साक्षात्कार

राजस्थानी का भविष्य सुनहरा है : कागद

वर्तमान राजस्थानी कविता में एक भरोसेमंद नाम है कवि श्री ओम पुरोहित कागद । पिछले वर्ष श्री कागद के राजस्थानी में दो कविता संग्रह बोधि प्रकाशन, जयपुर से पंचलड़ी और आंख भर चितराम प्रकाशित हुए । इन दिनों आपकी कालीबंगा शीर्षक से लिखी कविताएं चर्चा में है । आपका ब्लॉग है- www.omkagad.blogspot.com  इस पर कवि का पूरा परिचय और रचनाएं देखी जा सकती है । पिछ्ले दिनों किसी कार्य के सिलसिले में कागद जी सूरतगढ़ आए थे तब उनसे कुछ बातें हुई । उनकी बातों को प्रश्नोत्तरी रूप में यहां प्रस्तुत किया जा रहा है-  
यह चित्र एक संयोग है और मेरा सबसे पहला सवाल यही है कि क्या आप आरंभ से ही गांधीवादी विचार-धारा के रहे हैं यानी जो भी बुरा है उस से दूर रहते हैं ?
मैं गांधीवादी तो नहीं हूं वैसे मैं कोई वादी भी नहीं हूं लेकिन सम्मान सब का करता हूं । बुरे और बुराई से तो सबको दूर रहना चाहिए 
लोग इन इनों मुझे बुरा कह रहे हैं और आप मेरे करीब है इसका अर्थ ? 
मुझे तो आप में कोई बुराई नजर नहीं आती । अगर साफगोई तो लोग बुराई कहते है तो वो आप में है और यह बुराई तो होनी भी चाहिए ।
वर्तमान आपधापी और बाजारवाद के चलते आपको अपनी कलम और शब्दों पर कितना भरोसा है ?

बाजर हमेशा अति महत्वाकांक्षी व्यक्ति के विचार में होता है । सृजनात्मकता से जुड़े व्यक्ति को बाजार प्रभावित नहीं करता । हां यदि वह स्वयं बाजार का हिस्सा बनना चाहता है तो उसे कोई रोक भी नहीं सकता । मैं चाहे तमाम तरह के घाटे उठाता हूं परंतु मेरे शब्द और मेरी कलम हमेशा मेरे साथ रहती है मैंने इनको लेकर कभी सौदा नहीं किया तो बाजार मेरे निकट कहां आया ? शब्द और कलम की ताकत से तो आप भी परिचित हैं यह कभी समय और व्यक्ति सापेक्ष नहीं होता । शब्द को ब्रह्म और कलम को वाग्देवी किसी ने यूं ही नहीं कहा ।
मित्रों से सुना है कि आप भविष्यवाणियां भी करते है ? यदि हां तो कोई साहित्यिक भविषयवाणी कीजिए जैसे राजस्थानी भाषा और साहित्य का आगामी दौर ?
मैं कोई भविष्यवक्ता नहीं हूं । ज्योतिष में रूचि रखता हूं फिर भी इसमें पूरा विश्वास नहीं है । आपके सवाल के संदर्भ में मेरे अंतस की आवाज है कि राजस्थानी वर्तमान की न कहूं लेकिन भविष्य सुनहरा नजर आ रहा है ।
कवि के अलावा आपकी पहचान एक कहानीकार, निबंधकार अथवा आलोचक के रूप में क्यों नहीं बन सकी ? केवल कविता लिखने में ही अधिक विश्वास और रूचि क्यों है ?
ऐसा नहीं है कि मैंने केवल कविताएं ही लिखी है । मैंने कहानी, नाटक, एकांकी, निबंध आदि विधाओं में दोनों भाषाओं में निरंतर लिखा है और लिख रहा हूं । आपका सवाल वर्तमान आलोचना को खंगालने का इशारा लगता है । इस संदर्भ में मैं यही कहूंगा कि राजस्थानी आलोचना का पक्ष मजबूत नहीं है । कुछ लोग आलोचना करते है लेकिन उन आलोचनाओं में शब्द पराए और आदमी अपने होते हैं, अब अगर किसी ने जानबूझ कर किसी ने मुझे रेखांकित नहीं किया तो दूर बैठै आप तक मेरी सृजन-यात्रा कैसे पहुंचेगी । ऐसे वक्त में क्या बताऊं कि मैं क्या लिखता रहा हूं और क्या लिख रहा हूं । यह जानना है तो व्यक्तिशः आपको मुझ से संवाद करना होगा और यही हमारी राजस्थानी साहित्यिक आलोचना का कमजोर पक्ष है ।
आपकी अपनी राजस्थानी और हिंदी कविताओं में मूलभूत क्या अंतर महसूस होता है ?
भाषा चाहे कोई भी हो अंतस में संवेदना तो समान रूप से उभरती है । हां उतरने का अंदाज और माध्यम अलग हो सकते हैं । मुझे लगता है राजस्थानी भाषा में कुछ ऐसा कुछ है जो केवल राजस्थानी में ही मेरे लिए संभव है, और जब मैं हिंदी में लिखता हूं तब उस के लिए हिंदी ही ठीक लगती है । वैसे यह भाषा बंधन कविता और किसी रचना को बांधता नहीं है, कवि किसी भी भाषा में लिखे अंततः वह कुछ लिखना होता है और भाषा से महत्त्वपूर्ण संवेदना है जो पूर्णतः मुखरित होनी चाहिए । भाषा मेरे लिए बाधा नहीं है व्यष्ठि के बिम्ब स्वतः भाषा का चुनाव कर लेते है । यहां मैं खुद को भाषा के लिए मां और मिट्टी जैसे संबंध में बंधा पाता हूं । 
पिछ्ले साल आपकी दो किताबें राजस्थानी में कविता की एक साथ छपी, किंतु राजस्थानी में तो प्रकाशन संकट के चलते एक किताब छ्पना-छपाना भी मुसकिल है ?
आपकी बात शत प्रतिशत सही है । मैं इतर भाषाई साहित्य के प्रकाशन की तुलना में राजस्थानी साहित्य के प्रकाशन में अधिक संकट पाता हूं । यहां सवाल मांग का भी है । सरकारी स्तर पर व अनुदानित स्तर पर चलने वाली संस्थाएं राजस्थानी साहित्यिक पुस्तकें खरीदने से कतराती है और कतराना भी स्वभाविक है  क्यों कि शैक्षिक सदर्भों में राजस्थानी साहित्य का उपयोग नहीं के बराबर है । बिक्री के संकट को प्रत्यक्ष देखकर प्रकाशक भी छापने से कतराते हैं । मेरी दोनों पुस्तकें मेरे प्रकाशक मित्र ने बड़ा जोखिम उठाकर छापी है । 
पंचलडी के विषय में कहा जा रहा है कि गजल राजस्थानी के लिए अनुकूल विधा नहीं है और आप की रचनाएं गजल विधा के मानदंडों पर खरी नहीं उतरती ?
यह सही है । मैंने गजल लिखी ही नहीं है । यदि कोई पंचलड़ी को गजल कहता है तो वह जाने । मैंने तो पंचलड़ी के माध्यम से एक नया प्रयोग किया है जो गजल जैसा लगाता है । मैं आश्वस्त हूं कि मैंने अपनी बात इस प्रयोग के माध्यम से ठीक से कह दी है । मेरे ख्याल में प्रयोग करना कोई बुराई नहीं है । अकविता और अकहनी के प्रयोग भी आपको याद होंगे ।
क्या आप पंचलड़ी को अगजल कहना पसंद करेंगे ?
पंचलड़ी तो बस पंचलड़ी है कुछ और कैसे हो सकती है !
कविता में आप पहले कथात्मक विषय चुनते थे और आजकल अपकी कविता एक चित्र बनती जा रही है ? क्या यह अंतर आप के चित्रकार होने का नतीजा तो नहीं ?
कई अर्थों में यह हो भी सकता है लेकिन मुझे लगता है कि समय के साथ मेरी दृष्टि में विस्तार हुआ है और मैं अति सूक्ष्म सवेदनाओं को भी महसूस करने लगा हूं । कई बार तो मैं जड़ और चेतन में भी भेद नहीं कर पाता । शायद यह मेरी कविता-यात्रा का कोई पड़ाव है, जिसे मैं भी परिभाषित नहीं कर पा रहा हूं ।
आपको कुचरणी करते-करते कालीबंगा पर कविताएं लिखने की प्रेरणा कहां से और कैसे मिली ? व्यंग्य मेरे स्वभाव में है और कुचरणी मैंने स्वभाविक रूप में लिखी है । आप देखते ही है कि मेरी इतर कविताओं में भी व्यंग्य किसी न किसी रूप में मौजूद रहता है । मैं चाह कर भी अपने इस नैसर्गिक पक्ष को अलग नहीं कर सकता । जहां तक कालीबंगा की कविताओं का सवाल है तो यह भी मेरे आस-पास घूमती व्यक्त होने को तरसती सवेदनाओं की अभिव्यक्ति है । कालीबंगा की आरंभिक खुदाई से अब तक मेरा लगाव इस सभ्यता के अवशेषों से रहा है । इसके अवशेषों में मुझे कालीबंगा आज भी सजीव नजर आती है । कई बार मुझे लगता है कि मैं उस काल खंड के अंतिम दिन में यात्रा कर रहा हूं और मेरे सामने ही सब कुछ जमीदोज हुआ है ।
आपको समाज में राजस्थानी कवि के रूप में अधिक सम्मान मिला या हिंदी कवि के रूप में ?
राजस्थानी वाले राजस्थानी का नहीं हिंदी का मानते और हिंदी वाले हिंदी का नहीं राजस्थानी का मानते ।
राजस्थानी महिला लेखन के विषय में आपकी क्या राय है ?
महिला लेखन की बात करने से पहले हमें महिला की अन्य क्षेत्रों में महिलाओं की उपस्थिति का आकलन भी कर लेना चाहिए और फिर खुद से सवाल करना चाहिए कि महिला आज मानसिक रूप से कितनी स्वतंत्र है, तथा उस के अपने निर्णय कितने है ? ऐसी स्थिति में जो भी उत्तर आपके भीतर से आएंगे वही आपसे इस सवाल के उत्तर भी होंगे ।
क्या आप घर में अपनी पत्नी को एक कवयित्री के रूप में देखते हैं और स्वयं को श्रोता के रूप में पाते है या खुद ही कवि बने रहते हैं ?
वह अपना लिख कर आनंदित होती हैं और मैं अपना लिखकर । दोनों के संवाद में यह आनंद दुगना हो जाता है । मुझे समय अधिक मिलता है मैं अधिक लिख लेता हूं और वह बंधंनों में कुछ ज्यादा ही बंधी है इसलिए कम लिख पाती है । 
राजस्थान में नए लेखक कवि ही नहीं पुराने और वरिष्ट लेखकों की स्थिति भारतीय साहित्य में आपको कैसी लगती है ? क्या हमारा साहित्य समकालीनता की दौड़ में कहीं पीछे तो नहीं है ?
मुझे लगता ही नहीं बल्कि यह सर्वकालिक सत्य है कि राजस्थानी साहित्य अन्य भाषाओं से विपुल और वैभवशाली है । अगर आप आधुनिक और वर्तमान साहित्य की बात कर रहें हैं तो आपको बता दूं कि राजस्थानी साहित्य किसी से कम नहीं है । इधर जो लिखा जा रहा है उसका चाहे ठीक से मूल्यांनक हो रहा हो किंतु यह श्रेष्ठा में अन्य के लिए ईर्ष्या का कारण बनने में सक्षम है ।
कविता संग्रह या किसी रचना विशेष पर सम्मान या पुरस्कार पा कर आप कैसा महसूस करते है ? 
पुरस्कार हमेशा सृजन को मिलता है और सृजन व्यष्टि की संवेदनाओं का पुंज होता है । ऐसे में रचनाकार को कुछ भी महसूस करने की दरकार कहां है ? कोई भी लेखक पुरस्कार से बड़ा नहीं बनता । मैंने कभी पुरस्कार को ध्यान में रख कर नहीं लिखा और पुरस्कार से एक बार सम्मान मिलना अच्छा तो लगता है किंतु पुरस्कार और सम्मान से लेखक की अपनी अनेक जबाबदेही भी बढ़ती है ।  कविता-पाठ देखें- http://www.youtube.com/watch?v=Bz_N16JttCQ

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डॉ. नीरज दइया की प्रकाशित पुस्तकें :

हिंदी में- कविता संग्रह : उचटी हुई नींद
व्यंग्य संग्रह : पंच काका के जेबी बच्चे, टांय-टांय फिस्स
आलोचना पुस्तकें : बुलाकी शर्मा के सृजन-सरोकार, मधु आचार्य ‘आशावादी’ के सृजन-सरोकार, कागद की कविताई
संपादित पुस्तकें : आधुनिक लघुकथाएं, राजस्थानी कहानी का वर्तमान, 101 राजस्थानी कहानियां, रेत में नहाया है मन (राजस्थानी के 51 कवियों की चयनित कविताओं का अनुवाद)
अनूदित पुस्तकें : मोहन आलोक का कविता संग्रह और मधु आचार्य ‘आशावादी’ का उपन्यास
शोध-ग्रंथ : निर्मल वर्मा के कथा साहित्य में आधुनिकता बोध
राजस्थानी में- कविता संग्रह : साख, देसूंटो, पाछो कुण आसी
आलोचना पुस्तकें : आलोचना रै आंगणै, बिना हासलपाई
लघुकथा संग्रह : भोर सूं आथण तांई
बालकथा संग्रह : जादू रो पेन
संपादित पुस्तकें : मंडाण (51 युवा कवियों की कविताएं), मोहन आलोक री कहाणियां, कन्हैयालाल भाटी री कहाणियां, देवकिशन राजपुरोहित री टाळवीं कहाणियां
अनूदित पुस्तकें : निर्मल वर्मा और ओम गोस्वामी के कहानी संग्रह ; भोलाभाई पटेल का यात्रा-वृतांत ; अमृता प्रीतम का कविता संग्रह ; नंदकिशोर आचार्य, सुधीर सक्सेना और संजीव कुमार की चयनित कविताओं का संचयन-अनुवाद और ‘सबद नाद’ (भारतीय भाषाओं की कविताओं का संग्रह)
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स्मृति में यह संचयन "नेगचार"

स्मृति में यह संचयन "नेगचार"
श्री सांवर दइया; 10 अक्टूबर,1948 - 30 जुलाई,1992

डॉ. नीरज दइया (1968)
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आंगळी-सीध

आलोचना रै आंगणै