशेषांक में छपी। बा हिंदी में आई तद हिंदी री हुई अर पुराणी पांडुलिपि लाध जासी, म्हैं लिखी तद राजस्थानी में लिखी। बा हाल राजस्थानी में छपी ई कोनी, जद कै बा राजस्थानी री मूळ ही। हिंदी में पैली छपी तद हिंदी री ई मूळ मानी जावै।
·         कोई एक रचना दो भाषावां में मूळ कियां हुय सकै? अनुवाद नै तो आपां दोयम दरजै रो मानता रैया हां।
·         आ खरी बात है कै अनुवाद करां तद उण में मूळ रो आणंद तो नीं आवै। आप जे भेड़ें पढ लो तो लागसी आंचलिकता हावी हुयगी है, आ तो राजस्थानी में हुवणी चाइजै ही। प्रोपर अनुवाद में ई थोड़ो-घणो फरक तो रैवै। मूळ रो मजो अनुवाद में नीं आय सकै।
·         मानलां कै भाषा स्वतंत्रता एक लेखक री स्वतंत्रता है, पण एक लेखक जद खुद री रचना नै दूसरी भाषा में लेय’र जावै तद लेखक री नैतिकता कांई आ कोनी कै बो उण नै अनुवाद बतावै।
·         हां, आ बात तो म्हैं आप नै ई कैयी हूं कै आप जद भारतीय भाषावां री कवितावां रो अनुवाद ‘सबद-नाद’ में करियो जद उण में माध्यम भाषा रो नांव कोनी दियो। अनुवादक नै आपरै वर्जन रो आधार बताणो चाइजै कै मूळ तो आ है अर म्हैं इण रो हिंदी का अंग्रेजी सूं अनुवाद करियो है। जे ओ हुवै तो आ ईमानदारी री बात है। जे किणी लेखक री रचना मूळ का अनुवाद रै माध्यम सूं अलग-अलग भाषा में छपै तो बो बेसी पाठक वर्ग तांई पूगै, इण माथै कोई आपत्ति नीं है। प्रचार-प्रसार करणो उपलब्धि मानी जावै।
·         आ तो आंख्यां दीखती बात है कै भारत री चौबीस भाषावां म्हनै कोनी आवै। आखै भारत री कविता रो जायको का कैवां एक दाखलो राखण रो काम ‘सबद-नाद’ रै मारफत म्हैं करियो। कांई आप नै लगैटगै सगळा अनुवादकां में ओ दोस नीं लखावै, जिण बाबत आप कैय रैया हो। साहित्य अकादेमी रा घणा अनुवाद मूळ भाषा सूं नीं हुय’र हिंदी सूं क्षेत्रीय भाषावां में आया है।
·         म्हैं अंधारलोक, जिकी मूळ गुजराती री पोथी है, इण रो माध्यम भाषा हिंदी सूं अनुवाद करियो है। म्हनै गुजराती आवै अर म्हैं गुजराती पत्र-पत्रिकावां रो पाठक हूं, पण म्हनै लाग्यो कै मूळ सूं कैरियां म्हैं न्याय नीं कर सकूंला सो हिंदी-वर्जन सूं करणो स्वीकार करियो। मूळ अर हिंदी-वर्जन सूं अनुवाद में अकादेमी-मानदेय में ई फरक है, पण म्हैं कमती में ही राजी हूं। हिंदी सूं काम करतां मूळ ई साथै राख्यो तद लखायो कै हिंदी अनुवाद में केई जागां झोल है। अटकियो जद मूळ सूं मिलायो तो लाग्यो कै केई ठौड़ केई ओळियां तो कठैई कोई पैराग्राफ ई हिंदी-अनुवाद में गायब है। तो ओपतो तो ओ ई है कै मूळ सूं अनुवाद हुवणो चाइजै। अनुवाद री गड़बड़ तो मूळ सूं मिलायां ई ठाह लाग सकै।   
·         अनुवाद हियै मांयली हूंस का जरूरत नीं हुय’र साहित्य अकादेमी में केई अनुवादकां इण नै दो पइसा भेळा करण रो रोजगार बणा लियो। इण पेटै आपरो कांई कैवणो है।
·         हां, इसा लोग है पण कांई कैवां, आर्थिक जुग है इण मांय अर्थ कमावण रै साधना में ओ भी सामिल है। आ सुविधा मिल सकै तो क्यूं नीं लाभ मिलै। खाली सूं तो बेगार भली। काम करै कोई तो आछी बात है अर म्हारै तांई तो म्हैं कैवणी चावूं कै सरकार कानी सूं म्हनै तो टाबरां नै भणावण सारू हर महीनै लखटकियो पुरस्कार मिल रैयो है। आपां तो मनसा-परवाण इण काम नै करां, साहित्य आपां खातर सामाजिक सरोकार रो काम है, जिको आगै आणो चाइजै, लोग बांचै अर सरावै तो इण काम री सारथकता है। 
·         अनुवाद अर मूळ लेखन में भाषा री समरूपता अर मानक-सरूप पेटै आप रो कांई कैवणो है।
·         भाषा रै मरम का कैवां काळजै री जाणकारी तो लेखक नै हुवणी ई चाइजै। ओ निर्वाह करियां बिना आपां भाषा साथै न्याय नीं कर सकांला। भौगौलिक परिवेस रै कारण हरेक भाषा रा नेम-कायदा हुवै, राजस्थानी में संबंध बोधक विभक्ति प्रयोग रा री रो है। ओ प्रयोग ई प्रोपर राजस्थानी है। गुजराती में ना नी, हिंदी में का की, सिंधी में जा जी, पंजाबी में दा दी अर मराठी में चा ची रो प्रयोग एक भौगौलिक परिवेस री भाषा में व्यंजना है। आ भाषा री पिछाण है। भाषा-बोल्यां रा सबद सगळा प्रयोग करो पण उणां नै आत्मसात कर’र प्रयोग करणो चाइजै।
·         राजस्थानी पेटै कैयो जावै कै इण भाषा में न्यारी-न्यारी बोल्यां है, एक भाषा कोनी।
·         हिंदी में ई इयां है, बा एक कोनी। मध्यकालीन हिंदी साहित्य का आदिकाल रो साहित्य देखो तो आपनै लागसी कै आ हिंदी है कांई। जे बां सगळी बोल्यां नै आप हिंदी मानो तो राजस्थानी खातर ओ सवाल क्यूं? भोजपुरी, राजस्थानी, मैथिली, ब्रज, अवधी सगळी हिंदी रै खातै खतीजी है। किणी भाषा री ओळखाण व्याकरण सूं हुवै, व्याकरण ई किणी भाषा रो मानक रूप बणावै। राजस्थानी में व्याकरण रै आधार पर मानकीकरण री दीठ सूं मध्यकालीन राजस्थानी नै आधुनिक राजस्थानी रै रूप में ढाळण रो काम हुवणो चाइजै।
·         आज रा विकट हालात देखतां थकां राजस्थानी रो भविष्य आप नै कांई लागै?
·         म्हनै तो भविष्य भोत उजळो लागै। म्हारै नवीं-दसवीं रै पाठ्यक्रम में राजस्थानी कवि हा- रेंवतदान चारण, कन्हैयालाल सेठिया, नारायणसिंह भाटी पण पछै बां नै हटा दिया अर राजस्थानी री न्यारी मांग उठी। पाठ्यक्रम में बोर्ड अर विश्वविद्यालयां में राजस्थानी खुली, आकाशवाणी अर दूरदर्शन में राजस्थानी रो प्रयोग हुवण लाग्यो। राजस्थानी अकादमी री न्यारी थरपणा हुई। पीएचडी ई हुवण लागगी राजस्थानी में। टेली फिल्मां अर फिल्मां सूं प्रचार हुयो। नवै जुग री भाषा राजस्थानी बणती जाय रैयी है। विग्यापनां में राजस्थानी रो प्रयोग हुवण लागग्यो। समाज अर लेखक मान्यता दे राखी है तद केंद्र सूं ई मान्यता मिलैला।
·         कथेसर रै माध्यम सूं नवा अनुवादकां अर युवा लेखकां नै कांई कीं कैवणो चावो?
·         म्हारो कैवणो है कै राजस्थानी में खूब मौलिक लिखणै रै सागै गंभीरता सूं अनुवाद रो काम ई हुवणो चाइजै। कोई कवि-लेखक अनुवाद रै मारफत दूजी-दूजी भाषावां अर साहित्य रै सीगै ऊंडो उतर सकै। युवा लेखक खूब बांचै अर सोच समझ’र जिम्मेदारी सूं लिखै तो राजस्थानी में बो दिन दूर कोनी जद स्सौ-कीं आपां रै पख में हुवैला।
·         कथेसर कहाणी पत्रिका पेटै आपरी राय कांई है?
·         कथेसर चोखो काम कर रैयी है। नवा कहाणीकारां नै साम्हीं लावण अर भाषा पेटै संपादकां री खेचळ साफ निगै आवै। इण सूं चरचा अर बातचीत रो एक माहौल बणियो है, जिको घणो जरूरी है। पत्रिका पख-विपख नै समान रूप सूं साम्हीं लावण रो माध्यम हुवणी चाइजै अर कथेसर ओ कारज कर रैयी है, इण खातर कथेसर नै मोकळी शुभकामनावां।

डॉ. मदन सैनी
अनाथालय रै लारै, विवेक नगर
बीकानेर- 334001
ई-मेल : dr.mls1958@gmail.com
मो. 7597055150
डॉ. नीरज दइया
सी-107, वल्लभ गार्डन, पवनपुरी,
बीकानेर- 334003
ई-मेल : neerajdaiya@gmail.com
मो. : 9461375668

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स्मृति में यह संचयन "नेगचार"

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श्री सांवर दइया; 10 अक्टूबर,1948 - 30 जुलाई,1992
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