Tuesday, September 08, 2015

गद्य कवितावां

नीरज दइया, बीकानेर
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घोटणो

अबार-अबार सोची कै लारली सगळी बातां बिसरा’र पाछी नवी विगत बणावां। बिसरावणो हाथ री बात कोनी। मान्यो— बिसरावणो हाथ री बात कोनी, आ तो कर सकां कै घोटणो बंद करां। कांई हुसी घोटण सूं, घणो घोट लियो। चालो अबार सूं चालू करां... पाछी गिणती गिणनी... बण जावां टाबर।

इण दुनिया नै नवी विगत जोड़ां, अर करां पैल।   
    — आवो! पैल भचकै जिकी कोई बात हुय जावै, उण नै कैय देवां— पैली अबोट बात।
    दूजी बात— बिसरावणो हाथ री बात कोनी, पण आ तो कर सकां कै घोटणो बंद करां।
    स्सौ कीं भूल’र बण जावां- टाबर।
    चालू करां.... पाछी गिणती गिणनी.... का गिणां ऊंधी गिणती अर पूगां जीरो माथै।

भींत
दुनिया भींतां सूं भरीजगी।
अेक भींतां बै जिकी दीखै अर दूजी बै जिकी दीखै कोनी।
आपसरी मांय दोनां नै रळावां तो दुनिया संकड़ी पड़ जावै,
पग राखण नै जागा कोनी लाधै।
भींतां-भींतां-भींतां।
।।
भींतां जिकी दीखै बै तो ठीक, पण जिकी दीखै कोनी अर बारंबार आवै साम्हीं उणा रो कांई करां....?
जिकी भींतां दीखै बै फगत भींतां ई दीखै
अर जिकी भींतां कोनी दीखै उण रै आर-पार स्सौ कीं दीखै....
मतलब भींतां ई भींतां दीसै च्यारूमेर।
लागै भींतां ई भींतां सूं दुनिया भरीजगी।
दुनिया मांय मिनखां री जागा भींतां लेय ली।
म्हैं भींत, थूं भींत अर बो ई भींत।
भींतां-भींतां-भींतां।
।।
भींतां रो सुभाव हुवै थिर रैवणो। भींतां जिकी भीतां नीं हुय’र ई भींतां रो काम सारै, उण रो कांई करां? वै साथै-साथै चालै मिनखां रै। साम्हीं दीसती-दीसती घुस जावै मगज मांय।
देखो चेतो राख्या... अेक भींत मगज मांय घुसूं-घुसूं करै।
लो आयगी आ भींत अर देखो ओ भचीड़ो खाय रैयो हूं म्हैं...
भचीड़ो खायां पछै ई म्हैं लिख रैयो हूं...
लिखतो जाय रैयो हूं...
अबै आपरी बारी है
अर ओ भचीड़ो आपरै लागसी..।
।।
भचीड़ो लागै अर आपनै ठाह ई नीं पड़ै उण रो कांई करूं?

अेकलो कीं पण रूपाळो कोनी हुवै
अेकलो कीं पण रूपाळो कोनी हुवै। अ रै साथै ब अर स तो हुवै ई हुवै, साथै हुवै आखी वरणमाला अर बारखड़ी।
अेकलो कीं पण रूपाळो कोनी हुवै। फूल रै साथै कांटा अर डाळी तो हुवै ई हुवै, साथै हुवै वा आंख जिकी जोवै रंग अर आखो सचन्नण संसार आपां रो।
अेकलो कीं पण रूपाळो कोनी हुवै। चांद रै साथै हुवै आभो अर अलेखूं तारा, भळै साथै हुवै आखी दुनिया रो प्रेम अर आपां री नुंवी-जूनी ओळूं।
अेकलो कीं पण रूपाळो कोनी हुवै। मिनख रै साथै घर-संसार अर मांयला-बारला रंग-रूप तो हुवै ई हुवै, साथै हुवै बगत जिको राखै हिसाब अर काळजो जिको स्सौ कीं करै-करावै।
अेकलो कीं पण रूपाळो कोनी हुवै। कविता रै साथै ग्यान अर थावस तो हुवै ई हुवै, साथै हुवै आखो रचाव अर बांचणियै मिनख री मनगत।

सार री बात
लखदाद आपनै कै रंग-रूप सूं नीं आप कविता नै ओळखणी चावो आतमा सूं। आपरी आतमा रो लगाव सबूत है कै आप मसीन कोनी, मिनख हो।

    मसीन कोनी रच सकै कविता।
    मसीन कोनी घड़ सकै मिनख।
  
    जाणै भासा, छंद-अलंकार मसीन।
    नीं जाणै रस सार मसीन।
   
सार री बात तो आ है कै कविता जोवणियो मिनख खुद कविता हुवै।
    कविता ई मिल सकै कविता सूं।
    कविता री ई हुवै चावना
    जोवै— कविता।

मुंडै पाटी

म्हारै दुख बाबत म्हैं कीं कैवूं कियां? म्हारा माइतां सुणो! देस री आजादी सारू राजस्थान रै मुंडै  पाटी बांधजी। म्हैं जायो जद सूं मुंडै पाटी बांध्योड़ी है। बरसां पछै ई थे म्हांरी गूंगी-जात नै ओळख नीं सूंपी। म्हैं लिखी जिकी बातां, थे बांची कोनी।
    म्हैं जिको कीं कैवूंला, बो सीधो-सीधो थे समझ नीं सकोला; क्यूं कै थे म्हारी भासा जाणो ई कोनी अर जाणो ई हो.... तो मानो कोनी, नीं मानण री थां आगूंच धार राखी है। थे नीं मार सको म्हारी भासा नै। भासा म्हंारै लोही मांय है, अर कद तांई थे पीवोला लोही?
    कवि का इण समाज रै अंस रूप म्हैं करूंला कीं तो जतन। कवि रूप म्हैं म्हारी सांस भेळै गूंथ लीनी म्हारी भासा, अेक सामाजिक इकाई रूप कैवूं आ अेक ओळी— ‘आंख मींच’र कित्ता दिन राखोला अंधारो।’
    भाईजी! फगत लोही नीं म्हारी सांस रै हरेक आंटै मांय भासा अमूझै है।
    माइतां री आण राखां, बियां मुंडै पाटी कोई मा रै पेट सूं कोनी लाया।

छाणस
कविता थांनै कोनी चाइजै, अर थंारै कैयां मुजब बंद हुय जावणी चाइजै कविता।
कारण कै कविता रो कोई काम कोनी।
कारण कै थांनै दीसै ई कोनी कविता रो कोई काम?
    कोनी चाइजै थांनै बादळ-बिरखा, कोनी काम री थंारै लू-आंधी अर कोनी कोई सरोकार सरदी-गरमी का जेठ-असाढ सूं... बायरो आवै-जावै का रैवै थम्योड़ो, कोई फरक कोनी पड़ै थांरै।
थे हो तो इणी दुनिया मांय पण न्यारी बणा राखी है—
दूजी दुनिया।

अचरज तो ओ है कै मिनख नै इण दुनिया मांय टैम-टैम माथै स्सौ कीं चाइजै, अर आ दूजी दुनिया जिकी सिरजी इणी पैली दुनिया सूं उण मांय थे इत्ता अेकलखोरडा कियां जीवो?
    अचरज तो ओ है— 
        माणस सूं सूग करणिया
            थे मिनख हो... ?
आप नै जे सूग आवै कविता सूं
    तो मान लो माणस कोनी आप
        — छाणस हो...!



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