नीरज दइया की रा
जस्थानी कविताओं का मदन गोपाल लढ़ा द्वारा
हिंदी में किया गया अनुवाद रचनात्मक आस्वाद के कई अवसर उपलब्ध करवाता है। अनुवाद
दो भाषाओं के बीच एक खिड़की है - इसकी सर्वार्थ
सिद्धि इसके न रहने में है। जब अनुवाद, अनुवाद न लगे। मदन गोपाल
लढ़ा इस संकलन कि प्रस्तावना में पूरी तैयारी के साथ उपस्थित हैं। वे कविता और
जीवन के सापेक्ष रचनाकार,
उसकी रचना और रचनाधर्मिता के लगभग सभी पहलुओं की पड़ताल
करते हैं। प्रसंग और संदर्भ के अनुसार समकालीन राजस्थानी के मूर्धन्य रचनाकारों की
कही गई बातों का भी उल्लेख करते हैं। उनकी यह प्रस्तावना निसंदेह पाठकों के लिए
संकलन की रचनाओं से मिलने में काफी मददगार साबित होगी। बेशक उन्होंने मेरे जैसों
के कहने के लिए कुछ नहीं छोड़ा है। तथापि।
रक्त एक रसायन है और घुलना एक रासायनिक क्रिया। भाषा रक्त
में घुले, यह साहित्य की भाषा में ही संभव है। क्या भाषा अपना सबसे व्यापक और प्रभावी
स्वरूप साहित्य में ग्रहण करती है?
साहित्य की भाषा में रक्त और रक्त-संदर्भ प्रसंगानुकूल अनेक
स्वरूपों में प्रयुक्त किए गए हैं। किए जाते हैं। प्राय: वैयक्तिता, निजता
के आत्यंतिक, आत्मिक संदर्भों संबंधों में। यहां भी यह पद भाषा के साथ आत्मीय-आत्यांतिक, प्राणवंत
संबंध के संदर्भ में प्रयुक्त है - कि रचना/ रचनाकार का भाषा के साथ कैसा रिश्ता
है? भाषा रक्त में घुली हुई है। रक्त-वंश,
जाति,
स्वभाव,
स्वाभिमान सरीखे सामाजिक सांस्कृ तिक पहलुओं के परिचायक के
साथ ही जीवन-मृत्यु का भी कारण है। भाषा के साथ ऐसा ही प्रगाढ़ संबंध प्रकट करता
है यह कथन - रक्त में घुली हुई भाषा।
नीरज दइया की राजस्थानी कविता की बात हम कर सकते हैं।
अनुवाद- काव्य रूपांतरण और अनुवाद के उपरांत नीरज दइया की कविता की बात भी कर सकते
हैं। अनुवाद को लेकर इसकी कसौटी और उपादेयता आदि विवेचना के भिन्न प्रयोजनात्मक
पहलुओं पर बात की जा सकती है। भिन्न भाषाओं (भारतीय/ विदेशी) से राजस्थानी में
अनुवाद और राजस्थानी का दूसरी भाषाओं में अनुवाद विशेषकर हिंदी में। दोनों बातों
पर अलग-अलग मत हैं। बहरहाल। यह मसला हमें रचना के उस बुनियादी सवाल के नजदीक भी ले
जाता है कि एक लेखक दो या दो से अधिक भाषाओं में क्यों लिखता है? राजस्थान
या किसी भी क्षेत्रीय भाषा के हिंदी जानने और उसमें कविता लिखने वाले कवि को
राजस्थानी या किसी भी क्षेत्रीय भाषा में कविता लिखने की दरकार क्या है? वह कह
सकता है - यह भाषा उसके रक्त में घुली है। तो फिर इन कविताओं के हिंदी अनुवाद की
जरूरत क्या है?
कवि स्वयं भी तो इन कविताओं को हिंदी में लिख सकता था या
उनका अनुवाद कर सकता था। इन सवालों के जवाब लेखक के पास भी होंगे और अनुवादक के
पास भी। कुछ जवाब मेरे पास भी हैं। लेकिन मैं उन्हें यहां देना नहीं चाहता। बल्कि मैं चाहूंगा कि इस
संकलन की रचनाओं से गुजरने वाले पाठक के जेहन में उपरोक्त या इसी सिलसिले के
दूसरे कोई सवाल हों तो वे जगे रहें, बजते
रहें, वे खुद उनसे रू-ब-रू हों। जरूरी हों तो जवाब भी वे ही तलाशें। तब इन रचनाओं से
गुजरने का तजुर्बा अलग होगा।
अगर पढऩे के दौरान या पढऩे के बाद कोई सवाल याद नहीं रहता -
बिसर जाता है तो यह प्रस्तुत संकलन की बड़ी उपलब्धि होगी। लेखक, अनुवादक
और पाठक तीनों के लिए। मेरे साथ कुछ इसी तरह का अनुभव हुआ इन रचनाओं से गुजरते
हुए। लगा कई बार जवाब दे देने से - सवाल की कीमत बस उसके बराबर होकर रह जाती है।
क्या अनुवाद में वह रक्त प्रवाह बचा रह सका जो मूल रचना में कहा गया है। मुझे लगता
है इस संकलन की और मदन गोपाल लढा के काम की यही बड़ी चुनौती है - कसौटी है जिसमें
उन्हें बहुत ही रचनात्मक कोटि की सफलता मिली है। वे स्वयं हिंदी और राजस्थानी के
समर्थ रचनाकार हैं।
इस संकलन में हिंदी और राजस्थानी के बीच के भाषिक भेद को
इतनी कुशलता के साथ पाट दिया गया है कि यकायक लगता नहीं यह अनुवाद की पुस्तक है।
किसी भी हिंदी भाषी पाठक के लिए यह मूल हिंदी में रची गई रचनाओं जैसी है। नीरज
दइया की कविताओं को पढ़ते हुए हर बार लगता है - उनकी कविताओं में संवेदनाएं अभी भी
उतनी ही सद्य हैं - हरी हैं। कविताओं का चयन स्तरीय है। मुझे डर है मैं इन कविताओं
की विवेचना करने लगूंगा तो शायद आवृत्ति हो या पाठकों का कविता पढ़ते समय का घनीभूत
अमूर्त आस्वाद विरल न हो जाए। अस्तु।
- अम्बिकादत्त

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