बाल मनोविज्ञान के जादूगर / डॉ. नीरज दइया
बाल साहित्य को गंभीरता से अंगीकार कर विकसित करने का बड़ा कार्य करने वाले लेखकों में दीनदयाल शर्मा का नाम प्रथम पंक्ति में लिखा जाता है। दीनदयालजी ने बाल साहित्य की अलग अलग विधाओं में सतत रूप से हिंदी और राजस्थानी दोनों भाषाओं में रचनाएं दी हैं। लेखन के साथ संपादन का कार्य भी महत्त्वपूर्ण कहा जाएगा। लंकेश्वर, महाप्रयाग, दिनेश्वर, दीद आदि अनेक उपनामों से भी आपने निरंतर लेखन किया है। शर्मा के लेखक का मिलनसार अर स्नेहिल स्वभाव का होना अतिरिक्त विशेषता कही जा सकती है। आपका जन्म 15 जुलाई 1956 को हनुमानगढ़ जिले की नोहर तहसील के गांव जसाना में हुआ। राजस्थानी बाल साहित्य की पुस्तकों की बात करें तो अब तक आपकी चन्दर री चतराई (1992), टाबर टोळी (1994), शंखेसर रा सींग (1997),तूं कांईं बणसी (1999), म्हारा गुरुजी (1999), बात रा दाम (2003) और बाळपणै री बातां (2009) आदि पुस्तकें निरंतर सृजन की साक्षी है। पाक्षिक समाचार पत्र टाबर टोल़ी का संपादन का श्रेय भी आपको ही है। सुणो के स्याणो, घणी स्याणप, डुक पच्चीसी, गिदगिदी आदि पुस्तकों की राजस्थानी में हास्य व्यंग्य के खाते बहुत कीर्ति है।
राजस्थानी में बच्चों के लिखते लिखते दीनदायल शर्मा ने कुछ आधुनिक कविताएं भी लिख कर व्यस्क लेखक होने का प्रयास किया है। आपकी नई कविताओं का प्रथम संग्रह ‘रीत अर प्रीत’ राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी के सहयोग से प्रकाशित हुआ है। इन की कविताओं में हम कवि का व्यक्तिगत जीवन अनेक प्रसंगों से जुड़ी उनकी हृदयस्पर्शी अभिव्यक्ति देख सकते हैं। वर्ष 1975 से आरंभ हुई आपकी लेखन यात्रा से भरोसा होता है कि राजस्थानी बाल साहित्य और दीनदयाल शर्मा एक दूसरे के पर्याय हो चुके हैं।

केन्द्रीय साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली का बाल साहित्य पुरस्कार वर्ष 2012 का पुस्तक ‘बाळपणै री बातां’ के लिए अर्पित किया जाना पुरस्कार का सम्मान है। राजस्थानी संस्मरण लेखन के लिहाज से यह पुस्तक अब तक प्रकाशित पुस्तकों में अपना विशेष स्थान रखती है। युगबोध और विषयगत बदलाव के मानदंड से यह कृति महत्त्वपूर्ण है। इस पुरस्कृत पुस्तक में 47 आलेख हैं, जो अपनी सहज सरल भाषा और आत्मीय घटना प्रसंगों से जिस शिल्प में प्रस्तुत की गई है वह अनेक स्थलों पर बेहद मार्मिक है।
बाल साहित्य लेखन के लिए पहली शर्त है कि बाल मन रचनाकार का होना चाहिए। वैसा बाल मन दीनदयाल शर्मा के पास वर्षों से है। बचपना इतना है कि ‘बाळपणै री बातां’ की भूमिका में मन की बातें वे इतनी लंबी खींचते हैं कि भूमिका ही किसी बाल-पुस्तक जैसी है। परिवार के बच्चों के बीच एक लेखक का खेलना-कूदना ‘बाळपणै री बातां’ में सांगोपांग उजागर हुआ है। इनके घर-परिवार के प्रतीक में हम समय के साथ बदलते अनेक बदलाव संकेत रूप में देख-समझ सकते हैं। बाल नाटकों में दीनदयाल शर्मा बेहद सावधानी से रचना करते हैं कि कम कालावधि और अनुकूल साज-सज्जा से आधुनिक नाटक खेले जा सकते हैं। ‘म्हारा गुरुजी’ बाल नाटक अपने व्यंग्य के कारण, ‘बात रा दाम’ चतराई की बात और ‘तूं कांईं बणसी’ अपनी शिक्षा के कारण स्मरणीय है। हिन्दी में भी आपरी अनेक पुस्तकें प्रकाशित हुई है। जैसे- सारी खुदाई एक तरफ..., मैं उल्लू हूं (व्यंग्य) चिंटू-पिंटू की सूझ, पापा झूठ नहीं बोलते, चमत्कारी चूर्ण, बड़ों के बचपन की कहानियां, सूरज एक सितारा है, सपने, कर दो बस्ता हल्का, फैसला, फैसला बदल गया (बाल साहित्य) आदि।
देश और प्रांतीय अकादमियों से बाल साहित्य के अनेक पुरस्कारों से सम्मानित दीनदयाल जी को अनेक संस्थाओं ने भी सम्मानित किया है। आकाशवाणी और दूरदर्शन से अनेक प्रसारण हुए हैं। अंतरजाल देखें तो केई ब्लोग, फेसबुक और यू-ट्यूब के आंगन में अपनी पूरी ऊर्जा और लगन के साथ दीनदयाल शर्मा का बहुत व्यापक मित्र और समार्थक परिवार देखा जा सकता है। दुनियाभर के अनेक कामों के बीच अब भी वे बहुत आराम से बात करते हुए राजस्थानी बाल साहित्य की समृद्धि का सपना संजोए हैं। बाल साहित्य के विकास हेतु त्रैमासिक पत्रिका पारसमणि का प्रकाशन उनके इसी सपने का परिणाम है। टाबर टोल़ी पाक्षिक का नियमित प्रकाशन हो रहा है और अनेक संभावनाएं अभी भविष्य के गर्भ में है। देखें आने वाले समय में 60 वर्षीय युवा दीनदयाल शर्मा व्यस्क कवि के रूप में साहित्य में नजर आएंगे या फिर प्रेमचंद जी की उक्ति बुढ़ापा बहुधा बचपन का पुनरागमन हुआ करता है को सिद्ध करते हुए बच्चों के लिए सृजन करते रहेंगे। वैसे वे दोनों काम एक साथ करने में भी समर्थ है। उन्हें ढेर सारी शुभकामनाएं।
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