Wednesday, August 26, 2009

राजस्थानी कविता रा साठ बरस

नीरज दइया,
पी।जी।टी. (हिन्दी), केन्द्रीय विद्यालय, क्रमाक- १, वायुसेना, सूरतगढ़ (श्रीगंगानगर)Mobil : 9461375668 E-mail : wpnegchar@gmail.com & www.wpnegchar.blogspot.com

(राजस्थली रै १००वें अंक में प्रकाशित आलेख)

भासा री खिमता नै
तोलण री ताकड़ी है कविता
सबदां रै भारै में
चन्नण री लाकड़ी है कविता
(कवि : कन्हैयालाल सेठिया)

आजादी पछै री कविता बाबत बात करतां थकां आज तांई रै काल खंड नै गिणां तो ओ आकड़ो साठ बरसां सूं उपर ई बैठै अर इण साठ बरसां री कविता मांय इत्ता कवियां आपरो योगदान दियो है कै फगत नांवां रै दाखलै रूप ई आपां साठ पानां में बांरां नांव ई लिखां तो ई केई नांव छूटण री गुंजाईस रैय जावैला अर कवियां री कवितावां रा कीं थोड़ा-घणा नमूना गिणांवण री खेचळ करां तो पानां छव सौ ई कम पड़ैला, इण गत नै जाणता थकां आगूंच बां सगळा कवियां सूं माफी चावूंला जिणां बाबत अठै म्हैं म्हारी सींव रै कारण कीं नीं लिख सक्यो हूं । कविता में बियां तो छंद-मुगत कविता सूं पैली डिंगळ री धारा रा केई-केई खाळा ई आवै अर गीत- गजल री बात बिना कविता री बात ई आधी-अधूरी लखावै पण अठै कविता सूं म्हारो मतलब राजस्थानी री नुवीं कविता सूं है जिण री विधिवत थरपणा ‘तार-सप्तक’ री तरज माथै ‘राजस्थानी- एक’ रै मारफत कवि तेजसिंह जोधा करी । अठै ओ खुलासो ई जरूरी लखावै कै छंद-मुगत कविता ई नुवीं कविता कोनी हुवै, छंद में रैवता थका ई कोई कविता अधुनिक नै नुवीं होय सकै है पण असल बात कविता में दीठ अर अप्रोच री हुया करै । सबदां रै भारै में चन्नण री लाकड़ी है कविता अर कोई नै जे जुखाम हुवै का सोजी कीं कमती हुवै तो कांई कर सकै है कविता !


अदभुत ही ओप थारै अंगां री
तो ई लाधै कोनी गमिया पछै
इण अंधरीज्योड़ा बजार में
म्हैं थनै हेला पाड़ू
सायत पिछांण लै थू म्हारो सुर
(कवि : सत्यप्रकाश जोशी)

कविता में मूळ बात सुर री ही हुया करै कै किण कवि अर कविता रो सुर नुवीं कविता नै लगोलग आगै बधावण रो काम करियो पण नुवीं कविता री बात जूनी कविता परंपरा नै जाण्या बिना कोनी होय सकै । हरेक नुंवी चीज रो आधार जूनी चीज में ई मिल्या करै है, ठीक बिंयां ई कविता एक चीज है ! तू चीज बड़ी है मस्त-मस्त रै दौर में आपां इक्कीसवीं सदी में हा आ बात याद राखणी घणी जरूरी है । डिंगळ नै आज रै जुग में आपां सजावट रै समान में तो धर सका पण बै मूंछां अर तलवारां अबै आपरै ठौड़ ठिकाणै ई राख दां तो ई ठीक है, क्यूं कै कविता खातर एक भासा अर सुर री दरकार हुया करै अर बगत परवाण भासा अर सुर बदळियां ई सरै । बै उपमावां अर छंदां री मनमोवणी छटावां, वाह ! वयण सगाई रो कांई कैवणो । सब आपरी जागां ठीक हा अर बां रै जस नै ई आपां कोनी भूल सकां पण अबै बस करो- थमो-थमो । कविता नै प्रवृतिगत देखां तो केई धारावां दीसैला जिण में नुवीं कविता पण एक काव्य धारा ई है पण बरस १९७१ सूं पैली अर आज ई केई कवि राजस्थानी कविता रै नांव माथै उणी जूनी मनगत अर भासा नै अंवेरतां थका दर ई संको कोनी करै । कैवणो तो नहीं चाइजै पण कैवणो पड़ै कै आज री आधुनिक कविता कठै पूगगी है इण री बानै थोड़ी-घणी तो खबर कवियां नै राखणी लाजमी है । नुवीं कविता पेटै देखां तो राजस्थानी में कविता रो दायरो अर दीठ भारतीय स्तर तांई पूगावण में अनूदित काव्य पोथियां री महतावूं भूमिका मानी जाय सकै । आधुनिक भारतीय कविता सूं राजस्थानी री ओळख करावण में सिरै चन्द्रप्रकाश देवळ नै तो आपा जे उल्था-मसीन ई कैवां तो बेजा बात कोनी हुवैला, क्यूं कै देवळ अनुवाद रै पाण राजस्थानी कविता री गाढी ओळख केदारनाथ सिंह, अशोक वाजपेयी, रमाकांत रथ, हरभजन सिंह, सितांसु यश्चन्द्र, सुभाष मुखोपाध्याय, सीताकांत महापात्र आद कवियां सू करवाई है । इण पख नै पोखणवाळा केई बीजा रचनाकार ई है जियां- नंद भारद्वाज, श्याम महर्षि, विनोद सोमानी ‘हंस’, उपेन्द्र अणु, नीरज दइया आद-आद ।


जोयेड़ी जोत रौ कांई जोणौ है
होवतै काम रओ कांई तो होणौ है
अणु नै उधेड़णौ सोरौ है
पण मिनख नै समझावणौ दोरौ है ।
(कवि : नारायणसिंह भाटी)

तो साठ बरसां री राजस्थानी कविता नै समझण रो अबखो काम कविता री कहाणी कथ परा पूरो करां । कहाणी री ई तरज माथै चालू करां- वन्स अपोन ए टाईम.... एक बार री बात है मतलब कै जूनी बात है । अबै बात बा कोनी रैयी तो सा ‘बादळी’१९४२ अर ‘लू’ रै मारफत कवि चन्द्रसिंह बिरकाळी (१९१२-१९९२) नै प्रकृति-काव्य रै कालजयी-कवि मानण रो बो जुग मंचयी कविता रो जुग हो अर उण में केई-केई कवि सैनाणी हा पण दूहा छंद रा मासटरपीस बिरकाळी री पोथी ‘बाळसाद" नै उणरो पूरो-पूरो हक देवण में राजस्थानी री आधुनिक कविता कठैई न कठैई चूकगी है । ‘बाळसाद’ (१९६८) अर ‘काळजै री कोर" (१९६८) आधुनिक राजस्थानी कविता री पैलड़ी पांत री काव्य-पोथियां है । अठै आपां बिरकाळी री दीठ अर कविता नै लेय’र निजू अप्रोच में साव नुवो रूप देख सका । ‘लोरी’ कविता में कवि कवि री ओळ्यां है- "जाग जाग लाडेसर जाग ! मां रो काज संवारण जाग ।" बिंयां लोरी तो जगावण खतर कोनी हुवै, तो कवि मां रो काज संवारण खातर लाडेसर नै जगावण रा जतन क्यूं करै ? इणी गत नै घणा घणा पछै कवि सत्यप्रकाश जोशी ‘राधा’ (१९६०) में जुद्ध खातर लड़जा भिड़ जा सूं जुदा सुर में कान्हा सूं कैवायो कै "मन रा मीत कांन्हा रे- ........मुड़जा, फौजा नै पाछी मोड़लै" । जूनी मनगत सूं जुदा नुवीं बात पैली पैल तो गळै कोनी उतरै पण मंचिय कवितावां री धूमधाम बरस १९६० तांई खासा रैयी अर राजस्थानी में किणी कवि कोई संजीदा कविता कोनी लिखी । ‘कळायण’१९४९ रा चावा ठावा कवि नानूराम संस्कर्ता री पोथी ‘समय रो बायरो’ बरस १९५३ में छपी पण उण में जीवण-जथारथ रो पूरो-पूरो खुलासो तो कोनीं मिलै । बिरकाळी अर संस्कर्ता रै मारफत आपां आगै री कविता जिण नै नुवीं कविता कैवां री जातरा अर उण रा बदळावां री कहाणी नै समझ सकां ।


रुको, थोड़ा ठेरौ
थांरै पगां में पड़ी है
बिखरयोड़ी म्हारी भासा
कीं सबद चुगण दो म्हनै
वांरै तूट-भाग अर
घिसीजण सूं पैली
म्हनै कविता लिखणी है ।
(कवि : पारस अरोड़ा)

कविता लिखणो कला है अर कविता में कवि गणेशीलाल व्यास ‘उस्ताद’ (१९०७-१९६५) टाळ किणी बीजै कवि रै नांव सूं आधुनिक कविता री बात कोनी होय सकै । उस्ताद री कविता राजस्थानी में आधुनिक कविता री सबळी बानगी मानी जावै । उस्ताद रो आजादी पछै आजादी सूं मोहभंग हुयो इण बात नै आपां दूजै सबदां में कैवां तो आजादी रो सुख फगत सपनै रो सुख बणग्यो- " इण दिस सुख री पड़ी न झांई, राज बदळगयौ म्हांनै कांई" अर "लोग कवै सूरज ऊगौ, पण कठै गयौ परकास / हाथ हाथ नै खांवण दोड़ै, किण री राखां आस ? मुलक री आ कैड़ी आजादी...." । जठै उस्ताद री कविता समाज री हकीगत बयान करण री कविता ही तो बठै ई चंद्रसिंह बिरकाळी री कविता समाज रै चौफेर पररियै वातावरण रै विविध रंगां नै बखणती कविता ही । रंग-रूप री पकड़ में उस्ताद जठै चूक जावै वठै कवि बिरकाळी आपरी कलम री करामत दिखावै पण आजादी पाछलै बीस-पच्चीस बरसां तांई री सगळी रचनावां में आज रै दिन देख्यां आपानै कविता रो पूरण पुरुस कवि कन्हैयालाल सेठिया टाळ कोई दूजो नीं लखावै ।


सूंसाड़ा भरती
मझ दोपेरी बेळां में
तू उड़ीकै है
उण री पायल री
झणकार रौ
मदरो-मुदरो सुर !
टूटा रमतिया में
बचपण कितरा दिन
बंध सकै है
बावळा ?
(कवि : भगवतीलाल व्यास)

तूट्योड़ा रमतिया में जिण ढाळै बचपन नै कोनी बांध सका बियां ई पचपन-छप्पन का साठ बरसां री कविता जातरा में खासो कीं छोड़णो लाजमी है क्यूं कै छुट-पुट रूप में आपरी न्यारी-न्यारी कवितावां सूं समकालीन जथारथ अर मानवी मूल्यां री नुवीं दीठ नै अंवेर वाळा कवियां रो पूरो रो पूरो अगावू एक जत्थो है। कवि सेठिया मुजब- "गुड़ है गूंगै रो / उठा-पटक रो / अखाड़ो कोनीं कविता / ओखद है आतमांरी / माटी री काया रो / भाड़ो कोनीं कविता" गूंगो किंयां बखाणै कै राजस्थानी री नुवीं कविता किंयां-कांई है ? खराखरी तो आ ई बात है कै साठ बरसां री साठी-पाठी कविता नै तो पूरी बांच्यां ई पूरो पूरो स्वाद आ सकै ।


सांच पूजां म्हे
मिनख री साधनां पूजां
साच नै साकार करती
कल्पना पूजां
सिल्प पूजां
सिल्प उतरी सिरजणा पूजां
म्हे कला रा पारखी
पत्थर कणां पूजां ?
(कवि : मोहन आलोक)

मिनख री साधना री कदर करण वाळा कला पारखी कवियां री पूरी खेप में फगत हरावळ टोप टेन कवियां रा नांव जे आपां टाळां तो दस कवि रा नांव है- कन्हैयालाल सेठिया, सत्यप्रकाश जोशी, नारायणसिंह भाटी, पारस अरोड़ा, भगवतीलाल व्यास, मोहन आलोक, सांवर दइया, चन्द्रप्रकाश देवळ, अर्जुनदेव चारण अर ओम पुरोहित ‘कागद’ ।


कित्ताक दिन रैवैला
तण्यो म्हारो डील-रूंख ?
नितूकी बाजै
अठै अभाव-आंधी
होळै-होळै कुतरै
जड़ा नै जीव
अबै
औ गुमान बिरथा
म्हारी जड़ां
जमीन में कित्ती ऊंडी है !
(कवि : सांवर दइया)


जड़ा जमीन में ऊंडी होया ई आंधी रै थपेड़ा सूं मुकाबलो हुय सकै अर लारला साठ सालां री कविता री जमीन री बात करण खातर आधार ग्रंथ रूप चरचा करां तो कवियां री खुद री छप्योड़ी पोथियां रै अलावा रजस्थानी री पत्र-पत्रिकां रा खास कर नै कविता-विशेषांक आपां गिण सकां । परंपरा रै "हेमांणी" अंक (१९७३) नै कुण भूल सकै है ? बो सिरै संकलन सदीव याद रैसी । केई पत्रिकावां आपरा कविता विशेषांक छाप’र उणी सामग्री नै पोथी रूप ई प्रकाशित करी है जिण में "राजस्थाली" रा संपादक श्याम महर्षि (आठवै दशक री प्रगतिशील कविता, उमस आद) अर "आगूंच" रा संपादक मीठेश निरमोही (आधुनिक राजस्थांनी कवितावां) रा नांव घणा मेहतावूं है ।


म्हैं राजी होय बधावौ उगेरण
गळौ खेंखारियो ई हौ
के औ कांईं
जूना झंड़ा अर कल्दार री जोड़ा-जोड़
म्हांरी भासा ई चलण में नीं रही
खोटे पड़गी
नवै राज नवीं भासा !
जांणै भासा कोई संविधान व्है
जिकय आयै राज पलटीजै ।
(कवि : चन्द्रप्रकाश देवळ)


शिक्षा विभाग राजस्थान री सेवावां ई राजस्थानी रै खातै गुण गावै जिसी है कै आयै बरस पांच सितम्बर नै एक पोथी राजस्थानी गद्य-पद्य संकलन री एक पोथी छापै अर संपादक पलटीजै । राजस्थानी रा कवियां अर लेखकां रै संपादन में छपी शिक्षा विभाग री पोथियां में केई केई उल्लेखजोग रचनाकारां री कवितावां रै साथै साथै कचरो ई घणो छ्प्यो है । इणी खातर म्हैं आगूंच लिख्यो कै फगत नांवां रै दाखलै रूप ई आपां साठ पानां में बांरां नांव नांव ई लिखां तो कमती पड़ै पानां !


अठै सूं ई उडियौ हौ म्हैं
ऐन थांरै पगां कनै सूं ।
थांरी ठोकर
बतायौ आभौ
थे म्हारी जलम-भोम
क्यूं नटौ
बजावण सूं थाळी कांसी री ।
(कवि : अर्जुनदेव चारण)


समूळै काम री अंवेर तो साहित्य रै इतिहास में हुया करै फेर ई आपां संपादित पोथियां में खास उल्लेखजोग आं पांच पोथियां नै तो विगतवार दाखलै रूप लेय ई सकां हा- "राजस्थान के कवि" (१९६१) संपादक- रावत सारस्वत (प्रकाशक- राजस्थानी भाषा साहित्य संगम, बीकानेर), "राजस्थानी काव्य संकलन" (दूजो संस्करण १९९४) संपादक- कल्याणसिंह शेखावत (प्रकाशक- राजस्थानी साहित्य संस्थान, जोधपुर), "आज री राजस्थानी कवितावां" (१९८७) संपादक- हीरालाल माहेश्वरी अर रावत सारस्वत (प्रकाशक- साहित्य अकादेमी, नयी दिल्ली), "आधुनिक राजस्थानी-काव्य" (१९९१) संपादक- रामेश्वरदयाल श्रीमाली (प्रकाशक- साहित्य अकादेमी, नयी दिल्ली) अर "अंवेर" (१९९२) संपादक- पारस अरोड़ा (प्रकाशक- राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी, बीकानेर) ।


रूंख नीं
डाळी नीं
पानड़ा नीं
सूळ नीं
नीं छींयां
चिड़कली बापड़ी
बसै कींया ?
(कवि : ओम पुरोहित ‘कागद’)


कवि कागद री इण कविता नै आपां इण ढाळै ई लेय सकां हा कै पत्र-पत्रिकावां कोनी, लेखक-कवि पोथी खुद छापै अर बांटै, पोथी बिकै तो कोनी फेर कविता अर नुवीं कविता रो तो कैवणो ई कांईं ! तो बापड़ी राजस्थानी री नुवीं कविता नै बसावण खातर म्हारा लियोड़ा दस नांव ई उजाड़ करण रै मतै कोनी लियोड़ा । कविता नै बसावणी है अर केई दस नांव दस पछै ई लिया जाय सकै, क्यूं कै दस पछै कोई समूळी बस कोनी । एक बात अथै आ पण विचारां कै आपांनै कठैई नै कठै तो आगै जाय’र बस करणी ई पड़ैला दस, बीस, तीस छेकड़ कित्ता ? किण किण नै टाळां किण नै लेवां ? तो नीरज दइया आद-आद केई कवियां रा नांव पण लिया जाय सकै है जिणां रा केई काव्य संकलन ग्रंथ प्रकाशित हुया है (मतलब एक सूं बेसी दोय कविता पोथियां छप्योड़ी है!) । जिण कवियां री कोई ढंगसर काव्य पोथी ई कोनी छपी बै नांव पण महतावूं होय सकै । महतावू बात है कै राजस्थानी कविता में एक नुवीं धारा अर आंदोलन रूप में बरस १९७१ में पांच कवियां री कवितावां ‘राजस्थानी- एक’ रै मारफत सामीं आई जिकी उण बगत री जरूरत रैयी हुवैला पण बां मांय सू फगत एक पारस अरोड़ा नै टाळ’र बाकी रा चारूं कवि बेगा ई घिसग्या, जियां मणि मधुकर तो जाणै बरस १९७५ रै अकादेमी पुरस्कार खातर ही राजस्थानी में ‘पगफेरो’ करियो हो, तेजसिंह जोधा री फगत एक ‘ओळूं री ओळ्यां’ पोथी ही छ्पी, ओंकार पारीक री काव्य साधना एक सतत कवि रै रूप में नीं रैवण रा केई कारण रैया हुवैला अर गोरधनसिंह शेखावत री ‘किरकर’ १९७१ अर ‘पनजी मारू’ १९८८ छपी पण "खुद सूं खुद री बातां" (जागती जोत में तेजसिंह जोधा रै संपादन में छ्प्योड़ी पोथी रूप बरसां रा बरस बीत्या पछै १९९० में छपी ) रै जबरदस्त कवि री संभावनावां बै लगोलग पूरी नीं कर सक्या । खैर इत्ती खथावळ ई काम री कोनी होय सकै कै पांचै दिन कोई नुवीं विगत सामीं आवै । इण में किणी नै संका कोनी कै कवि कन्हैयाल सेठिया, नारायणसिंह भाटी अर सत्यप्रकाश जोशी री त्रिवेणी आपरी सतत सिरजण जातरा रै पाण रजस्थानी कविता नै आपरी ओळखाण दीवी अर मजबूत आधार दियो । कवि कन्हैयालाल सेठिया(१९११ -२००८) सत्यप्रकाश जोशी ( १९२६-१९९०) अर नारायणसिंह भाटी (१९३०-१९९३) आधुनिक कविता रा पैलड़ा तीन थंबा मान्या जावैला जिणां री कविता सूं ही कविता नै आगै रो आपरो पुखता मारग मिल्यो ।


नुवीं कविता रा टोप टेन कवि


कन्हैयालाल सेठिया

कोनी करिया जा सकै / मिनख री चेतना रा / टुकड़ा / निरथक है / बिन्या संवेदणा / सिरजण री कलपना ! (सांच) संवेदणा रा सजग कवि कन्हैयालाल सेठिया री १४ पोथियां राजस्थानी में छपी । कवियां में सगळा सूं लांबी जतरा करण में अगावू कवि री पोथियां है- रमणियां रा सोरठा (१९४०), मींझर(१९४६) , गळगचिया (१९६०), कूंकूं (१९७०), लीलटांस (१९७५) , धर कूंचा धर मंजळां (१९७९), मायड़ रो हेलो (१९८४), सबद (१९८५), सतवाणी (१९८७), अघोरी काळ (१९८७), दीठ (१९८८), कक्को कोड रो (१९८९), लीकलकोळिया (१९९१) अर हेमाणी (१९९९) । छंद अर गीत माथै तो जमर कवि सेठिया आपरी खिमता दरसाईज पंण नुवीं कविता रै लेखै बै "दीठ" (संपादक- तेजसिंह जोधा) आंदोलन सूं ई जम’र मुकाबलो करियो । बांरी कविता में बगत बगत माथै बदळाव ई आपां देख सकां अधुनिक अर आधुनिक होवता कवि सेठिया रो मूळ सुभाव एक अजातसत्रु रो रैयो है । बै खरै खरी एक संत कवि रै रूप में नुवीं कविता में दर्शन, ग्यान, विग्यान अर चिंतन रा केई केई मारग खोलणिया कवि हा । राजस्थानी गाथा रै साथै-साथै मानखै री पीड़ नै बां आखरां में ढाळी- अकाळ तो खैर राजस्थानी कविता रो स्थाई विसय रैयो है पण राजस्थानी भाषा री मान्यता रै मुद्दै माथै बां कविता करी । थोड़ै में कैवां तो कन्हैयालाल सेठिया तो गागर में सागर रा कवि है कै बांरी छोटी-छोटी कवितावां आप-आप री खासियता में जीवण रै विविध अनुभवां री कविता है । विधि रै विधान नै बखाणती कवितावां में कवि री चिंता किणी बडेरै-सी है कै आवण वाळी पीढी नै सावचेत करण वाळी है । जुगल परिहार रै सबदां में- " आपरी जलमभोम अर आपरै सांस्कृतिक परिवेश सूं जुड़िया थका सेठियाजी आपरै जुग री सामाजिक विषमतावां, शोषण अर दूजी विकृतियां सूं अणमणा नीं रैया अर आं बिथावां नै आपरी कवितावां रै जरियै वाणी दीवी । आध्यात्मिक स्वभाव रा हुवण सूं आं रौ मूळ स्वर अध्यात्मवादी रैयौ, सो आंरी घणकरी रचनावां मांय चिंतन री गैरी छाप मिलै ।"


सत्यप्रकाश जोशी


"जमानो केई सबक सिखायग्यो / लुगायां नै लेवता बेचता- / अर किराया माथै उठावता लोग / ना खुद लागै मिनख, / ना बै लुगायां लागै नारी-रतन ! " (ओळख) आजादी पछै सरू होई कवि सत्यप्रकाश जोशी री काव्य-जातरा में पैली तो मंचिय कविता रो घणो प्रभाव रैयो । सहस्त्रधारा नांव री पोथी १९५५ में छपी अर उण में हिन्दी राजस्थानी दोनू भासावां री कवितावां भेळै ही । पोथी "राधा" बरस १९६० में आपरी पौराणिक प्रसंग माथै सफल कव्य पोथी मानीजै, दीवा कांपै क्यूं १९६२ अर १९७४ में "बोल भारमली" रै मारफत तो जाणै गढ़ जीत लियो । गांगेय (१९८५), आगत-अणगत (१९८६), आहूतियां (१९८६), पुजापो (१९८७) अर सोन मिरगलो (२०००) आपरी सिमरध सिरजणा री साख भरै । कविता में लोक तत्त्व नै परोटणो कोई जोशी सूं सीखै । राजस्थानी समाज रै काण-कायदा अर बदळावां री विगत आपा आप री कवितावां सू जाण सकां । "राधा" माथै नुवीं कविता री गत में खंड-काव्य रचण री कला में जुद्ध-विरोधी धारणा री खूब-खूब सरावणा मिली तो "बोल भारमली" कविता पोथी सूं पैली बार लुगाई नै लुगाई अर पुरण पुरुस री सोच माथै नुवां सवालां रै हवालै अंजसजोग काम सत्यप्रकाश जोशी करियो । मिनख-लुगाई रै चरित्र नै कवि बारम्बार बखाणता उण मनगत नै सबदां रै पाण सजीव करी जिकी कै हाल तांई नुवीं कविता रै पाण कथीजणी बाकी ही । "गंगेय" में महाभारत रै भीस्म रै प्रसंग सू नारी-भावना बखाणता कवि जोशी री आंख राजस्थान में नारी जाति री मनगत अर मजबूरी कानी ई रैयी है । कवि री आपरी ईजाद करियोड़ी रळयावणी काव्य भासा अर लोक सू पोखिज्यो थको आपरो निजू सिल्प है जिण में कवि री लय बेजोड है सो सत्यप्रकाश जोशी रो एक सुर नुवीं कविता पैटै सदीव याद करियो जावैला । मिनखा जूण री केई केई देखी परखी निजू घटनावां अर कथावां बखाणता बांरी जुग रै बदळाव में प्रासंगिकता रै पाण कवि नुवां अरथ आपां सामीं राखै कै कविता जुग सूं घणी करीबी रिस्तो बणावण लागै । चेतन स्वामी रै सबदां में- "जोसीजी कनै कविता रो जिको ‘क्लासिक फार्म’ है वो नीं ‘आज’ सूं जुदा है, नीं ‘काल’ सूं अळ्गी । कविता में जिकी चीज खास होया करै- मांयलो लगाव, उणरी अपड़-पकड़ जोसी कनै खूब-खूब । लयकारी रै नातै, आनुप्रासिक बंधेज तो वांरी हरेक कविता री पंगत-पंगत में सैंचरूड़ होवै ।"


नारायणसिंह भाटी


" कालै ही म्हें कीट्स नै / पाछौ पढ़ियो / म्हनै लागौ / कै एक पल री जिन्दगी में / लाख बरस जिया जा सकै है / अर लाख बरस रौ इतिहास / एक पल रौ इतिहास है" ( कवि कीट्स नै फेरूं पढ़ियां) ओळूं, सांझ, दुर्गादास, जीवण धन, परमवीर, कळप, मीरां, बरसां रा डीगोड़ा डूंगर लांधियां, मिनख नै समझावणौ दोरौ है अर छेहली कविता पोथी पतियारौ कवि नारायणसिंह भाटी री काव्य जातरा रा पाका फळ है । दुर्गादास बरस १९५६ में छप्यो जिण सूं चरित-काव्य रचना में मुगत छंद री खिमता कवि नारयणसिंह भाटी उजागर करी । मिनख रै माण खातर जुद्ध मांडण वाळै री मनगत अर उजळै चरित नै नुवीं कविता में भी परोट्यो जाय सकै है आ थरपणा ही कवि भाटी री । १९७६ में मीरा माथै काव्य आप रै नुवां आयामां नै प्रगटै । बरस १९५४ "सांझ" छपी अर १९८४ "मिनख नै समझावणौ दोरौ है" आं तीस बरसां रै आंतरै में कवि नारायणसिंह भाटी री काव्य भासा आपरी निजू सबदावळी रो मोह लिया एक ठसकै वाळी काव्य भासा है, पण कवि जनता री भासा नै होळै-होळै "पतियारौ" तांईं कवि ओळखै । कवि री भासा माथै आपरी निजू पकड़ है सो आपां कवि री कोई पण कविता नै तुरत पकड़ सकां कै आ कविता नारायणसिंह भाटी री है । प्रकृति अर सौन्दर्य नै अंवेरण में कवि री रुचि कीं बेसी रैयी । कवि भाटी डिंगळ री परम्परा नै आधुनिक काल में साकार सिद्ध करण वाळा कवि हा अर बां बीं परम्परा रो रुतबो नुवीं कविता में प्रगट ई करियो । नारायणसिंह भाटी ई फगत अर फगत एक कवि है जिका डिंगळ नै साध परा नुवीं कविता री भासा में सिद्ध करी । छंदां री छटा अर प्राचीन साहित्य रै ग्यान रो आतंक नुवीं कविता नै डरावै । इण कवि रै जोड़ रो बीजो कोई कवि राजस्थानी में कोनी मिलै अर घणै अंजस री बात कै आप ई "परम्परा" शोध पत्रिका रो बरस १९७३ में हेमांणी अंक प्रकाशित करवायो अर केई संजीदा काम परम्परा रै मारफत करिया । कोमल कोठारी रै सबदां में- "सांझ रौ कवि जिकौ के भासा अर भावगत सूं मुगती री घोसणा करै हौ, वौ ई कवी आगली रचनावां में रूढ़ काव्योक्तियां कांनी चाल पड़ियौ । विसयां रै चुनांव अर जीवण मोलां नै उखेल’र फेकण में असमरथ लागण लागौ, जिका खुद उणरी मूळ काव्यगत प्रवृति रै सारू ई घांदौ हा । उण रौ व्यौहार, उदार संयम, भूतकाळ में देखण री प्रवृति अर अळसाई परम्परावां रौ बंधण धीरै-धीरै सिरै व्हेण लागौ ।"


पारस अरोड़ा


"तिरकोण हुयो चौकोण / कोण सूं कोण निकळ्गी / धीरै-धीरै / सगळौ दृस्टिकोण बदळग्यौ / काल रौ सांच नीं रैसी आज / आज रै सांच नीं रैसी काल / बगत रौ औ कैसौ जंजाळ / बगत हथियार, बगत है ढाळ " ( बगत री पाळ) कवि पारस अरोड़ा रा तीन काव्य-संग्रह छपियोड़ा है- ‘झळ’(१९७४), ‘जुड़ाव’ (१९८४) अर ‘काळजै में कलम लागी आग री’ (१९९४) अर आप एक सिमरध कवि रै रूप में ओळखीजै । आपरी कविता एक न्यारी काव्य भासा अर मुहावरो हासिल कर चुकी है अर भासा में संप्रेषण अर निजू काव्यात्मक सुर रै पाण आप आपरी पुखता कवि-ओळख राखता थकां राजस्थानी पाठकां सामीं सांवठो भरोसो दरसायो है । नैनी कवितावां रचण रै साथै साथै पारस अरोड़ा लाम्बी कवितावां ई रचण में माहरत हासिल करी है । लाम्बी कविता ‘जुड़ाव’ में कवि आपरै जीवण रै अनुभवां अर लखावां नै घणी चतराई रै साथै सरलता अर सैजता राखता थकां राखै । कवि कंपोजिटर रो काम जीवण में करता थकां कविता ई ‘कंपोजिटर’ माथै मांड़ी जिण में एक कम्पोजिटर री जिन्दगणी रो जींवत चित्रण हुयो है । ‘म्हैं सुणावूं, सुण’, ‘आपरै-म्हारै बिच्चै फरक’, अर ‘लो, संभाळै थांरी दुनिया’ आद आपरी चावी-ठावी कवितावां है । बगत रै बदळावां नै सबद सूं कैद करण वाळा कवि पारस अरोड़ा री कविता में एक लाम्बै बगत रो बदळाव देख सकां कै घर-परिवार, रिस्ता-नाता, समाजू हालत रै साथै साथै लोगां रै सोच में ई बदळाव आयग्यो है । छेहली बात कै कवि पाखती चीजां नै राखण रो एक सलीको है जिण रै कारण काव्य-संकलनां में खंड़ां रो बंटवारो अर चयन ई आपां रो ध्यान खींचै ।


भगवतीलाल व्यास


"आ, पवन ! / म्हारै कनै बैठ / तूं हांफ क्यूं रैयो है ? / छनीक विसराम कर / थनै सौरम रा / छंद सुणाऊं / सबदा रौ / अरथ समझाऊं !" (अगनी मंतर) भगवतीलाल व्यास री तीन काव्य पोथियां प्रकाशित है- अणहद नाद (१९८७), अगनी मंतर (१९९३) अर सबद राग (२०००) । कविता में सरल सीधी सपाट सी दीखण वाळी बात नै उठा परा आप उण नै एक दिसा में मोड़ता थका कविता में नुवै अरथ खोलण री खिमता हासिल करी है, आ आपरी निजू खासियत है । कविता नै जीवण जथारथ साथै-साथै सामाजिक रूप-रंग में देखण-परखण अर राखण रै कारण आप री कविता में एक ठीमर नै जिम्मेदार सुर मिलै । जीवन मूल्य, मानखै री आस्था अर विसवास नै प्रगटतां थकां कवि री रचनावां में जीवण नै जुद्ध मान नित जीवण सूं जूझ मांड़ण वाळा री कीरत कथा रो बखण ई मिलै तो सामाजिक जथारथ, विसमता अर विसंगतियां नै कविता में संवेटता मिनख रै जीवण-जुद्ध रै सुख-दुख जीत-हार रा चितराम ई मांड्या है । कवि आपरै चौफेर रै समस्त जगत सूं कव्य सरोकार राखै जिण सूं कविता में जठै मिनख है वठै प्रकृति, चर-अचर परिवेस ई पण उण री कविता है । काव्य भास आम आदमी री बोलचाल री सहज-सरल है । पोथी "अणहद नाद" बाबत कन्हैयालाल सेठिया री टीप ही- " मोटी बात आ है कै जको साहित सिरज्यो जावै बीं में दिस्टी हूणी चाहीजै, मनैं घणो संतोष है कै श्री भगवतीलाल जी सिस्टी में दिस्टी है ।"


मोहन आलोक


"बात / जणा कह नीं सकै / बात रै मांयली बात / तो कविता आवै / अनै आप रै / बिम्बां / प्रतीकां / उपमावां रै जरिये / अरथ नै पूग’र / एक सबद हू जावै ।" (एक सबद है कविता) ग-गीत(१९ ) डांखळा(१९ ) चित मारो दुख नै(१९ ) आप ( १९)सौ सोनेट(१९) एकर फेरूं राजियै नै(१९ ) वनदेवी : अमृता (२०००२) अर चिड़ी री बोली लिखौ (२००३) ऐ मोहन आलोक री काव्य साधना रा केई पांवड़ा है अर फगत एक मोहन आलोक ई राजस्थानी में प्रयोगशील कवि रै रूप में नित नुवीं पगडांडी काढ़-काढ़ लांबी जातरा करण वाळो जातरी है । गीत-गजल री बात छोड़ फगत नुवीं कविता री बात करां तो डांखळा, सोनेट, वेळियो, रूबाई अर पर्यावण माथै महाकाव्य लिखण वाळो ओ कवि नुवीं कविता नै नुवीं अर नुवीं बणाई अर कविता नै जीवण वाळो कवि है । अबै सवाल ओ है कै कविता नै जीवां किंयां ? "चिड़ी री बोली लिखौ / रंग फूल रो निःशब्द / कलम नै आंख में / पकड़ो / करो / आकास कागद ।" दूजो दाखलो- "चिड़ी उड़ी / ल्यो हुयगी कविता" तीजो दाखलो- "फूल रै नैड़ै जावौ / अर वीं सू आपरै / मन री बात कैवौ / उथळौ आवण री उडीक करो / थोड़ी ताळ / बीं कनै बैठा रैवौ ।" ओ है कविता नै जीवणो, अठै कविता नै अरथावणो कोनी फगत अर फगत उण आंख नै संभाळ’र आपां नै राखणी है जिकी सूं आपां कविता री दुनिया देख सकाला या कैवां दुनिया में कविता देख सकांला । कविता कवि आलोक आपरो निजू सुर साधता थका एक लय मेंटेन करै जिण रै पाण केई ओळ्यां तो घणी यादगार बण चुकी है । राजस्थानी कविता रै सीगै हाल कवि मोहन आलोक री काव्य-साधना री पूरी पड़ताल हुवणी बाकी है पण कवि री कला कविता नै नित नुवां रंग सूंपता थकां उण नै पठनीय अर चिंतन-मनन जोग बणावण में देखी जाय सकै है।


सांवर दइया


अबै अठै / सिरजण रा सुर क्यूं सोधै / ओ म्हारा बावळा मन! / उठ! / अंवेर आखर / जोड़ाअंनै कीं रच / अणरच्यो हुवै जिको आज तांई / रचण रो मोड़ थारी कलम माथै" (कसक) सांवर दइया (१९४८-१९९२) रा प्रकाशित कविता संग्रह है- मनगत (१९७६), काल अर आज रै बिच्चै (१९७७), आखर री औकात (१९८३), आखर री आंख सूं (१९८८), हुवै रंग हजार (१९९२) अर आ सदी मिजळी मरै (१९९६) । नैनी काव्य धारा सूं जुड़ता थका कवि सांवर दइया आपरै "मनगत" काव्य संग्रह में मनगत रा केई-केई दीठाव चितराम रूप राख्या अर "आखर री औकात" में बां आपरी मनगत नै एक छंद "हाइकू" काव्य-जनक रै रूप में सामीं राखी । कवि री लम्बी कविता में कथात्मक भाव मिलै- हुनर, कूकड़-कथा, अगन कथा आद । आ सदी मिजळी मरै में गजलनुमा कवितावां नै कवि पंचलड़ी कविता नांव दियो हो, सायद इण रो कारण ओ रैयो हुवैला कै गजल री बारीकी उर्दू करता राजस्थानी में निभणी सोरी कोनी । बिंयां कवि रो हिन्दी में पैली "दर्द के दस्तावेज" नांव सूं हिन्दी में गजल संग्रह पण छप्यो हो । कवि सांवर दइया रो कवि रूप खास कर नै "आखर री आंख सूं" अर "हुवै रंग हजार" में घणो असरदार लखावै क्यूं कै अठै कवि आपरी काव्य-भासा रै पाण कविता रो आंटो साध चुक्यो है, ऐ राजस्थानी नुवीं कविता री महतावूं पोथियां है । ओंकार श्री रै सबदां में- " असाधारण संवेदन, सहज सरल भासा, सचोट व्यंग्य अर घर-परिवार रा नियोजित रंग, सांवर दइया री कविता चेतणा री अंगेज जरूरी है । नुवीं ओळख सारू इणा री कविता प्रकाश स्तम्भ रो काम करैला ।"


चन्द्रप्रकाश देवळ


" सूखोड़ा पीळा पांन / होळैक / मयत डाळा सूं छूट जावै / कठैई कीं नीं व्है / पण म्हारै कानां कळपती आवाज.... / आकळियोड़ौ / अंग-विहूंण व्हैतौ म्हैं / सांभळूं सरणाटा रौ सिंधु-राग / अर करण लागूं जुद्ध / खुद नै पाछौ थरपण सारू !" (जुद्ध) कवि चन्द्रप्रकाश देवळ लगोलग कविता लिखण वाळा कवि है- पागी(१९७७) , कावड़(१९८७) , मारग(१९९२) , तोपनामा( ) , राग विजोग( ) अर उडीक पुराण(२०००) । कवि देवळ नुवीं कविता रै मूळ गुण कानीं संकेत करता लिखै -थे जाणौ ई कोनी / थारै अरथावण री बगत / म्हैं लय में छूट जावूंला / बिरथा कळाप छोड़ौ / म्हैं थारै हाथ नीं आवूंला । नुवीं कविता अरथावण री चीज कोनी बा तो सुण-बांचण एक अनुभव-अनुभूति रै भाव में पूगण रो जरियो है । कवि मोहन आलोक तो लिख्यो ई है- भासा नै जावण दे, भावां नै आवण दे..। भाव स्तर माथै सायद ओ ई कारण है कै देवळ री कविता हाल अरथाइजी कोनी । बगत फैसलो करैला कै कवि कन्हैयालाल सेठिया पछै राजस्थानी कविता में एक क्रांतिकारी नांव चन्द्रप्रकाश देवळ रो है जिणा रै कारण राजस्थानी कविता में आपां नै विसयगत विविधता अर विचार री नवीनता रा केई-केई मारग मिल्या है । नुवीं कविता रो कविता-विसय अर आपरै कथन माथै मोह देवळ री कवितावां में भी आपां देख सकां । किणी विसय माथै बारम्बार विचारणो अरसबदां रै सीगै नुवां नुवां अरथ तांई पूगणो ई देवळ री मूळ काव्यगत विसेसता है । कवि देवळ राजस्थानी में सांतरी गद्य-कवितावां ई लिखी है । गोरधनसिंह शेखावत रै सबदां में- " लोकजीवण री सहजता सूं आज रै मिनख री समस्यावां नै आपरी कविता में उजागर करी है । आपरी कवितावां में ताजगी अर सहजता है ।"


अर्जुनदेव चारण


"होयजा निरपेख / अबोट / चीजां नै टाबर देखै ज्यूं देख / खुद नै सोध / हिलती छींयां रै मांय / बध / जांनै टाबर भरियौ होवै / पै’लौ पांवडौ / रच ।" (रच) अर्जुनदेव चारण रो ‘रिंधरोही’ काव्य संग्रह छप्यां पछै दूजो काव्य संग्रह "घर तौ नांव है एक भरोसै रो" आयो है । आप कवितावां लिखै तो है पण छपै कोनी सो कोई म्हारी इण बात सूं असहमत होय सकै कै नुवीं कविता पैटै कवि चारण री कीरत सदियां गावैला क्यूं कै रामायण अर महाभारत रै पौराणिक संदर्भां नै नुवीं दीठ सूं परोटतां थकां बां राजस्थानी नुवीं कविता रो रुतबो घणो ऊचो करियो है । कथा नै कविता में ढाळण री माहरत जाणै कवि नै किणी वरदान सरूप ई मिली है कै बां जूना नारी चरित्रां नै सजीव करता थकां आज रै प्रसंग में केई केई सवालां रै बरोबर अड़ा-अड़ी में ऊभा कर देवै । कविता में भास सहज सरल होवता थकां पण नाटकीय हुनर रै पाण कवि काळजै रै ऐन बिचाळै ऊभो होयर बोलै । ऊभी ही ऊभी रैयी नाजोगा री भीड़ या ओळी वौ तौ हौ राम बायरौ राम का फेर थू मोरपांख सू खोलिया उण जुग रा वजर किंवाड़ जैड़ी केई केई ओळ्यां जाणै मन-मगज में आपरी स्थाई गूंज करै जाणै किणी ठौड़ कोई नाम-पट्टो बणार पूरो कबजो कर लियो हुवै । किणी एक विसय माथै ई कवि री रचनावां में विविधता अर रंगां री मनमोवणी छटा ई देखण जोग है । घर-परिवार रै प्रसंगां री कवितावां ई घणी मार्मिक है । कुंदन माळी रै रिंधरोही माथै टीप करतां एक ठौड़ लिखै जिकी बात कवि चारन रै पूरै काव्य माथै ई लागू करी जाय सकै- " मिनख रै पारिवारिक संदर्भा नै केई कवितावां में कवि पौराणिक बिम्ब प्रतीक अर चरित्रां रै माध्यम सूं प्रगट करै । अठै आ बात उल्लेखनीय है कै कवि आं पौराणिक चरित्रां नै बदळतै समै अर परिपेख रै हिसाब सूं नुंवा अरथ देवण री सारथक कोसिस करै ।"


ओम पुरोहित ‘कागद’


"इसै समै / कविता बांचणौ / अनै लिखणौ / किणी जुध सूं स्यात ई कम हुवै ।" (कविता) ओम पुरोहित ‘कागद’ रा च्यार कविता संग्रह प्रकाशित हुया है- अंतस री बळत(१९८८), कुचरणी (१९९२), सबद गळगळा (१९९४), बात तो ही (२००२) अर आं रचनावां में कवि री सादगी, सरलता, सहजता अर संप्रेषण री खिमता देखी जाय सकै । कवि राजस्थानी कविता रै सीगै नैनी कविता री धारा नै नुवै नांव दियो- ‘कुचरणी’ अर केई अरथावूं कुचरणियां रै पाण आधुनिक राजस्थानी री युवा-पीढ़ी री कविता में आपरी ठावी ठौड़ कायम करी है । कविता नै प्रयोग रो विसय मानण वाळा केई कवियां दांई ओम पुरोहित ‘कागद’ री केई कवितावां में प्रयोग पण देख्या जाय सकै है अर एक ही शीर्षक माथै केई-केई कवितावां सूं उण विसय नै तळां तांई खंगाळणो ई ठीक लखावै । कवि रो कविता में मूळ सुर अर सोच मिनखा-जूण अनै मिनख री अबखायां-अंवळ्या खातर है जिण में कवि ठीमर व्यंग्य ई करण री खिमता राखै ।

बांचणियां नै आगली ओळ्यां----
राजस्थानी नुवीं कविता रो ओ एक दीठाव है पण इण रै आखती-पाखती मांय-बारै खासो कीं भळै है-


कीं तौ खायगौ राज
कीं लिहाज
अर रह्यौ सह्यौ खायगी चूंध अर खाज
{ चौथी ओळी बांचणियां नै
-जचै ज्यूं मांड़ौ आज }
(बांचणियां नै चौथी ओळी : तेजसिंह जोधा)

तेजसिंह जोधा री कविता जातरा नुवीं कविता नै हरी झंडी दिखावण जिती ई रैयी है पण बै आगौ री पारी नै बीजा कवियां नै संभळापरा जचै ज्यूं मांडण नै छोड़ग्या सो राजस्थानी कविता में एक गतिरोध तो दूर हुयो पण कवियां री भीड़ में कविता री ओळख पूरी पांगरी कोनी । कविता में गद्य सी सहजता अर सरलता सादगी हुवण सूं जठै कविता बयान बणगी अर देस-समाज- मिनख रा हाल कविता सूं बखाण परा कवियां बगत नै रचण री जिम्मेदारी निभाई ।


डर खाली इतरौ कै / बिना विरोध
अकारण ही मार दै कोई / बैठै सूते नै बिना बेर / बिनां बकारयां ई ।
(डर लागै : अन्नाराम सुदामा)

साथै ई आपां अठै विचार करां कै कविता रै सरलीकृत रूप माथै थोड़ो ध्यान दिया पद्य अर गद्य री सींवां में रैवतां थकां महतावू सिरजणा कर सकांला । बिंयां नुवीं कविता री एक धारा गद्य-कविता ई राजस्थानी में छुट-पुट रूप में आपरी पांखियां पसार रैयी है पण नुवीं कविता री गद्य सू दोस्ती एक मोटी खासियत बणर आपां सामीं है । श्यामसुन्दर भारती रै सबदां में- " आपरी बुणगट में आज री कविता गद्य रै नैड़ी है पण गद्य में औ सुभीतौ के- खालिस गद्य में जठै सब कीं साफ-साफ नै परतख होवै, अमूरत नै रहस री गुंजाइस नीं रै बराबर होवै, सब पत्ता खुला-खुला होवै, बठै पद्य में खासी लपेटियोड़ी बात ई चाल जावै ; चला देवै ।"


कितरा आछा हा वै दिन
जद लोग / आपणा नै तौ आपणौ
पण / पराया नै भी आपणौ कैवता
सगळा / एक दूजै रा दुख दरद में / सरीक रैवता ।
(आंतरो : रमेश मयंक)

कवियां रो देस-काल समाज सूं लगाव अर घर-परिवार सूं जुड़ाव-आंतरो कविता में नुवीं भावुकता अर सहज संवेदना साथै देखण में मिलणो आज री नुवीं कविता री खासियत बण नै आपां सामीं है ।


माफ करज्यौ / औसाण ई नीं मिल्यौ
ऐ दांत कद टूटग्या थारा ! / अर ऐ धोळा बाळ ?
आ बैठ, गौर सू देखूं थनै ।
कदै भाजौ-भाज में / आ जिनगाणी भाज नीं जावै ।
(आ बैठ बात करां : रामस्वरूप किसान)

अबै बात करां बां जूनी पीढ़ी अर नुवी पीढ़ी रा केई मोटा नांवां री जिणां माथै विगतवार बात अठै कोनी करीज सकी है- किशोर कल्पनाकांत, रामेश्वरदयाल श्रीमाळी, प्रेमजी प्रेम , सत्येन जोशी, बी.एल. माली ‘अशांत’, आईदानसिंह भाटी, श्याम महर्षि, नन्द भारद्वाज, लक्ष्मीनारायण रंगा, ज्योतिपुंज, मालचंद तिवाड़ी, श्यामसुंदर भारती, कुंदन माली, मीठेश निरमोही, पुरुषोत्तम छंगाणी, अम्बिका दत्त, बाबूलाल शर्मा, वासु आचार्य, सत्यदेव चूरा, नीरज दइया, शंकरसिंह राजपुरोहित, रवि पुरोहित, राजेश कुमार व्यास, प्रमोद कुमार शर्मा, रमेश मयंक, संतोष मायामोहन, कमल रंगा, सुमन बिस्सा, मदनगोपाल लढ़ा आद केई नांव है जिणा री बात बिना ओ आलेख आधो-अधूरो है पण इण नै आगै कणाई पूरो करांला । छेकड़ में युवा कवियां नै पारस अरोड़ा रै सबदां सूं कैवणो चावूं कै - "नवी छंद बिहूणी कविता नै ई एक अंतस लय री जरूरत व्है अर कवी नै आपरै कथ रै अनुकूल भासा अर मुहावरो बरतणौ पड़ै । इणी दीठ नवै कवियां नै खासी सावचेती बरतणी पड़ैला । कथ अर ढाळै मांय सूं किणी एक नै खास मांनण सू बात नीं बणै । दोनूं एक दूजै रा पूरक है । एक रै कमजोर हुयांम दूजौ पख कमजोर पड़ै ।"

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स्मृति में यह संचयन "नेगचार"

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श्री सांवर दइया; 10 अक्टूबर,1948 - 31 जुलाई,1992
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