Thursday, October 08, 2009

अब्दुल वहीद “कमल” रा दोय उपन्यास

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नीरज दइया
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राजस्थानी साहित्य में अब्दुल वहीद “कमल” आपरै दोय उपन्यासां घराणो (1996) अर रूपाळी (2003) रै पाण जिकी कीरत कमाई उण री बात करां तो उपन्यासकार कमल री सगळां सूं लांठी खासियत आ है कै बां आपरै समाज रो जिको सांतरो चितराम सबदां रै मारफत राख्यो बो मुसळमान समाज रै जुदा-जुदा रूप-रंग नै राखतां थकां उण रा मांयला दुख-दरद अर सांच नै राखै। राजस्थानी उपन्यासां में कमल सूं पैला किणी रचनाकार इण दिस इण ढाळै री रचनावां कोनी करी। कीरत रै कारणां में साहित्य अकादेमी रो “घराणो” नै बरस 2001 रो साहित्य अकादेमी पुरस्कार नै ई गिणां सकां पण अब्दुल वहीद “कमल” री चरचा पुरस्कार पछै जिण रूप में हुई उण सूं तो “घराणो” उपन्यास दोय कोड़ी रो है आ घारणा कीं बेसी बणी। जिका राजस्थानी उपन्यास परंपरा री थोड़ी-घणी ई जाणकारी राखै बां नै आगूंच ठाह है कै संजोग रा खेल उपन्यास परंपरा में बात परंपरा सूं हाल तांई साथै-साथै चालै। घराणो में संजोग दर संजोग उण री कथा रै जथारथ नै अळधो बैठावै, पण आ कुबाण तो आपां री उपन्यास परंपरा री खास खासियत है! हैंपी ऐंड री फिल्मां दांई राजस्थानी उपन्यास ई छेकड़ में जावतो-जावातो जूनी सगळी बातां माथै पड़दो न्हाख परो हीरो नै सोरो-सुखी जीवण बगसै। आपां रा उपन्यास हाल तांई बुरै रो बुरो अर भलै रो भलो री जुगा जूनी सीख ई सीखावै!
विगतवार बात करां तो सगळां सूं पैली आपां घराणो अर रूपाळी रै सुरूपोत री कीं ओळ्यां लेवां- “देस री आजादी रै दूसरै दसक री बात !” आ पैली ओळी है घराणो री, मतलब 1947 रै पछै 1957 सूं 1966 तांई री कथा है घराणो ! उपन्यासकार “बात” सबद रो प्रयोग करै तद कोई आ ई कह सकै कै ओ रचनाकार रो आपां री घणी-घणी लांठी बात परंपरा सूं जुड़ परो आ रचना करणी चावै। बिंयां राजस्थानी रा घणासाक उपन्यासकार असल में बात माथै ई काम कर सक्या बै उपन्यास विधा री आधुनिकता नै कम ई पकड़ पाया है। जिंयां सुभ कामां में गणेसजी रो सिमरण जरूरी हुवै बिंयां ई आपां “बात” रो सिमरण ई कर सकां ? ओ जरूरी है नींतर आपां री बातां नै उपन्यास अर कहाणी सूं विजोग भुगतणो पड़ैला। इण बात नै छोड़ा अर बिंयां ई पैली ओळी खातर इत्तो सोच ठीक कोनी, ओ उपन्यास है आगै री ओळ्यां दखलै रूप आप रै सामीं राखणी चावूं- “सौ-डैढसौ घरां रो एक छोटो-सो गांव होदां। गांव में दस-बारह घर मुसळमानां रा, कीं घर मेघवाळां अर नायकां रा, बाकी जाट, बामण, खाती, नाई अर बीजै लोगां रा।”
आप सूं माफी चावूं कै दोय ओळ्यां पछै भळै कीं सवाल है- 100-150 घरां मांय सूं 10-12 घर मुसळमानां रा किंयां घटावूं ? क्यूं कै बाकी घर जाट बामण, खाती, नाई अर बीजै लोगां रा है। हे भगवान! म्हैं इण ढाळै री गणित में क्यूं उळझग्यो ?
चालो आपां चौथी ओळी सूं मूळ पाठ पाछो देखां- “गांव में एक कच्चो-पक्को-सो ठाकुरजी रो मिंदर। मिंदर सूं थोड़ी दूरी माथै कच्ची ईंटां सूं बण्योड़ी मस्जिद। साठ हाथ ऊंडो, मीठै पाणी रो एक कूवो। कूवै सूं थोड़ो अळघो पीपळ रो जूनो रूंख।”
तो सा रामजी भला दिन देवै ठाकुरजी रो मिंदर कच्चो-पक्को-सो अर कच्ची ईंटां सूं बण्योड़ी मस्जिद रै गांव होदां में हिंदू-मुसळमान रळ-मिल परा रैवतां। अठै मिंदर कच्चो-पक्को-सो अर कच्ची ईंटां सूं बण्योड़ी मस्जिद बाबत आप खुद ई फैसलो करो कै गांव होदां रै रूप माथै आप कितरा मोहित हुया अर उपन्यासकार री भासा अर बुणगट माथै कांई इत्तो बेगो कोई फैसलो ले लेवोला ? अरज है थोड़ा थमो-थमो होदां गांव में मीठै पाणी रो कूवो साठ हाथ ऊंडो है। आप नै गळतफहमी है डूबण रो कोनी कैवूं आप तो पाणी पीवो अर पीपळ रै जूनै रूंख री छींयां में बिसाई खावो।
आपां रूपाळी रै सुरूपोत री कीं ओळ्यां ई लेवां- “आथूणै-उतरादै थार राजस्थान रा दो छोटा-छोटा गांव रूपवास अर भदवास। दोनां बिचाळै नौ-दस कोस रो आंतरो।” आं ओळ्यां में आपां देख सकां उपन्यासकार आपरै सुभाव मुजब आंतरो दोनां बिचाळै नौ-दस कोस रो बातावै, मतलब तीन किलोमीटर री आ छूट घराणो पछै रूपाळी रै प्रकासन रै आंतरै सात-आठ बरसां में ई सुधार कोनी सकी। आगै लिखै- “दोनूं ठैठूं गांव जैड़ा गांव। भदरवास में दस-बीसक घर मुसळमानां रा। रूपवास जाटां अर बामणां रो गांव जिण में हुसैनखां री एक गुवाड़ी, जिकी पीढ्यां सूं उठै ई खेती-बाड़ी रो काम करै। दूजी गवाड़ी मुसळमान तेल्यां री, जिण रो तेल काढणै रो धंधो पुस्तैनी हो। इणां रै ऐडै-टाकणै अर गमी रै मौकै-टोकै इणां री बिरादरी रा लोग आय’र सामळ हुवै अर सुधारो करै।” दस-बीसक घर मुसळमानां रा गांव भदरवास में अर रूपवास में फगत दो घर मुसळमानां रा ? कदास अठै ई उपन्यासकार दो-चार घर रूपवास में मुसळमानां रा लिखतो तो मेळ सजतो क्यूं कै भदरवास में दस-बीसक घर मुसळमानां रा है। दस अर बीस में दस रो आंतरो है पण आ बात अठै ई छोड़ा पण फेर ई कैवणो पड़सी रामजी भला दिन देवै बिरादरी रा लोग एक गांव सूं आय’र दूजै गांव में सामळ हुवै अर सुधारो करै नीतर सामळ हुयर कोई बिगाड़ो ई कर सकै अर मजै री बात आ कै रूपाळी उपन्यास रै इण गांवां में उपन्यासकार अठै कैयो तो एक दूसरै रै सुधारै खातर पण असल में उपन्यास में हुयो बिगाड़ो है। फेर सुघारै री बात उपन्यासकार आगूंच क्यूं कथै आ बात समझ में कोनी आवै ?
भासा बाबत इण चरचा में घराणो उपन्यास रो जिको अंस आप बांच्यो ठीक उण सूं आगै री ओळ्यां भळै दाखलै रूप बांचो- “पूरै गांव में जीवणजी, छोगजी अर लालजी रा घर पक्कै घरां में गिणीजै। ऐ तीनूं घर ठाकरां री कोटड़ियां कहलावै। आं तीनूं कोटड़ियां में कच्ची ईंटां री साळां अर पक्की ईंटां सूं बण्योड़ी पिरोळां है। गांव रै बाकी लोगां रा घर घास-फूस रै झूंपड़ा अर छानां सूं बण्योड़ा है। जद सूं ओ गांव बस्यो है, तद सूं इण नै अजूं ताईं सड़कां सूं नीं जोड़ीज्यो है।”
जीवणजी, छोगजी अर लालजी रा घर पक्कै घरां में गिणीजै पण कच्ची ईंटां री साळां अर पक्की ईंटां सूं बण्योड़ी पिरोळां री इण कोटड़ियां खातर उपन्यासकार जिण ढाळै ठाकुरजी रै मिंदर बाबत लिखतां थकां लिख्यो- “एक कच्चो-पक्को-सो ठाकुरजी रो मिंदर……कच्ची ईंटां सूं बण्योड़ी मस्जिद।” तो गांव रा ठाकरां री कोटड़िया कच्ची-पक्की नीं पूरै गांव में पक्कै घरां में क्यूं गिणीजै ? गांव रै बाकी लोगां रा घर घास-फूस रै झूंपड़ा अर छानां सूं बण्योड़ा हा तो कांई फगत कच्ची ईंटां उण बगत मस्जिद खातर ही बणाईजती ही का कठैई मिलती ही ? आपां नै चेतै है कै उपन्यासकार घराणो में जिण होदां गांव री बात करै उण में 100-150 घर कैया हा। जद सूं ओ गांव बस्यो है, तद सूं इण नै अजूं ताईं सड़कां सूं नीं जोड़ीज्यो है। उपन्यासकार री आ टीप एक दरद रो बखाण है कै देखो आ हालत है देस रै गरीब गांवां री !
उपन्यास रै पाठ माथै इण ढाळै री चरचा घराणो अर रूपाळी बाबत नीं होय सकै, क्यूं कै उपन्यासकार सटीक अर सध्योड़ी भासा री मांग हरेक जागां पूरी कोनी करै। तद आपां नै ओ समझ जावणो चाइजै कै अठै देस काल अर वातावरण रै बखाण खातर जिण चतराई आळी भासा री दरकार हुवै बा अब्दुल वहीद “कमल” रा दोनूं उपन्यासां में कठैई मिलै तो कठै आपां नै निरास ई होवणो पड़ै। घराणो रा उपन्यासकार कवितावां ई लिखी है तो आपां नै काव्यात्मक गद्य रा दरसण ई घराणो में हुवै। जिंयां दाखलै सारूं पेज-11 रै इण अंस नै भासा री काव्यात्मकता पेटै गिणां सकां- “मांझळ रात ही। तारां छायी चूनड़ी-सो आभो आपरी छक जवानी माथै हो। स्यांत समुंदर-सो गहरी नींद में सूत्यो सगळो गांव। बाळू रेत रै धोरां सूं चौफेरो घिरियोड़ो ओ गांव अर गांव रै च्यारूंमेर पसरियोड़ो सागीड़ो सरणाटो, जाणै ओ सरणाटो सगळै गांव नै आपरी गोदी मांय सांवट राख्यो हो।” भासा बाबत एक बीजी घणी सरावणजोग बात आ है कै आं उपन्यासां में मुसळमान समाज री जिण राजस्थानी भासा रो एक खरो-खरी रूप आपां सामीं आवै बो आपरै जथारथ रै कारण असरदार है। भासा में सामाजिक रूप-रंग नै राखतां थकां उण रा मांयला दुख-दरद अर सांच नै जिण रूप में लेखक चवड़ै करै बो उपन्यास परंपरा में सदीव यादगार रैवैला।
घराणो में “म्हारा दो आखर” में उपन्यासकार री टीप तीन पानां में छपी है! लेखक रा दो आखर अर कबीर रा ढाई आखर बरोबर हुया करै। कबीर आपां नै ढाई आखर में पंडित बणा देवै, तो लेखक आगूंच दो आखर में रचना रा सगळा पोत चवड़ै कर देवै। पंडित बण्यां पछै कुण पढै आखरां नै अर राजस्थानी में लेखक रा दो आखर पढ्यां पछै भलाई कोई भलो मिनख पोथी पूरी बांचण री गुस्ताखी करै तो बीं री मरजी पण आपणै अठै स्याणा-समझणा पाठक अर लेखक तो आ गळती करै कोनी। इण रो एक कारण ओ पण है कै पोथी खातर स्याणा-समझणा पाठक अर लेखक रोकड़ा खरच करै तो पीड़ हुवै ! ओ विषयांतर अठै ई निवेड़ूं।
आगूंच दो आखर में उपन्यासकार लिखै- “म्हैं इण उपन्यास में आ कैवण री चेष्टा करी है कै ‘घराणो’ बेटी रै नांव सूं, बेटी रै सुभाव सूं, बेटी रै बरताव सूं अर बेटी रै चाल-चलन सूं ओळखीजै।” तो सा ओ मूळ मंतर है जिको इण रचाव रो सार है। एक समाज रै सांच नै लेखक इण ढालै प्रगटै- “बेटी नै जलमतै ई गळो घोट’र, का अमल देय’र मारणै री रीत इण घराणै में लारली चार-पांच पीढियां सूं चाल रैयी है। इणां रो ओ मानणो है कै बेटी तो भाग-फूट्यां रै हुवै है।” (पेज-17)
घराणो मुसळमान दाई हमीदा री कीरत नै बखाणै । उपन्यास एक छोरै री आस में गळती सूं जलमी छोरी रै प्राणां री अंवेर रै मिस सवाल उठावै पण उण नै जिण रूप में विगसावै बो सहज कोनी। असहज कथा ई कथा रो आधार होया करै पण असहज नै लेखक सहज रै रूप में प्रगटै आ लेखक री करामात मानीजै। विचार में आ बुणगट कै हिंदू-मुसळमान एक है- हमीदा रो हीराबाई रै रूप में बदळाव प्रभावित करै अर ठाकर धनजी अर जीवणजी रो आंतरो मिनख-मिनख रै विचारां रै आंतरै नै दरसावै। धनजी बेटी खातर झुरै तो जीवणजी बेटै खातर। एक ई बगत में दोय का दोय सूं बेसी पण विचारधारावां समाज में होय सकै। घराणो में मां पारो री बा छोरी लाडो है जिकी मरदाना भेस में घोड़ै पर चढ्योड़ी एकली ई डाकुवां सूं मुकाबलो करै अर सगळै गांव नै अचरज हुवै हमीदा अर लाडो माथै। आ कथा हमीदा छेकड़ में सुणावै कै जीवणजी बाबोसा ! आ बा ई बेटी है जिकी रै प्राणां रा थे प्यासा हा। उपन्साकारजी जीवणजी नै छेकड़ तांई जीवता राख्या, कारण बां नै हमीदा सूं आ कथा सुणणी ही अर अबै जीवणजी नै पछतावो करणो है- हमीदा री कबर माथै।
उपन्यास रो दी ऐंड रो अंस बांचण सूं आपां नै सुख, सोरप अर निरायती मिलै- “जद हमीदा रै त्याग अर पारो रै धीरज अर सबर री बातां असवाड़ै-पसवाड़ै रै गांवां ताईं पूगी तो लोग-बाग उठै थोड़ै दिनां मांय एकै कानी पारो रो मिंदर अर एकै कानी हमीदा री कबर पक्की बणा’र उणां री पूजा अर मानता करणनै लाग्या।
जीवणजी रोज उठै आवतो अर अरड़ावतो कै ‘म्हैं पापी हूं………म्हैं जुलमी हूं ……म्हनै माफ करदै पारो… म्हनै माफ करदै हमीदा……।’
बो पारो रै मिंदर रै पगोथियां सूं अर हमीदा री कबर सूं रोज माथो फोड़तो-फोड़तो नीं जाणै कद इण संसार सूं चल बस्यो ?” (पेज-111) दी ऐंड।
इण समापन में मिंदर बाबत उपन्यासकार बतायो कोनी कै मिंदर कच्चो-पक्को-सो ठाकुरजी रै मिंदर दांई हो का कच्ची ईंटां सूं बण्योड़ी मस्जिद दांई कच्चो। पण अबै हमीदा री कबर पक्की बणावण री बात साथै ई आ बात उठै कै गांवाआळा मस्जिदं णाई कांई पक्की बणाई का कच्ची सूं ई काम चलावै ? कांई किणी कीरत री थरपणा सारू मंदिर अर कबर बणावणी जरूरी हुया करै ? जीवणजी नै जिकी बात उपन्यास रै छेकड़ में समझ आई बा बात कै बेटो अर बेटी नै बरोबर मानो, हाल ई आपां रै समाज नै समझणी बाकी है। केई तो अबै समझग्या पण केई समझतां थकां ई अणसमझ बण्या बैठा है बां रो कांई करां।
रूपाळी अर घराणो दोनू ई नायिका प्रधान उपन्यास है। घराणो बरस 1957 सूं 1966 तांई रै बगत नै आधार बणावै तो रूपाळी में बरस 1965 अर 1971 रै भारत-पाकिस्तान रै जुद्ध रै ऐनाणां नै घर रै ऐन बीचाळै ऊभा होय समझण रा जतन उपन्यास रै मारफत हुया है। जुद्ध रै मांयला-बारला नफा-नुकसाणां री विगतां में केई विगतां अछूती रैय जावै। बां री संभाळ रचनाकार ई कर सकै, अर एक संभाळ नै आपां उपन्यास रूपाळी में देख सकां। रूपाळी में हिंदू-मुसळमान एकता अर सद्भाव नै जठै सुर मिल्या है बठै ई मिनखबायरै घर में किणी लुगाई अर उण रै टाबरां नै हुवण आळी तकलीफां रो लेखो-जोखो उणां री निजू जूझ रै साथै पूरी ईमानदारी सूं सामीं राखीज्यो है। उपन्यास घराणो में लेखक आपरी बात तीन पानां में आगूंच “म्हारा दो आखर” रै मिस कैवै तो दूजै उपन्यास रूपाळी में कबीर स्टाइल में लेखक आपरी बात “म्हारा ढाई आखर” रै मिस बात फगत एक पानै में कैवै ! फगत आधो आखर बध्यां सूं दो पानां कमती किंयां हुय जावै ? तीन पानां सूं एक पानै री आ जातरा का समझ, समझ में कोनी आवै।
आगूंच ढाई आखर में उपन्यासकार कमल लिख्यो है- “उपन्यास में म्हैं आ कैवण री चेष्टा करी है कै जकी लुगाई, लोक लाज सूं ,लुगाईजात री मर्यादा सूं आज तक घुट-घुट’र मरती रेयी है। अबै बा समाज री कुरीत्यां अर लोक री अनीत्यां सूं जुड़ै थका जुलमां अर अणकथ कष्टा नै भोगण नै त्यार नीं है। चावै बा रूपाळी (जमाली) हो का राधा। क्यूं कै लुगाई जात लुगाई है। लुगाई रो धर्म लुगाई है। उपन्यास री नायिका रूपाळी रो चरित्र एक ऐड़ो ई चरित्र है।”
कांई लेखक रै आं ढाई आखरां सूं लियोड़ा थोड़ा-सा आखरां सू आप नै थोड़ी-घणी लेखक री चेष्टा समझ में आई का कोनी आई ? पैला दांई ओ भळै विषयांतर ई हुवैला सो इण बात माथै अठै ई विराम देवतां थकां दूजी भली बात करूं। लुगाई जात रो समाज री जूनी मानता, परंपरा, रिवाज का अणचाइजती बात माथै सामीं ऊभो हुवणो, अर गळत रै विरोध में हरफ काढणो किणी आधुनिक रचना में सरावणाजोग ई हुया करै। स्त्रीवाद जैड़ी चरचा राजस्थानी में कोनी पण उपन्यास रूपाळी रै मारफत जे लेखक राजस्थानी समाज री किणी लुगाई रै इण नुंवै रूप री ओळखाण आपां नै करावै तो उण री सरावणा हुवणी चाइजै। अठै आ ओळी लिखतां रूपाळी री पुरजोर सरावणा करतां थका उपन्यास बांचण री बात घणै संकै साथै आप तांई पूगावणी चावूं।
उपन्यास-जातरा में रूपाळी उपन्यास रो खास उल्लेख इण खातर करियो जावैला कै इण में उपन्यासकार हिंदू-मुसळमान एकता अर बां री आपसरी री प्रीत रा केई अनूठा चितराम मांड्या है। बिंयां घणै गौर सूं रूपाळी री कथा माथै विचार करां तो आ एक प्रेम-कथा है- जिण में रूपाळी री प्रेमकथा रै साथै-साथै उण री मां जुबैदा री आपरै घरघणी रै लारै प्रेम अर विरह री कथा आधार रूप गूंथीजी है। सगाळा सूं सिरै बात हा है कै जुबैदा आपरै घराअळै जमालखां (जगमाल) अर छोरी जमाली (रूपाळी) रै सुख-दुख में बंधी राजस्थानी उपन्यासां में जीवटआळी यादगार नायिका रै रूप में आपां सामीं ऊभी होई है। उपन्यास में मुसळमानां रो ठेठ भारतीयकरण जिण नै कोई हिंदूवाद का हिंदूकरण ई मान सकै। लेखक जमाली रो नांव ई रूपाळी अर जमाल खां रो जगमाल बरतै। आं चरित्रां में लेखक रो मकसद हिंदूवाद नीं एक गांव री भारतीयता रो रंग उजागर करण रो रैयो हुवैला। आपां उपन्यास में भारत-पाकिस्तान रै जुद्धां अर भारत री फौजां बाबत हुई बंतळ रै इण दीठाव नै प्रमाण सरूप राख सकां- ओ घणो संजीदा मसलो है पण लेखक री हिम्मत दाद देवण आळी है।
“गोविंदो बोल्यो, “यार, खाली कश्मीर ई क्यूं………आज जिको पाकिस्तान है, बो भी तो भारत ई हो………आज ओ पाकिस्तान जिण कश्मीर रै बारै में फागड़दापणो कर रैयो है………अर इण नै लेवण नै धूड़ सूं मुट्ठियां भर रैयो है……इण री कुबुध नै आखो जग देख रैयो है।”
जस्सो बोल्यो, “तो दादा, पाकिस्तान नै इतरो हराम रो धन क्यूं भावै है ? सुण्यो है कै मुसळमान धरम में तो हराम रो धन लेणो मना है ?” (पेज-11)
रूपाळी रै रचनाकार रो ओ गुण है का ओगुण कै बो आपरै पाठकां नै मुसळमान धरम री केई-केई मरम अर धरम री बातां किणी कथावाचक दांई बिचाळै समझाण ढूकै। अठै आ ध्यान देवण री बात है कै उपन्यासकार नै केई जागावां कथावाचक री ठौड़ उपन्यास में किणी नाटककार रै रूप में पण हुवणो बेसी असरदार साबित हुया करै, जरूत-जरूत री बात हुवै। इण बात रै पख में दाखलै रूप एक अंस लेवां- “मुसळमान धरम मांय मरियोड़ै का मरियोड़ै रा समाचार सुण्यां पछै उण रै लारै तीन टेम पछै कुल री फातिहा दिरवावै। कुल री फातिहा में एक-एक चिणै माथै आयोड़ो मौलवी अर बीजा लोग कुल पढै। जगती अगरबत्ती री बांस उठै खिंडती रैवै। मखाणा अर कुल पढीज्योड़ा चिणा उठै आयोड़ा लोगां मांय बांट दैवै। इण धरम रो मानणो है कै इण सूं मरण वाळै री आत्मा नै शांति मिळै है।” (पेज-17)
उपन्यासकार अठै पाठक रो बेसी हित सोचण में उपन्यास कला री दीठ में मोळो पड़ जावै, इण खातर म्हैं आगूंच लिख्यो कै ओ गुण है का ओगुण ? घर री केई-केई बातां पड़दै में रैवै जित्तै तो ठीक, पण घर री केई बातां- नीं तो कैवतां बणै अर नीं ई लुकोवता बणै। तद कोई कांई कारै ? आ मनगत भोगणी घणी अबखी हुवै। आ अबखी मनगत भोगै रूपाळी री मां जुबैदा। खसम तो फौज में गयो जिको पाछो आयो कोनी अर जेठ गफूरो माड़ी नीयत सूं आपरै घर-परिवार री मरजाद ई भूलण री गळती करै, पण सतवंती जुबैदा आपरो सत ठेठ तांई सांभियां राखै। जुबैदा एक आस में बंधी आपरी छोरी नै देख-देख’र जीवै कै कदास तो खुदा उण माथै रहम करैला अर उणां सगळां री खबर ई लेवैला जिकां उण रै दुखां नै दूणा करण में लाग्योड़ा है। जद घर रा ई बैरी हुय जावै तो जीवण में कांई भदरक हुवै ? जेठ गफूरै री चालां अर चालां में बारंबार मात रै अगाड़ी ऊभी जुबैदा जिंयां-किंयां कर बारंबार पार पूगै पण कद तांई ? जुबैदा रो खसम फौज में किणी जुद्ध में जिंयां जूझै उणी ढाळै जुबैदा घर में ई जूझै, तो जूझ किण री मोटी ? जुबैदा रै सुख अर दुख री केई कथावां उपन्यास में मिलै साथै ई उपन्यास में राजियै अर रूपाळी री प्रीत री कथा ई अनोखी है।
अठै पैलै उपन्यास घराणै दांई संजोग दर संजोग तो है पण आं संजोगां बिच्चै जिकी जूझ रो चितराम सामीं आयो है बो घणै मरम आळो है। उपन्यासकार रूपाळी री प्रेम कथा नै असफल नीं दिखा परो सफल बणावण रै चक्कर में फिल्मी हुय जावै। घराणो दांई हैप्पी ऐंड खातर उपन्यासकार रूपाळी में कांई-कांई नीं कर जावै। लोककथा रा गुण उपन्यास रा दोस हुय जावै, बै दोस लारो कोनी छोड़ै।
“पांच-सात दिनां पछै भदवास सूं समाचार आया कै लोकलाज सूं डर’र आपरी आत्मा रै पछतावै रै कारण गफूरो कुवै में पड़’र मरग्यो। इण समाचार सूं सगळां नै थोड़ो-घणो दुख हुयो।” (पेज-165)
हेताळुवां सुणो ! बो कुवो साठ हाथ ऊंडो, मीठै पाणी रो एक कूवो नीं हो। अर ना कूवै सूं थोड़ो अळघो पीपळ रो जूनो रूंख हो। क्यूं कै बो तो होदां गांव घराणो उपन्यास में हो। पांच-सात दिनां पछै पूग्यै समाचार सूं सगळां नै थोड़ो-घणो दुख पांच-सात दिन तांई ई हुयो हुवैला ! कदास कोई सोचतो कै करमफूटो गफूरियो साळो मरियो अर पापो कटियो, धरती सूं कीं बोझ हळको हुयो ! जद एक आदमी रै मरिया धरती रो बोझ हळको हुवण री बात करां, तद आपांणी गणित सावळ हुवणी चाइजै। समाचार का तो पांच दिन में पूगणा चाइजै का सात दिन में अर दुख खातर ई सागण बात- का तो दुख थोड़ो हुवणो चाइजै का घणो हुवणो चाइजै। राजस्थानी में थोड़ो-घणो रो अरथ मीडियम तो हुवै कोनी ? इण रो ओ अरथ तो हरगिज ई कोनी हो सकै कै गांव आळा नै बां री सरधा सारू डील-डौल नै देखता थकां किणी नै थोड़ो अर किणी नै घणो दुख हुयो हुवै ! आ सगळी बातां रै होवता थकां पण सार रूप आपां कह सकां उपन्यास परंपरा नै पोखण पैटै कमलजी रा दोनूं उपन्यास आपरी कथा-जमीन सारू घणा महतावूं मानीजैला।
[अब्दुल वहीद “कमल” जलम : 17 अप्रैल, 1936 ; इंतकाल : 6 मार्च, 2006 ]
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नीरज दइया
द्वारा- सूरतगढ़ टाइम्स (पाक्षिक) पुराना बाजार बस स्टैंड सूरतगढ़ (श्रीगंगानगर)

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