Thursday, October 08, 2009

नामी कवि री नामी कहाणियां

भारतीय कविता में राजस्थानी कविता पटै जिण कवियां रा नांव आपां गिणां सकां बां में एक नांव मोहन आलोक रो है। कविता नै आब देवणियां हरावळ कवियां में तो मोहन आलोक रो नांव है, पण कहाणीकार रै रूप में आपरो नांव कोनी ! जद कै असलियत आ है कै आप री कहाणियां ई किणी कीमत में कमती कोनी। जिण ढाळै आप निजू अर नूंवा प्रयोगां रै पाण आधुनिक कविता में न्यारी-निरवाळी ठौड़ बणाई, उणी ढाळै कहाणी में ई नूंवै सूं नूंवां प्रयोग आप करिया है। हाल तांई आपरी फगत काव्य-पोथियां ई छपी है। ‘ग-गीत’, ‘डांखळा’, ‘चित मारो दुख नै”, ‘सौ सोनेट’, ‘वनदेवी: अमृता’ अर ‘चिड़ी री बोली लिखो’ आद। साहित्य अकादेमी रो मोटोड़ो पुरस्कार ई कविता खातर बरस 1983 में ‘ग-गीत’ पोथी नै मिल्यो, सो आप कवि रूप ई थापित हुयग्या। आप कविता रै अलावा ई खासो काम विविध विधावां अर अनुवाद पेटै राजस्थानी-हिंदी में करियो। जिको टैम-टैम माथै पत्र-पत्रिकावां में छ्प्यो ई पण कविता रो तुकमो घणो-घणो लांठो अर मोटो हुयां दूजै कामां री अंवेर-संभाळ सावळ नीं हुई। अठै कहाणी विधा नै लेवां तो डंकै री चोट कह सकां कै आप कहाणियां ई टणकी लिखी जिकी कै पत्र-पत्रिकावां में छपती ई रैयी। आप बरसां लग राजस्थानी री टाळ्वीं अर नामी पत्रिकां- मरुवाणी, हरावळ, हेलो, माणक अर जागतीजोत आद में छपियां। आं पत्रिकावां रा जूना अंक जोयां मोहन आलोक रो कहाणीकार रूप परतख निजर आवै।
श्री आलोक रै कहाणीकार रूप सूं म्हारी ओळखाण ‘उकरास’ रै सपादन पेटै सहयोग करता थकां हुई जद सांवर दइया वां री कहाणी ‘कुंभीपाक’ नै प्रतिनिधि कहाणी रै रूप संकलन में लीवी। ‘उकरास’ रा संपादक सांवर दइया री संपादकीय टीप ‘कुंभीपाक’ माथै इण भांत है-
“आज री विकराळ हुवती व्यवस्था में मिनख रो जीवण किण ढाळै नरक सूं ई माड़ो हुय रैयो है, इण रो एक पख ‘कुंभीपाक’ उजागर करै। आ कहाणी आज री व्यवस्था माथै केई सवाल खड़ा करै। कहाणी आवतै काल रै औरूं विडरूप हुवण रै खतरै कानी आंगळी सीध करै……” (उकरास; पेज-23)
‘कुंभीपाक’ में हरिजन अर सवर्ण री जिकी आरक्षणीय अबखायां है बां नै अंगेजतां आ दोनूं ई वरगां नै आपणी सुरगां सूं सोवणी (भारत) भोम कुंभीपाक नरक रो मारग सवायो लखावै। दूजै कानी आं रो आपसरी में आपरै वरगां री अदला-बदली रो सोच ई एक व्यंग्य नै प्रगटावै। कहाणी में शुद्र अर सवर्ण दोनूं ई आप आपरै खोळियै में जावण सूं नट जावै अर धरमराज सामीं शुद्र सवर्ण रै तो सवर्ण शुद्र रै खोळियै मांय जावण री इच्छा दरसावै। आजादी पछै देश मांय उपजी समाजू विडरूपता रो बखाण दोनूं पात्र आप आपरी दीठ सूं करै तो धरमराज रा ई पसीनां छूट जावै। इण ढाळै री बेजोड़ कहाणियां लिखियां उपरांत ई मोहन आलोक रै कहाणीकार रूप माथै हाल तांई किणी सावळ गौर कोनी करियो। राजस्थानी साहित्य में आपां रै अठै अबखाई आ है कै किणी रचनाकार री कोई पोथी छपियां ई उण नै उण विधा रै रचनाकार-रूप में गिणा-गिणावां। कदास ओ ई कारण है कै कहाणी-जातरा में कहाणीकार रै रूप में आं रो नाम अमूमन छूटतो रैयो है?
म्हारी दीठ में कवि मोहन आलोक री कहाणी-कला राजस्थानी तो कांई भारतीय भासावां रै किणी चावै-ठावै कहाणीकार सूं कमती कोनी। राजस्थानी मांय एक तो आधुनिक कहाणी रो घर छोटो, ऊपर सूं इन-मीन साढ़ी तीन कहाणीकार। कोढ़ में खाज कै कहाणी आलोचना री दीठ इत्ती मोळी कै फगत च्यार-पांच नांव ई बीं नै सूझै! नींतर कांई कारण है कै श्री आलोक री कहाणियां किणी आलोचना रै गड़कै नीं चढ़ी ?
कारण विचारां तो ठाह लागै कै एक तो आपां रै अठै शोध-खोज रो काम सावळ हुयो ई कोनी। दूजो कोलेज रा मास्टरजी फगत हाको करणियां रचनाकारां नै ई ओळखै। सो बां माथै ई कूड़ा-साचा शोध हुवै अर उपाधियां बंटै! फेर आपां रै साहित्य रा आलोचक गिणती रा ई है अर वां रा ई आपू-आप रा न्यारा-न्यारा नखरा है। सो आलोचना एक बंधी बंधाई सींव सूं बारै निकलै कोनी। बिना किणी लाग-लपेट रै अठै लिखतां म्हनै संको कोनी कै आधुनिक कहाणी री सरुआत विजयदान देथा सूं नीं कर परा आपां नै नृसिंह राजपुरोहित सूं करणी चाइजै। क्यूं कै बिज्जी लोककथावां रा कारीगर है। फगत दो-च्यार कहाणियां लिखण सूं बिज्जी नै आपां गुलेरी तो मान सकां, पण राजस्थानी कहाणी रा प्रेमचंद तो नृसिंहजी राजपुरोहित ई गिणीजैला। आपां नै लोककथा अर कहाणी रो आंतरो अबै समझ ई लेवणो चाइजै। क्यूं कै आधुनिक राजस्थानी कहाणी री जे कोई परंपरा है तो उण में मोहन आलोक रै नांव बिहूणी परंपरा आधी-अधूरी मानीजैला। सो म्हारै मुजब श्री आलोक री कहाणियां रो ओ संकलन छपण सूं कहाणी रै इतिहास-लेखन अर आलोचना में भूल-सुधार करण में सुभीतो हुवैला।
मोहन आलोक री कहाणियां में बगत रै साथै-साथै बदळतै हालात रा केई-केई दीठाव मिलै। बां रै कथा-संसार में निम्न मध्यम वरग रै आम आदमी रो दुख-दरद, बीं रो संत्रास, बीं री चिंतावां तो जाणै थोक में आई है। इण संग्रै री केई कहाणियां तो इण बात री ई साख भरै कै मिनख अर समाज नै दिसा देवण रो जिको काम प्रेमचंद साहित्यकारां नै सूंप्यो बो घणी चतराई सूं मोहन आलोक री कलम सूं हुयो है।
राजस्थानी कहाणी नै आधुनिक करण वाळा लेखकां में मोहन आलोक हरावळ रैया। कहाणी रै इतिहास में कहाणी रै आधुनिक हुवण रो बगत 1970-1975 रै लगैटगै रो मानीजै। इणी आठवैं दसक में श्री आलोक री केई कहाणियां- जियां ‘बुद्धिजीवी’(1974), ‘अलसेसन’(1974), ‘रामूं काको’(1975), ‘एक नूवीं लोककथा’(1973), ‘उडीक’(1973) अर ‘कुंभीपाक’(1973) आद नामी पत्रिकावां- हरावळ, मरुवाणी, हेलो अर जागतीजोत में छपी, पण आं कहाणियां रो जिकर हाल तांई ढंगसर कै बेढंग सूं ई कठैई हुयो ई कोनी।
‘उडीक’ कहाणी ‘हरावळ’ में इण संपादकीय टीप साथै छपी ही-
“किणी साथी री बेपरवाई एक हद तांई पूग’र आदमी में ऊब पैदा करै अर बो खुद नै हळको अर बेइज्जत मैसूस करण लागै। घणी ताळ तांई उड़ीकण रै बाद भी जद सामलै री तरफ सूं कोई जबाब नीं आवै तो बीं री मनगत रै हाथ सूं धीजै री डोर छूट जावै। युवा कथाकार मोहन आलोक तणाव भरी ‘उडीक’ री मनगत नै इण कहाणी में बखूबी सांवटी है।”
(हरावळ : दीवाळी विशेषांक, बरस-1973 पेज-5)
कहाणी ‘उडीक’ किणी री उडीक सूं उपजी मनगत री साव आधुनिक कहाणी है। कहाणी जिसी परंपराऊ कहाणी इण मांय नीं है। उडीक री बा मनगत ई कहाणीकार कहाणी रै रूप मांय प्रगटी जिकी एक लखाव मांय उपजतै तनाव नै तो उजागर करै ई है अर साथै जाणै प्रतीकां री मोमाख्यां ई कथाकार नै घेर लेवै कै उण रो वां सूं लारो छुड़ावणो ओखो हुय जावै। ‘हरावळ’ पत्रिका रै उण युवा कथाकार री उमर आज उण बगत री उमर सूं दूणी हुयगी, पण मजै री बात कै हाल तांई उण रै कहाणीकार रूप री सावळ ओळखण ई कोनी हुई अर कदास ओ ई कारण रैयो हुवैला कै आलोकजी कहाणी कानीं सूं हाथ ई खींच’र बैठग्या। राजस्थानी भाषा, साहित्य एव संस्कृति अकादमी, बीकानेर री मासिक पत्रिका ‘जागती जोत’ रै संपादन रो काम जद म्हैं संभाळियो तद घणी अरज कर’र आलोकजी सूं कहाणी लिखवाई ही, बा कहाणी- ‘रिकसै वाळो’ जागती जोत रै सितम्बर, 2002 रै अंक में छ्पी। ओ म्हारो सौभाग है कै कांई ठाह म्हारी अरजी रो सुफळ ?
इण कहाणी री संवेदना बाबत बात करां तो आ मैनत सूं टूट’र पंजाब कानी सूं बळद दांई नाथ काढियोड़ै एक पोसती मिनख री कहाणी है पण इण में कहाणीकार देस री विडरूपता माथै करारी चोट करै। व्यवस्था माथै चोट करणो उण रो दायित्व है बठै ई उण रै लेखन री सारथकता ई।
“आपणै इण महान देस री 55 साल री आजादी री उपलब्धि आ है कै आज ई मिनख मिनख माथै चढियो फिरै है। यूं संविधान मांय हरेक नागरिक नै समानता रो अधिकार है। जठै देस नै खेल-खेल मांय बेच देवण रो अधिकार है बठै ई किणी अस्पताळ विशेष में का’र खून बेचण वाळां री लैण मांय लाग जावण रो अधिकार है…………” (कहाणी ‘रिक्सै वाळो’ सूं)
डील सूं सफा ई बीत्योड़ै इण अमली रिक्सै वाळै साथै जिको कै लेखक नै रात री टैम अणसरतै मांय करणो पड़ै। लेखक नै घणी सहानुभूति उपजै। वो थोड़ै सै बगत मांय ठौड़-ठौड़ उण माथै दया दरसावै पण इण पळपळाट करती दुनिया माथै रिक्सै वाळै री खीज अर विरोध री पराकाष्ठा आपां नै जणा देखण नै मिलै जणा लेखक नै वो आपरै सबदां मांय बता देवै कै नियति री इण क्रूरता अर मिनखां रै उपजायोड़ै इण अत्याचार नै तो लगोलग झेलण मांय ई भलाई है। यूं भीख मांय लियोड़ी छिनेक री सुविधा तो म्हारै तांई दुख रो कारण ई’ज हुवैला- वो एक फुळियै री चढाई चढतो कहाणीकार नै साफ मना कर देवै-
“नईं बाबूजी। उतरणा नईं…… ओखा सोखा चढा लऊंगा। पैसे लित्ते ऐ…… फेर अज्ज तां तुसी उत्तर जाओगे पर काल नूं कोई नईं उत्तरुगा तां बुरा लग्गूगा……… मैन्नूं तां ए चढाइयां रोज ई चढणियां………।”
(कहाणी ‘रिक्सै वाळो’ री छेहली ओळियां)
आपां अठै देखां कै कहाणी में आयोड़ै पंजाबी भासा रै पुट सूं संवेदना तर-तर सघन हुंवती जावै अर एक सरल-सी छोटी दिखण वाळी घटना ई कहाणी बण जावै।
संपादकां नै हक हुवै कै बै रचना रो संपादन करै। जागती जोत रै मई,1997 रै अंक मांय श्री आलोक री एक कहाणी ‘चाल’ नांव सूं छपी है। जद कै कहाणीकार उण रो सिरैनांव ‘छाळ’ (उछाळ) राख्यो हो, क्यूं कै आ कहाणी एक छाळ चूकियोड़ै ‘हिरण’ (?) री कहाणी है।
आज आपां नै मिडिया अर बाजारवाद रै पैटै चरूड़ हुंवती साजिस अर अपसंस्कृति नै पोखण-परोटण रा हाका चौड़ैघाड़ै सुणीजण लागग्या है, क्यूं कै ओ ‘जिन्न’ बोतल सूं बारै निकळ’र आजाद हुयग्यो है। पण ‘छाळ’ कहाणी इण काळी-पीळी आंधी रो सांगोपांग संकेत बरस 1997 मांय आज सूं एक जुग पैलां ई दे दियो हो। कहाणी री सरुआत एक पत्रकार सूं बंतळ रै मारफत करीजी है।
“आप गांव रो जनजीवण देखणो चावो तो सोख सूं देखो ! जनजीवण देखण मांय कोई अठै रोकटोक नीं है। थोड़ी ई’ज ताळ मांय गांव री पिणघट सरू हुवण वाळी है। गांवां रो हांसतो खेलतो जनजीवण पाणी भरण तांई निसरैलो। कैमरो आपरै कनै है। काची कुंवारी ‘कुपळां’ रा उभार। घाबां री घाट मांय बारै ढुळती बांरी जवानी। अवसता री हद श्रम व्यायाम सूं घुटियोड़ा बांरा पुष्ट नितम्ब। सब आपरै कैमरै मांय कैद कर लेया आंनै सजा देया आपरै सै’र री नुमायश मांय।” (‘छाळ’ कहाणी सूं)
आ कहाणी आपरै अंत तांई पूगती-पूगती एक छाळ चूकियोड़ै अवसर अथवा चूकतै अवसर री कथा बण जावै।
“कांई अब किसनू आपरो कमरो पाछो बणा सकैलो ? स्यात नईं, क्यूं कै एकर छ्ळ चूक जायां पछै तो सा’ब आप जाणो हो कै हिरण जेहड़ै तेज भाजण वाळै ज्यानवर नै ई कुत्तो पकड़ लेवै है।”
(‘छाळ’ कहाणी री छेहली ओळियां)
श्री आलोक री कहाणियां बाबत आपां कह सकां हां कै वां मांय लाम्बी चौड़ी कथावस्तु तो कोनी हुवै पण किणी कविता दांई एक भावभोम रो बै कहाणी मांय रचाव दर रचाव रचै। बां आपरी हरेक कहाणी मांय किणी कथा-प्रयोग सूं आपरै रचाव री जाणै न्यारी-न्यारी बानगियां ई आपां रै सामीं राखी है। आपां नै मानणो पड़ैला कै श्री आलोक री कहाणियां राजस्थानी नै फगत आधुनिक बणावण री जोरदार कोसिस तो है ई साथै ई साथै वां मांय आपां नै बरसां पैलां ई कहाणी रै उत्तर आधुनिक तत्वां रो दीठाव करवा दियो हो।
श्री आलोक री कहाणी ‘एक नूवीं लोककथा’ जागतीजोत रै जुलाई-अक्टूबर, 1973 में छपी। कहाणी रै खुलासै खातर आपां उण बगत नै चेतै करां- बरस 1969 में बैंकां रो राष्ट्रीयकरण हुयो अर श्रीमती इंदिरा गांधी ‘गरीबी हटावो’ रो नारो ई इणी बरस दियो। उण पछै बरस 1971 में राजावां खातर ‘प्रीवीपर्स’ बंद हुयग्या। आ पूरी कहाणी एक प्रयोग है जिकी आपरी बुणगट सूं केई-केई अटैक करै। लोककथा रै सामीं ऊभी हुवण वाळी इण नूवीं कहाणी रो नांव ई ‘एक नूवीं लोककथा’ है। आ कहाणी आपरै नांव मांय ई एक कथा लियां है। लोककथा अर कहाणी में मोटो आंतरो आपां इणी दौर में सावळ समझ सक्या। जद कै तेजसिंह जोधा रै संपादन में छपी पत्रिका ‘दीठ’ खातर खुद विजयदान देथा लोककथावां छोड़’र कहाणियां मांडी अर ओ राजस्थानी रो दुरभाग रैयो कै इण पछै बिज्जी सूं कोई दूजो संपादक कहाणियां कोनी लिखवा सक्यो।
‘एक नूवीं लोककथा’ रै लिखण-छ्पण रै दौर नै ई राजस्थानी में कहाणी रै आधुनिक कहाणी हुवण रो बगत मानीजै। रिसी वोटर रै तप सूं डोलतै इंद्रासन री आ कहाणी आपरै प्रतीक रूप मांय दिल्ली रै सिंहासन सूं जुड़ी थकी आपरी जूनी बुणगट नै परोटता थकां ई निज रै मांय आधुनिक तत्वां नै परोटै। नेठाव सूं देख्यां आपां जाण जावां कै अठै असल में कथाकार आपरै प्रयोग रै मारफत वरतमान नै परंपरा सूं जोड़ण रो लूंठो काम कर रैयो है। कहाणी री ओळी-ओळी में राजनैतिक, सामाजिक अर व्यवस्थागत व्यंग्य इण नै एक इसी व्यंग्य कथा बणा देवै कै बांचती बगत पाठक नै ओ ध्यान ई नईं रैवै कै वो मोहन आलोक नै बांचै है कै चावा-ठावा व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई नै बांचै है !
श्री आलोक री कहाणी ‘जागण’ ई एक इसी जीवती जागती कहाणी है जिण में ध्वनि प्रदूसण जैड़ी वैश्विक समस्या बां सांगोपांग ढंग सूं उठाई है। आपां रै इण महान धारमिक देस मांय जागण कीं बेसी ई है-
“दोय बजतां-बजतां तो पूरो सै’र नींद री यातना मांय जळ बिन मछली दांई तड़पण लागग्यो; तो उन्नै सेठ रै चमचां सेठ नै छोटै जागण मोटै जागण या कैवणो चाइजै महान जागण रो फायदो दिरावण री तेवड़ी। स्पीकरां रा वोल्यूम ओर ऊंचा कर दिन्धा। जिकै सूं सगळो सै’र ई जागण मांय सामल हू जावै अर चूंची बण्यो ई सो नईं सकै।“ (‘जागण कहाणी सूं)’
अठै विक्रम अर बेताल री कथा बुणगट नै स्वीकारणो किणी फैसलै नै लेय’र नीं परोटियो है पण इण समस्या माथै एक लूंठी चोट करण वास्तै कहाणी री जरूरत बण’र चुनौती रूप कहाणीकार सामीं आई हुवैला। घरम री बात नै घरम रै सिवाय पटकणी देवणी किणी दूजी बुणगट रै पाण सधणो संभव ई कोनी हो। क्यूं कै अठै जिण जागण सूं सेठ रै छोरै री उमर बधावणी ही वठै उण री मौत रो कारण ई इणी जागण सूं काढणो जरूरी हो सो आ अटकळ फगत राजा वीर विक्रमाजीत री बौद्धिकता टाळ किणी पासी संभव नीं ही। आ एक सिध साहित्यकार री जागरूकता है नींतर जद साहित्य समाज रो दरपण है तो दुनिया री इण सागीड़ी उकळती अबखाई रो दरसाव का इलाज किणी दूजै साहित्यकार रै हाथां अजेस क्यूं नीं आयो।
कहाणी ‘बुद्धिजीवी’ मांय लेखक आपरै ई’ज साहित्यकार-समाज री थोथ नै लेय’र सामीं आवै। कलम नै हथियार समझण वाळो ओ समाज आपरै संकल्पां अर विकल्पां सूं जूझतो कियां खुदोखुद परास्त हुय जावै इण रो खुलासो आ जातरा कथा आपरै निरवाळै अंदाज मांय करै। निज रै बुद्धिजीवी वरग री इण निबळाई नै एक तकलीफ रै रूप मांय लेखक जणा कहाणी मांय ढाळै तद इयां लागै कै वो एक पूरै वरग नै एक प्रतीक मांय बांध रैयो है। आ कहाणी ठंडै प्रगतिवाद अर मिनख रै खून में धुळती तटस्थता री बेजोड़ कहाणी है। इण में जबरदस्त व्यंग्य ओ है कै कहाणी रा पात्र तो जातरा माथै है, पण बां मिनखां का कैवां बुद्धिजीवियां में मिनख री अदीठ-थिरता टस सूं मस हुवण रो नाम ई कोनी लेवै।
‘बाप’ कहाणी आपरी कथा-बुणगट अर विसय वस्तु पेटै राजस्थानी कहाणी रै उठाव रा नूंवा आयाम थरपै। आ कहाणी ‘माणक’ रै दिसम्बर, 1989 में छ्पी। इण कहाणी नै डा जहूरखां मेहर बरस 1993 मांय राजस्थानी पाठ्यक्रम मांय संपादन करतां सामल कर’र चावी करी। प्रकासन रै च्यार बरसां पछै ई आ कहाणी डा मेहर नै चेतै रैयी तो इण रो जस वांरी पारखी दीठ नै ई देवणो हुवैला। इण कहाणी री भाव भोम अर बेबस मध्यम वरगीय कथानायक री पीड़ अर वीं री अकल्पनीय परणति सूं वां आपरी संवेदना सांझी करी हुवैला। कोई आलोचक जद संवेदनसील पारखी दीठ लियां किणी रचना नै बांचै तद फगत उण रै कथात्मक रूप-सरूप माथै ई दीठ कोनी राखै बल्कि उण विधा खास रै प्रयोगात्मक सरूप री संभावनावां नै दीठ आडी राख्या करै। डा मेहर जणा इण कहाणी रो चुनाव इण में नवीनतम संभावनावां नै ओळखतां थकां ई करियो हुवैला नीतर इण कथा रै कथानायक रै अंर्तद्वंद्व नै ओळखण री वां नै रींड कांई ही? सपाट अर सीधै कथानक वाळी अलेखूं आदर्शवादी रचनावां तो वां रै सामीं ही। जिकी पढेसरियां रै कंवळै मन-मगज मांय सरलता-सहजता सूं उतर सकै ही। म्हारै मुजब अठै कथा-बुणगट री रींड अर बाजारवादी हाकै री डरपाऊ संभावना कहाणीकार श्री आलोक अर संपादक श्री मेहर एकै साथै जाणै ओळख ली ही। अबै बाजारवाद अर भूमंडलीकरण रो लांपो लाग्यो है पण इण री धमक आपां आगूंच मोहन आलोक री बाप कहाणी रै मारफत बीस बरसां पैली ही सुण ली।
‘बाप’ दांई कहाणी ‘पैंट’ में ई निम्न मध्यम वरग री आर्थिक विडरूपता उजागर हुवै। अठै कवि श्री मोहन आलोक रो क्लर्क रो गीत (कविता) चेतै आयां बिनां कोनी रैवै-
“एक भूख चक्र सी जीयी
तिरस पीयी, जियां ई भूण ज्यूं
घरां सूं नीसरिया सदा कसूण
बड्या जणा रैया केसूण ब्यूं।”
पैंट कहाणी रो कथानायक क्लर्क तो जियां साचाणी ई घर सूं अपसुगना नै लियां ई निसरै। देरी सूं उठै, हडबड-दडबड मांय नहावै। बनियान नीं लाधै तो कणांई काछियो, पछै काच लाधै तो कांगसियो कोनी लाधै। बियां ई ऊंधा-सीधा टुकड़ा गिट’र साइकल उठावै तो पैंचर। पैंचर सुधां ई हवा भर’र भाजै तो आगै एक सिक्सै वाळै सूं एक्सीडेंट। सोचै किन्नै ई हो तो चालै किन्नै ई हो। कळझो हुयोड़ी साइकिल नै ठरडतो दफतर पूगै तो कोई सुवागत समिति रै अध्यक्ष दांई बड़ो बाबू सुवागत खातर तैयार लाधै। छेकड़ मांय जाणै धन री मार सूं दब्यै पूरै वरग री मानसिकता उजागर हुवै। देस मांय इण वरग री सोच अठै तांई पूगगी है कै चामड़ी फाट जावैली तो एक दिन ठीक हुय जावैला पण जे गाभा फाट जावै तो कठै सूं आवैला ? आर्थिक हालात इत्ता खराब है कै आपरै डील री चोट करता जेब री चोट भारी लखावै। तकलीफ री आ साव नूंवी व्याख्या है।
क्लर्क वरग री मनगत रो एक दीठाव उण री पैंट रै आसै पासै घूमतो सो आपां कहाणी ‘मरियोड़ी चिड़ी’ में ई देख सकां अठै फरक फगत इत्तो है कै इण मांय कथानायक री पैंट रो नूंवो हुवणो ई मानसिक कलेस रो कारण बण जावै। वो आपरी पैंट री स्यान राखण रा केई कळाप विचारतो कूड़ा नाटक ई करण ढूकै। कहाणी रो क्लर्क अठै जिको है, उण सूं नीं धाप’र निज रै स्तर री दीठ सूं- जिको नीं है उण तांई आफळतो निगै आवै। नूंवी पैंट रै साथै ई बो इण रै नीचै ढेड़ सौ रिपियां रै बूंटा री कल्पना, आपरी हैसियत परबारी करै। आज म्हारो भारतीय समाज एक सांस्कृतिक विलम्बन री हालत मांय जीवै। इण कहाणी रै नायक नै आपां इणी त्रिशंकु स्थिति रो सिकार कह सकां।
मिनख बात बात में आपरी बात सूं बणती खुद री छिब माथै खासो ध्यान देवै। उण खातर लगोलग आ जाणकारी जरूरी हुवै कै लोग उण बाबत कांई सोचै। बो आपरी सान बचावण खातर झूठ बोलै। तद कैवां कै आ बगत रै साथै मूल्यां रै बदळ जावण री आ एक कथा है। ओ बदळाव कित्तो भयानक है कै कहाणी ‘अलसेसन’ में भेड़ियै अर कुत्तै री मिलवां नसल रो अलसेसन कुत्तो एक प्रतीक रूप जद सामीं आवै तो बो धन अर लोभ रै सूत्र में बंधी जूण री पूरी कहाणी आपरै रचाव में खोल देवै। आ कहाणी दायजै री दाझ अर सामंतां रै जुग पछै ठाकरां री ठकराई रा सांतरा पोत चवड़ा करै। आपरै रचाव अर बुणगट रै पाण आ एक याददार कहाणी इण खातर मानीजैला कै इण में जिको तनाव भासा रै मारफत आपां सामीं गूंथीजै बो किणी गाळ का बंदूक री गोळी दांई सीधो काळजै पूगण री ताकत राखै।
मोहन आलोक रै कहाणीकार रो एक घणो महतावू पख आं कहाणियां री भासा है। आं कहाणियां में राजस्थानी घर, परिवार अर समाज रो जिको दीठाव आपां सामीं बोलै बो आपां रै जीवण मूल्यां अर संस्कारां नै पोखण वाळो है। अठै मिनख रै मिनख रूप नै बचावण रा लांठा जतन हुया है। कहाणीकार इण संग्रै री केई कहाणियां में आपरै बांचणियां सूं सीधो संवाद करतो बातपोस दांई हाजिर रैवै पण खासियत आ कै बो कहाणी में हुयां उपरांत ई कहाणी अर बीं रै पात्रां में किणी ढाळै रो मनमरजी रो दखल नीं बल्कि संकेतां रै पाण कहाणी आपरै संसार नै खोलती थकी खुद बोलण ढूकै।
प्रकृति रै कवियां में बिरकाळीजी रो नांव हरावळ गिणिजै। ठीक बिंयां ई कहाणी परंपरा में प्रकृति रै रूप नै ई कथा मांय ढळतो कहाणी ‘रामू काको’ में देख सकां। मेह री उम्मीद में मिनख बादळां नै आंख्यां फाड़-फाड़’र देख तो सकै पण बरसणो बीं रै सारै कठै ? आंधी रै लारै मेह अर मेह रै लारै आंधी री बात लोक में कथीजै पण मेह री आस मांय बैठा लोग कियां आंधी आवण सूं बावळा हुय जाया करै ओ खुलासो कहाणी ‘रामूं काको’ मांय हुवै।
मोहन आलोक री कहाणियां री भासा रै काव्यात्मक हुवण री बात माथै किणी नै कोई एतराज कोनी हुवैला क्यूं कै बै कवि है। कहाणी में किणी दीठाव नै आंख्यां सामीं सबदां सूं साकार कर साचाणी ऊभो करणो कला हुवै। इण कहाणियां में मुंडै बोलतै किणी चितराम दांई ठौड़-ठौड़ दीठाव ई दीठाव मिलै। दीठाव अर दीठाव, दीठावां सूं मनां में उपजण वाळा भावां सूं कहाणियां रचण में कहाणीकार नै सफलता मिली है। सटीक सध्योड़ी काव्यात्मक भासा रै मारफत कहाणी लिखणो घणो अबखो काम हुया करै पण इण कथाकार नै तो जाणै कोई वरदान मिलियोड़ो है कै बां री कहाणियां में बांचणियां इत्ता मगन हुय जावै कै कहाणी कणा पूरी हुय जावै ठाह ई नीं पड़ै। जद ठाह पड़ै तद बा मन में पूरी री पूरी किणी घटना दांई आंख्यां देख्यै साच भेळै रळ जावै। आ अनुभव जातरा आपां नै किणी जूनी कहाणी का लोककथावां दांई कीं सीख कोनी सीखावै पण काळजै नै आकळ-बाकळ जरूर कर देवै। कहाणीकार री खासियत आ है कै मिनखाजूण रै जिण साच नै बै कहाणियां में पोखै बो सांच आपां नै आगूंच ओळखता थकां ई आपरी बुणगट अर भासा रै कारणै साव अबोट लखावै।
छेकड़ श्री आलोक रै कहाणीकार रै बारै में बस इत्तो ई कैयो जाय सकै है कै ऐ नामी कवि री नामी कहाणियां बांच्यां पछै पुखता हुवै कै आप राजस्थानी नै बेजोड़ कहाणियां दी, अबै ई आप नै कहाणियां लिखणी चाइजै। बियां इण संग्रै पछै आप रै कहाणीकार रूप नै कोई कवि रूप सूं इक्कीस ई गिणैला। उम्मीद करूं कै इण कहाणी-संग्रै रो राजस्थानी जगत में स्वागत हुवैला।
नीरज दइया
सूरतगढ़ : 2 अक्टूबर, 2009




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