Saturday, June 01, 2019

‘रेत में नहाया है मन’ (राजस्थानी कविताओं का हिंदी-अनुवाद)

आज की राजस्थानी कविता अपने समय की कविता है। जब हम माटी की गंध और उसके संघर्ष की बात करते हैं, विशेषकर स्वतंत्रता के बाद, तो देखते हैं कि राजस्थानी भाषा के कवियों ने बदलते समय और समाज को उसके यथार्थ के साथ अपनी कविता में अभिव्यक्त किया है।
                इस काव्य-यात्रा में वरिष्ठ कवियों नारायणसिंह भाटी, सत्यप्रकाश जोशी, हरीश भादानी से लेकर अर्जुनदेव चारण, आईदानसिंह भाटी, अंबिका दत्त व ठेठ युवा कवि ओम नागर, मदन गोपाल लढ़ा, राजूराम बिजारणिया तक की पीढ़ियां एक साथ सतत रचनाशील है। रेत की किरकिर, सूखते खेत, जीवन के लिए जूझते लोगों के अतिरिक्त एक ऐसी सौंधी गंध जो सिर्फ यहीं की धरती की उपज है, को इस कविता-यात्रा में साफ देखा जा सकता है।
जीवन के चौफेर संघर्ष को उकेरती ‘रेत में नहाया है मन’ की कविताएं मानवीय संवाद की कविताएं हैं। इनमें श्रम की बूंदें हैं तो रेत का उत्सव भी। आदमी की पीड़ है तो मुखौटे बदलता उसका चेहरा भी। आज के इस मुखौटे की आहट सत्यप्रकाश जोशी ने बहुत पहले सुन ली थी- “ला, मेरा मुखौटा दे थोड़ा बाहर जाता हूं।/ अंग्रेजी के कुछ शब्द डाल दे बटुवे में/ ... मुझे आदमी का भ्रम बना दे, मैं बाहर जाता हूं।” और शारदा कृष्ण की ये पंक्तियां- “क्या होगा उस दिन/ जब किसी आई-डी प्रूफ के बिना/ आदमी आदमी न गिना जाएगा।”
जीवन के हर पक्ष का संघर्ष है राजस्थानी कविता में। स्त्री, दलित, रेत, हेत व शोषण। रामस्वरूप किसान यथार्थ को कुछ इस तर देखते हैं- ‘‘पशुओं का गोबर-मूत्र/ बुहारता है आदमी/ क्योंकि/ उनके हाथ नहीं/ आदमी का मल-मूत्र/ उठाता है आदमी/ क्योंकि हाथ और दिमाग वाले/ पशु भी बहुत हैं यहां।’’ मुकुट मणिराज की कविता उस दलित का आत्मकथ्य है जो आहिस्ता से दृढ़ता के साथ शोषण के खिलाफ खड़ा हो रहा है। और स्त्री? मदन गोपाल लढ़ा के शब्दों में- “तुरपाई करती औरत/ जीवन के पक्ष में/ एक बड़ा सत्याग्रह है।”
‘रेत में नहाया है मन’ संग्रह की तमाम कविताएं जीवन के पक्ष में खड़ी कविताएं हैं। वे उस संघर्ष में शामिल है जो आदमी को आदमी बनाए रखने के लिए लड़ा जा रहा है। कविता संघर्ष में भागीदार ही नहीं  चेताती भी है- ‘‘चेतो/ चेतो कि तुम्हारी छाती पर कुंडली मार नथुनों के पास/ फन साधे/ बैठा है पीवणा सांप/ पी रहा- भाषा, भरोसा और सांस।” (तेजसिंह जोधा)
राजस्थानी कविता की अपनी एक गंध है जो इस संग्रह में देखी जा सकती है। इसके कारण यह हिंदी ही नहीं अन्य भारतीय भाषाओं से भी अलग है।
सजग कवि, आलोचक व अनुवादक डॉ. नीरज दइया ने आधुनिक राजस्थानी के सभी महत्त्वपूर्ण कवियों की श्रेष्ठ कविताओं का चयन कर बेहतरीन अनुवाद किए हैं। निश्चत रूप से हिंदी में इसकी गूंज गहरे तक जाएगी।
- डॉ. सत्यनारायण

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डॉ. नीरज दइया की प्रकाशित पुस्तकें :

हिंदी में-

कविता संग्रह : उचटी हुई नींद (2013), रक्त में घुली हुई भाषा (चयन और भाषांतरण- डॉ. मदन गोपाल लढ़ा) 2020
साक्षात्कर : सृजन-संवाद (2020)
व्यंग्य संग्रह : पंच काका के जेबी बच्चे (2017), टांय-टांय फिस्स (2017)
आलोचना पुस्तकें : बुलाकी शर्मा के सृजन-सरोकार (2017), मधु आचार्य ‘आशावादी’ के सृजन-सरोकार (2017), कागद की कविताई (2018), राजस्थानी साहित्य का समकाल (2020)
संपादित पुस्तकें : आधुनिक लघुकथाएं, राजस्थानी कहानी का वर्तमान, 101 राजस्थानी कहानियां, नन्द जी से हथाई (साक्षात्कार)
अनूदित पुस्तकें : मोहन आलोक का कविता संग्रह ग-गीत और मधु आचार्य ‘आशावादी’ का उपन्यास, रेत में नहाया है मन (राजस्थानी के 51 कवियों की चयनित कविताओं का अनुवाद)
शोध-ग्रंथ : निर्मल वर्मा के कथा साहित्य में आधुनिकता बोध
अंग्रेजी में : Language Fused In Blood (Dr. Neeraj Daiya) Translated by Rajni Chhabra 2018

राजस्थानी में-

कविता संग्रह : साख (1997), देसूंटो (2000), पाछो कुण आसी (2015)
आलोचना पुस्तकें : आलोचना रै आंगणै(2011) , बिना हासलपाई (2014), आंगळी-सीध (2020)
लघुकथा संग्रह : भोर सूं आथण तांई (1989)
बालकथा संग्रह : जादू रो पेन (2012)
संपादित पुस्तकें : मंडाण (51 युवा कवियों की कविताएं), मोहन आलोक री कहाणियां, कन्हैयालाल भाटी री कहाणियां, देवकिशन राजपुरोहित री टाळवीं कहाणियां
अनूदित पुस्तकें : निर्मल वर्मा और ओम गोस्वामी के कहानी संग्रह ; भोलाभाई पटेल का यात्रा-वृतांत ; अमृता प्रीतम का कविता संग्रह ; नंदकिशोर आचार्य, सुधीर सक्सेना और संजीव कुमार की चयनित कविताओं का संचयन-अनुवाद और ‘सबद नाद’ (भारतीय भाषाओं की कविताओं का संग्रह)

नेगचार 48

नेगचार 48
संपादक - नीरज दइया

स्मृति में यह संचयन "नेगचार"

स्मृति में यह संचयन "नेगचार"
श्री सांवर दइया; 10 अक्टूबर,1948 - 30 जुलाई,1992

डॉ. नीरज दइया (1968)
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