Saturday, November 19, 2011

री-चार्ज (राजस्थानी लघुनाटक)

 मूल : मनोज कुमार स्वामी
अनुवाद : नीरज दइया

पात्र
अशोक      : दुकान का मालिक
                                    हरीश       : दुकान पर काम करने वाला
अनिल      : दुकान का सेल्स मेन
भगवान     : भगवान
नारदजी     : नारद मुनि
एक आदमी : मरीज का पुत्र
ॉक्टर                  :  डॉक्टर
दूसरा आदमी      : दूसरे बीमार का पुत्र
तीसरा आदमी : नेता जी का चमचा
मोबाइल कंप्यूटर की आवाज
औरत


दृश्य : एक
(दुकान का दृश्य, मोबाइल की दुकान, अशोक, हरीश, अनिल बातचीत कर रहे हैं)

अशोक -
लाईफ टाइम हो गए अधिकतर कनेक्शन, अब अपना काम कैसे चलेगा ?
अनिल -

काम कैसे नहीं चलेगा, अभी तो लोग-बाग आ रहे हैं । दस-बीस का री-चार्ज करवाने के लिए ।
अशोक -
दस-बीस रुपए से शो-रूम का खरचा निकलेगा क्या ? बिजली के मीटर की चकरी घूमती है तब, एक यूनिट के सात रुपए आते हैं ।
हरीश -
हमने चतुराई तो बहुत की, लेकिन ग्राहक तो हमसे भी होशियार है । अपना काम मिस कॉल से ही निकाल लेता है ।
अनिल -
बात करेंगे तो भी, तुम चिंता मत करना, मैं मिस कॉल कर दूंगा ठीक । और रोटी बनाते ही तू मिस कॉल कर देना । चिंतावाली बात हुई तो मैं तीन-चार मिस कॉल कर दूंगी तब आप समझ जाना । और मुफ्त वाले से बात कर लेना ।
आशोक-
तो अब क्या करें ? इस तरह अपना निर्वाह कैसे होगा ? (सभी एक साथ बोलते हैं) सोचो-सोचो, हां-हां, सोचो-सोचो…… ।
अनिल -
अरे। सुनो सुनो, मेरे दिमाक में एक आइडिया आया है ।
अशोक -
बता बता, जल्दी से बता दे वर्ना भूल जाएगा ।
अनिल -
यदि आदमी की उम्र री-चार्ज का ठेका हमें मिल जाए तो कैसा रहे ?
हरीश -
फिर तो आनंद ही आनंद है, लेकिन यह होगा कैसे ?
अनिल -
मैं बता दूं …?
हरीश -
बता-बता ।
अनिल -
हम भगवान की तपस्या करेंगे ।
अशोक -
हें… तपस्या करेंगे ? तपस्या क्या ऐसे ही बातों से होती है ?
अनिल -
हम भगवान को खुश कर लेंगे ।
हरीश -
भगवान भी क्या आराम से खुश थोड़े ही हो जाते हैं ! इस के लिए तपस्या करनी होगी । और तपस्या के लिए निर्मल मन चाहिए, हमारे मन तो कालिख से भरे पड़े हैं ।
अनिल -
लिजिए, यही तो तुम्हें मालूम नहीं ।
अशोक -
क्या नहीं मालूम ?
अनिल -
भगवान होते हैं भोलेनाथ- उन्हें क्या पता कि हमारे मनों में क्या है ? और हम बेहतरीन चढ़ावे बोलेंगे, पैदल यात्राएं बोलेंगे…।
अशोक -
फिर वे चढ़ावे और यात्राएं पूरी भी करनी होगी तब …?
अनिल -
हुं… पूरी किस लिए करनी होगी ! भगवान तो भूल जाएंगे … इतने में किसी दूसरे भक्त की तरफ वे ध्यान लगा देंगे… ।
हरीश -
तब ठीक है । पर मांगना क्या है ?
अनिल -
मांगना है लाईफ टाईम री-चार्ज !
अशोक -
तो फिर तपस्या किस लिए कर रहे हैं ! लाईफ टाईम री-चार्ज तो अपने पास बहुत ही रखें हैं … और फिर रोना भी किस बात है !
अनिल -
अरे चतुराई की दुम यह लाईफ टाईम री-चार्ज नहीं ।
हरीश -
तो फिर… ?
अनिल -
हम मांगेंगे आदमी की उम्र का लाईफ टाईम री-चार्ज करने का वरदान ।
अशोक -
तो ऐसे कहना था पहले साफ-साफ ।
हरीश -
फिर तो हमारे व्यारे न्यारे हो जाएंगे ।
अशोक -
एक बढ़िया शो-रूम खोल लेंगे ।
अनिल -
फिर शुभ काम में देर किस बात की, जल्दी करो ।
तीनों -
(तीनों तपस्या करते हैं) हे भगवान हम पर खुश हो जाओ । ऐसे घोर कलयुग में देखिए हम आपके भक्त खा-पी कर आपकी तपस्या कर रहे हैं । (काफी देर बाद) देखिए भगवान हमने हमारे टेलीविजनों पर तरह-तरह के चैनलों पर सुंदर-सुंदर सीन चला रखें हैं । अच्छे-अच्छे कार्यक्रम आपको अर्पित है… हे भगवान जी ! आप हम पर खुश हो जाओ ।
अशोक -
खुश हो जाओ भगवान । खुश हो जाओ ।
(पटाखा फूटने की आवाज के साथ ही भगवान का प्रकट होना )
भगवान -
भक्त जनो ! मैं तुम पर बड़ा प्रसन्न हूं । मांगिए क्या मांगते हैं ?
अनिल,
अशोक -

(दोनों) हे भगवन इतने जल्दी कैसे आ गए ?
हरीश -
अरे मुझे तो लगता है कल बाजार में जो बेहरूपिया घूम रहा था, वही भगवान बन कर आ पहुंचा है ।
भगवान -
नालायकों ! भगवान को पहचानते नहीं ।
अशोक -
नहीं नहीं भगवन… ऐसी बात नहीं है, यह हरीशिया तो है ही ऐसा नीच …।
भगवान -
अरे ! पागल भक्तों … मैं सचमुच भगवान हूं । यह देखिए गले में पहना सर्प भी एकदम असली है ।
(सर्प की फुफकार)
तीनों -
(डर से घिग्गी बंघ जाती है) अरे…… नहीं… नहीं… भगवान… जी … पैर पकड़ते हैं । इस काले नाग को अपने काबू में रखिए प्लीज ।
हरीश -
और भगवान आप तो हमें जल्दी से वरदान दे दीजिए । अरे ! अशोक, अनिल यूं बेवकूफों की भांति खड़े क्यों हो…। साक्षात दंडवत प्रणाम करो भगवान को ।
(तीनों दंडवत प्रणाम करते हैं । धें की आवाज उनके नीचे गिरने की)
भगवान -
लो कर लो बात ! मैं तो खुद कब से कह रहा हूं कि जल्दी से वरदान मांग लो । चलिए उठिए, उठ जाओ तीनों… । 
तीनों -
हां, हां । बस भगवान हमें तो आदमी की उम्र का री-चार्ज करने वाली ऐजेंसी दे दीजिए बस । बस और कुछ नहीं मांगते हम ।
भगवान -
उम्र का री-चार्ज…… (सोचते हैं)…।
अशोक -
हां… भगवान जी सोच क्या रहें हैं ? आपने हमें वरदान देने का कह दिया है । अब खुश हुए हैं तो हमें यह वरदान दे ही दीजिए ।
दोनों -
हां यह वरदान तो दे ही दीजिए भगवान ।
भगवान -
दे तो दूंगा लेकिन…… ?
नारद -
(खड़ताल बजाते हुए आते हैं) क्यों भगवन… फंस गए ना, इस मोबाईल युगीन भक्तों के चक्कर में…… । नारायण-नारायण ।  
भगवान -
हें हें… हां … नारदजी ! आप ठीक समय पर आएं हैं …… । कोई उपाय बताओ … अब हम क्या करें ?
नारद -
इन्हें तो वरदान दीजिए भगवन ! नारायण-नारायण ।
भगवान -
वह तो देना ही पड़ेगा ।
नारद -
फिर देवलोक पहुंच कर सोचते हैं कोई उपाय । आप चिंता मत कीजिए भगवन, नेटवर्क तो हमारे हाथ में ही रहेगा… दे दीजिए… और जल्दी से निकल चलिए यहां से । नारायण-नारायण ।
अनिल -
भगवान किस से बातें करने लगे हो ?
भगवान -
कोई नहीं, यह तो नारद जी थे ।
तीनों -
नारदमुनी ! कहां है नादर जी ! हमें तो यहां कहीं दिखाई नहीं देते ।
भगवान -
वे तो नारायण-नारायण कहते हुए चले गए ।
तीनों -
ऐसे कैसे कहते हुए चले गए ! हम से मिले बिना ही ?
भगवान -
आपको नारद जी से क्या लेना है । आप तीनों अपना वरदान दोहराएं ।
भगवान -
(अतिनाटकीय ढंग से) हं-हं-हं, हमें तो बस भगवान …… आप इअतना कीजिए कि बस …… आदमी की उम्र री-चार्ज करने का वरदान दे दीजिए ।
भगवान -
आप हो तो बड़े ही चतुर भक्तों … लेकिन ठीक है… तथास्तु ।
तीनों -
तथास्तु । भगवान आप महान हो … भगवान जी की जय हो … भगवान जी की जय …… ।
(भगवान अंतर्ध्यान हो जाते हैं)
अशोक -
अरे ! गए । भगवान तो चले गए …… । अब जय जयकार की जरूरत नहीं । चलिए हम काम में चलते हैं । यह करना है वह करना है अब तक तो बहुत ही काम करना बाकी है ।
हरीश -
लेकिन हमें मालूम कैसे चलेगा कि किस की लाईफ टाइम खतम होने वाली है ।
अनिल -
लो इतना ही नहीं मालूम ! डॉक्टरों को कमीशन देंगे । जा कर पूछ लेंगे, वे अपने आप ही बता देंगे ।
हरीश -
घरों में भी जा सकते हैं । बूढ़े-बुजुर्गों को टंटोल सकते हैं ।
अनिल -
अरे ! बेवकूफ, बूढ़े-बुजुर्गों के पास कौनसा खजाना पड़ा है ।
हरीश -
चलो अपन प्लान बनाते हैं ।
अशोक -
यह लो अपनी दुकान तो जम गई । अब मैं बैठता हूं काउंटर पर । और आप लाओ ग्रहकों को बहला-फुसला कर ।
अनिल -
चलिए काम का बंटवारा कर लेते हैं ।
हरीश -
मैं जाता हूं अस्पताल की तरफ । और तुम जाओ किसी के घर, देख वहां कहीं कोई बूढ़ा-बुजुर्ग जो अपनी अंतिम सांस ले रहा हो ।
अनिल -
जाता तो हूं मैं पर मेरा मन कहना नहीं मान रहा । बहुत साले लोग तो बूढ़े-बुजुर्गों से तंग आए उकताए बैठे हैं । इंतजार करते हैं उनके मरने का । वे भला क्यों उनका रीचार्ज करवाएंगे ।
हरीश -
अरे तुझे कुछ मालूम नहीं ।
अनिल -
मालूम कैसे नहीं ! मैं बहुत से बुजुर्गों के लिए यही सुनता आया हूं । वे कहते रहते हैं- हे भगवान ! सभी के मां-बाप मरते हैं, पर मेरे वाले जाने कब पीछा छोड़ेंगे ?
अशोक -
अब चुप हो जा और जान ले कि काफी बूढ़े-बुजुर्ग ऐसे भी होते हैं जो अंतिम सांस तक घर वालों को अपने धन की खुशबू ही नहीं लगने देते । वे पूरी गांठ पर अपना कब्जा जमाए रहते हैं, हमें तो ऐसो को खोज निकालना है ।
दोनों -
तो चलिए, हम काम आरंभ करते हैं ।
(दोनों जाते हैं । दृश्य : एक समाप्त)
दृश्य : दो
(अस्पताल का सीन, मरीज, डॉक्टर, नर्सें आदि सभी का मिलाजुला शोर)

हरीश -
डॉक्टर साहब नमस्कार !
डॉक्टर -
नमस्कार, नमस्कार । बोलिए क्या काम है ?
हरीश -
डॉक्टर साहब, मैं री-चार्ज करने वाली दुकान से आया हूं ।
डॉक्टर -
भाई मैंने तो कल ही एक हजार रुपए का रीचार्ज करवाया है, अब और अधिक नहीं करवाना ।
हरीश -
नहीं-नहीं, डॉक्टर साहब ! वह रीचार्ज नहीं । हम तो उम्र का रीचार्ज करते हैं । आप के पास ऐसा कोई सीरियस मरने वाला मरीज हो तो बतला सकते हैं ।
डॉक्टर -
यहां तो सभी सीरियस ही सीरियस है । मुझे छोड़ कर जिससे मन करता हो बात कर के देख लो । वह देखो, उस बेड पर वे लोग सामान इकट्ठा कर रहे हैं । वह मरीज अंतिम सांस ले रहा है ।
हरीश -
ठीक है डॉक्टर जी । मैं देखता हूं …।
एक आदमी -
चलो सामान उठाओ । बाहर ऑटो इंतजार कर रहा है । सांस चल रही है तब तक बापू को घर ले चलते हैं डॉक्टर ने बोला है कि पांच-दस मिनिट की सांसें बाकी है । बस थोड़ी ही देर है ।
हरीश -
रुको-रुको, आप इन्हें घर मत ले कर जाएं…।
एक आदमी -
तो कहां ले जाएं ? तू कहता है तो सीधे समशान ले चले । घर नहीं ले जाएं तो क्या तेरे साथ भेज दें ? हें ! नाहक बात करता है ।
हरीश -
हां-हां, मेरे साथ ले चलिए । हमारे पास उम्र रीचार्ज करने की ऐजेंसी है । हम बाबा की उम्र बढ़ा देंगे ।
एक आदमी -
उम्र बढ़ा देंगे ! क्यों बेहूदा मजाक कर रहे हो मेरे भाई । बाबा के पास तो अब रहे ही पांच मिनिट है ।
हरीश -
आप लोग चलिए तो सही । बैठ कर ऑटो में चलना ही तो है…। चलो । अब देखो… ले चलो ।
( ऑटो की आवाज… रास्ते का शोर-शराबा- मोटर-गाड़ियों के होर्नों की पों-पों)
हरीश -
यह लीजिए यहां तो जाम लग गया है । हे भगवान जाम खोलो… मुझे उम्र का रीचार्ज करना है । अरे कोई तो खुलवाओ… (पों…पों…पों…) अरे पांच मिनिट तो यहीं पूरे हो गए…… ।
एक आदमी -
बाबा तो स्वर्ग सिधार गए । चलो अब तो घर ही ले चलते हैं । आया बहुत तीस मार खां, उम्र का रीचार्ज करने वाला । चल बहुत हुआ… अब उतर जा ऑटो से …चल निकल ।
हरीश -
अरे ! धक्का तो मर दीजिए । मैं उतर ही रहा हूं …… ।
( ऑटो स्टार्ट होने की ध्वनि… घर जाता हुआ)
(हरीश दुकान पर आता है ।)
अशोक -
अरे, ऐसे कैसे सुस्त सुस्त सा कहां से चला आ रहा है …। बता तो सही आखिर हुआ क्या ? किसी से मार-पीट हुई क्या ?
हरीश -
मार-पीट तो क्या होती… लेकिन एक ग्राहक ला रहा था । पांच मिनिट ही बचे थे उसके पास !
अशोक -
फिर क्या हुआ ?
हरीश -
होना क्या था … हम लोग आ ही रहे थे । मरने में पांच मिनिट ही बाकी थे ।
अशोक -
फिर हुआ क्या ?
हरीश -
होना क्या था… आ तो रहे थे कि चौक पर जाम लग गया । जाम में फंसे क्या कि पांच मिनिट पूरे हो गए । बूढ़े ने विदाई ले ली ।
अशोक -
ले यह अनिल भी आ गया । अरे, कैसे ? कोई ग्राहक लाया क्या ?
अनिल -
ग्राहक तो भला ही था पर निकले कि कार पंचर हो गई और हवा निकल गई । उसकी उम्र के पंद्रहा मिनिट ही शेष थे । पंचर निकलवाते वक्त ही सेठ पिछली सीट पर लम्बा हो गया ।
तीनों -
अब क्या करें … ऐसे तो हम बरबाद हो जाएंगे । सोचो… कुछ तो सोचो (सोचते हैं……। फिर चुटकी बजाते हुए) हूं SS……। 
अशोक -
अरे मूर्खों सुनो ! एक आईडिया आया है मेरे दिमाग में । आप क्या है कि डेमू रखो पास । हाथोंहाथ रीचार्ज कर दिया करना । और वहीं पेमैंट ले लिया करना ।
अनिल,
हरीश -

(दोनों) हां… हां…। यह ठीक रहेगा । लाओ हमे एक एक डेमू सिम दे दो । अर हजार हजार मिनिट की सांसों का री-चार्ज भी डाल देना ।  
अशोक -
 यह लो……तैयार ।
(दोनों जाते हैं । दृश्य : दो समाप्त)


दृश्य : तीन

हरीश -
आज तो हर हाल में री-चार्ज करूंगा ही । और मुंह मांगी रकम भी लूंगा । दुकान पर जा कर आधे ही कहूंगा । उसे क्या पता कि आधे रुपए तो मैं डकार गया ।
(एक घर में जाता है)
दूसरा आदमी -
पाप हिम्मत ना हारें । डॉक्टर साहब ने कहा है कि गंगानगर पहुंचने पर बात बन जाएगी । एक-डेढ़ घंटे में गंगानगर हम पहुंच जाएंगे ।
हरीश -
लीजिए चिंता की कोई बात नहीं है जी । आप कहें तो उम्र रीचार्ज कर देता हूं ।
दूसरा आदमी -
उम्र रीचार्ज ! यह कैसे संभव है ?
हरीश -
हम यही काम करते हैं । हमारे पास उम्र रीचार्ज की ऐजेंसी है ।
दूसरा आदमी -
क्या लेंगे ? कैसे करते हैं ?
हरीश -
एक हजार रुपए एक मिनिट के लगेंगे ।
दूसरा आदमी -
एक हजार रुपए एक मिनिट के ! यह कुछ अधिक नहीं मांग रहे आप । कुछ तो कम कीजिए ।
हरीश -
भाई साहब… यह तो मैंने कम ही मांगे हैं । थोड़े दिनों बाद तो ब्लेक चलेगी । बोलिए …… बोलिए कितने मिनिट का कर दूं ……।
दूसरा आदमी -
चलिए पहले तो सौ मिनिट का कर दीजिए जल्दी से । हमें जल्दी गंगानगर पहुंचना है । बाकी का बाद में देखेंगे ।
हरीश -
लीजिए अभी कर देता हूं ।
(नम्बर मिलाता है । मोबाइल नम्बर मिलाने की आवाज- लाईफ टाईम स्वर्ग-नर्क के बीच यमराज-मार्ग पर आपका स्वागत है । इस रूट की सभी लाइनें व्यस्त हैं । कृपया लाइन पर बने रहें या थोड़ी देर बाद फिर से कॉल करें । ……   )
हरीश -
क्या हुआ इसे । अभी होना था, हे भगवान … अबकी बार तो जरूर लग जाना ।
(री-डायल करता है । री-डायल की आवाज आती है ।)
दूसरा आदमी -
बापू SS … आप हमें छोड़ कर चले गए । हमने तो बहुत ही प्रयास किया । देखो आपकी उम्र का रीचार्ज करने भरसक प्रयास कर रहें हैं…। बापू… लाइनें ही व्यस्त थी … बापू…… । 
(दृश्य : तीन समाप्त)

दृश्य : चार

तीसरा आदमी -
नेताजी को पर्चा भरने जाना है और इधर हार्ट अटेक हो गया, अब क्या करें । कुछ समझ में नहीं आता ।
अनिल -
क्या बात है भाई । सभी चिंताग्रस्त क्यों दिखाई दे रहे हो ?
तीसरा आदमी -
क्या बतलाएं भाई । पर्चा भरने जाना का समय है सवा ग्यारह बजे का और नेता जी को हार्ट अटेक आ गया । क्या करें ।
अनिल -
तो डर किस बात का है । हमारे पास है उम्र रीचार्ज करने का सिम । मैं यहां बैठे-बैठे ही नेता जी की उम्र का रीचार्ज करवा देता हूं ।
तीसरा आदमी -
अच्छा यह बात है । तो फिर जल्दी से करो भाई ।
(अनिल नम्बर डायल करता है …… मोबाइल से आवाज आती है- इस रूट की सभी लाइने व्यस्त हैं , आप लाईन में हैं…। आप लाईन में हैं …। फिर मिलाता है… सुनाई देता है- …… द डायल नम्बर डज नोट एग्जिस्ट । प्लीज चैक द नम्बर ।)  
तीसरा आदमी -
अरे… भागो… डॉक्टर … अरे ऐम्बूलेंस मंगवाओ…… नेताजी का तो राम नाम सत हो गया……।
अनिल -
(मन ही मन) बेटा अब तो यहां से भाग जाने में ही भलाई है । नहीं तो यह नेताजी का चमचा कहीं मेरा ही रीचार्ज करवा देगा ।
( दृश्य : चार समाप्त)


दृश्य : पांच

अशोक -
आ जाओ, आ जाओ । जल्दी करो । लाओ दिखाओ कितना कितना रीचार्ज कर के आए हो । रुपए तो पीछे रिक्से में आ रहे होंगे । क्यों कि इतने रुपए तुम जैसे मरियल उठा के थोड़े ही चल सकते हैं ।
हरीश, अनिल -
(दोनों) कैसे रुपए ! एक भी रीचार्ज नहीं हुआ । सारी लाइनें ही खराब हैं । या फिर नेटवर्क बीजी । हम तो हमारी जान बचाकर यहां भागते हुए आएं हैं, वह भी बड़ी मुश्किल से ।
अनिल -
ऐसे कैसे हो सकता है । यह तो सरासर धोखा है भगवान । भगवान आप ही ने तो हमे उम्र रीचार्ज करने का चार्ज दिया था ।
( दृश्य : पांच समाप्त)

दृश्य : छः

(अशोक पलंग पर सोया दिखाई देता है, पास में स्टूल रखा है ।)
नींद में बोलते हुए : यह नहीं हो सकता । हम भगवान है तो क्या हुआ उपभोक्ता अदालत में खींच लेंगे । कैसा अंधेर है । वरदान दे दिया और …फिर…।
औरत -
(हाथ में चाय का गिलास ले कर आती है । कंधा पकड़ कर) अरे ! आज उठना नहीं है क्या ? दुकान नहीं जाना है क्या ? अब जल्दी से खड़े हो जाओ… । यहां चाय रखती हूं । ठंडी हो जाए तो फिर मुझे मत कहना…।
(चली जाती है ।)
अशोक -
हें……।
( दृश्य : छः समाप्त)

***

मूल : मनोज कुमार स्वामी
अनुवाद : नीरज दइया

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