Sunday, July 10, 2016

आत्मा के आलोक से आलोकित कविताएं

    “आलोचकों को/ खबर न लगे/ रचनाकार का नाम”
    कवि राजेन्द्र जोशी के नए कविता संग्रह ‘एक रात धूप में’ की ये पंक्तियां उनकी कविता- ‘कवि या कविता’ के अंतर्गत व्यक्त- रचना-मूल्यांकन एवं समकालीन आलोचना के अंतर्संबंधों पर असल में एक टिप्पणी है । ‘क्या रखा है कवि के नाम में’ किसी रचना का मूल्यांकन किसी नाम से नहीं वरन पाठ की अंतर्वस्तु में निहित संभावनाओं से होना चाहिए। राजेन्द्र जोशी की कविताओं में प्रवेश करते समय नाम पृथक कर दिया जाएगा, पर रचनाकार और रचना-यात्रा का भी अपना ऐतिहासिक महत्त्व होता है। अपने पहले कविता संग्रह ‘सब के साथ मिल जाएगा’ [2011] में राजेन्द्र जोशी जिस समग्रता के प्रति समर्पित दृष्टिकोण लिए उपस्थित होते हैं, वहीं वे अपने दूसरे कविता संग्रह ‘मौन से बतकही’ [2014] में अपनी एकनिष्ठता के बहुआयामी विविध वर्णी रंग-रूप समाहित करते हुए बाहरी व भीतरी मौन में बतियाते हैं। उनका मौन में बतियाना या कहें मौन से बतियाना ही, उनके कवि को एक नवीन वितान- ‘एक रात धूप में’ तक पहुंचता है। ऐसे में किसी कविता अथवा संग्रह में कवि-दृष्टि के विकसित होने का आकलन बिना नाम के संभव नहीं। राजेन्द्र जोशी का नाम विविधता पूर्ण अनेक कार्य-व्यवहार में संलग्न है, ऐसे में मेरी आकांक्षा केवल उन्हें कवि रूप में देखने की है।
    ‘एक रात धूप में’ नाम में जिस विरोधाभास का आभास है उस में दृष्टि विकास की आवश्यकता है। संकुचित भाव से देखा जाए तो रात और धूप दोनों परस्पर विपरीत स्थितियां है। कविता विपरीत ध्रुवों को आमने-सामने अथवा साथ-साथ रख कर देखने-परखने का काम करती रही है। हम बहुत पुरानी उक्ति का सहारा लेकर इस दृष्टि-विकास का आकलन करें- जहां न पहुंचे रवि, वहां पहुंचे कवि। यह कवि जोशी के सृजक-मन का उस बिंदु तक पहुंचना है, जहां रात और धूप को साथ-साथ धरा-धाम से देखने-परखने का आयाम वह प्राप्त करता है। कविता संग्रह का नाम खुद अपनी कहानी बताने में सक्षम है। “आलोचकों को/ खबर न लगे/ रचनाकार का नाम।” एवं कवि के शब्दों में- ‘क्या रखा है कवि के नाम में।’ नाम विस्मृत कर पाठ पर दृष्टि केंद्रित करें।
     ‘एक रात धूप में’ कविता-संग्रह में तीन खंड़ों में विन्यस्त कविताएं ‘बात, जो बात है’, ‘सूखी पत्तियां’ व ‘मेरे हिस्से का आकाश’ उपशीर्षकों में मिलती है। जाहिर है तीसरे खंड की कविता ‘एक रात धूप में’ से बात, जो बात है उसका आगाज़ होना चाहिए।
    ठहरना चाहती है/ एक रात/ धूप में।
    चांदनी रात/ के साये में/ पूनम के चांद/ के घर में।
    एक रात/ बिताना चाहती है/ धूप में।
    अंतिम पहर की/ धूप में/ रात के पहले/ पहर से भोर तक।
    चांद की चौखट को भी/ सांझा करना चाहती है/ एक रात/ धूप में। [पृ. 79]
    सरल-सहज भाषा में जिस विरोधाभास में समन्वय की अभिलाषा यहां अभिव्यक्त होती है वह प्रचलित मुहावरे में असंभव-सी प्रतीत होती है। इस असंभव की यात्रा में अगर  हम हमारी दृष्टि-विस्तार और विकास कर परंपरागत विचार-वैभव त्याग कर इतर सोचेंगे तो पाठ में निहित आकांक्षा को देख-परख सकेंगे। यहां कवि हमें रवि की हदों से दूर उस बिंदु तक पहंचने का संकेत देता है- जहां ‘एक रात धूप में’ का वितान हमारी प्रतीक्षा कर रहा है। जनसत्ता के संपादक मुकेश भारद्वाज ने इस पुस्तक के फ्लैप पर लिखा है- ‘‘कई बार नितांत अभिधात्मक दिखने वाली ये कविताएं असल में सादगी के शिल्प की कविताएं हैं और यही इनकी सबसे बड़ी खूबी है।’’
    संग्रह की कविताओं में प्रेम के विविध रूप हैं, तो व्यंग्य की तीखी धारा भी। यहां प्रश्नाकुलता, द्वंद्व, अंतर्विरोध, स्वप्न और यर्थाथ का अद्वितीय लोक है। सर्वाधिक उल्लेखनीय अगर कुछ है तो वह राजेन्द्र जोशी की काव्य-भाषा एवं शिल्प है। अपनी काव्य-यात्रा के इस तीसरे पड़ाव में कविता की भाषा जैसे करवट ले रही है। इन कविताओं में प्रचलित एवं बंधे-बंधाए रूढ़ आग्रहों-रूपों से इतर भाषा को एक ऐसे शिल्प में पिरोया गया जहां पाठ में हम बार-बार ठहर-ठहर जाते हैं। यदि कवि का नाम साथ रहता है, तो हमारे संबंध, रूढ़ अर्थों में हमारी अभिलाषाएं-आकांक्षाएं और कविता को बंधी-बंधाई लीक में देखे जाने का दृष्टिकोण भी हमारे साथ रहेगा। यह अतोश्योक्ति नहीं कि इस नवीन सृजन-लोक में आत्मा के आंतरिक आलोक से आलोकित ऐसी कविताएं है, जिन्हें बिना कवि के नाम से पढ़ा जाना चाहिए।
    ‘बात, जो बात है’ खंड की कविताओं में इसी शीर्षक से कविता है, जो पुस्तक के अंतिम आवरण पर भी मुद्रित है।
    बात की स्मृति/ जिंदा होती है/ बात गुजरती नहीं/ तकदीर बदल देती है-/ बात।
    सदा के लिए/ सदारत करती है/ बहाना नहीं बनाती/ काम की होती है-/ हर एक बात की कीमत/ कीमती होती है हर बात।
    बीती नहीं/ बो बात है/ घात नहीं करती/ तभी तो सच्ची बात है-/ बात, जो बात है।                                                            [पृ.17]
    अपने पूर्ववर्ती संग्रहों से अलग यहां कविता में अभिधा के साथ-साथ व्यंजना तो है पर कविता में बात को कह कर भी बहुत-सी बात को पाठक पर छोड़ देने का कौशल भी है। अपने पाठकों पर यह भरोसा ही इन कविताओं और कवि को इस मुकाम पर पहुंचता है। इन कविताओं से पहले भूमिका के रूप में कवयित्री डॉ. वत्सला पाण्डेय ने लिखते हुए इसका संकेत भी किया है- ‘‘कहना अतिशोयक्ति न होगा कि राजेन्द्र जोशी ने एक रचनाकार के रूप में कुछ देर से ही सही अपने लिए राह निर्मित करनी सीख ली है।’’ एक कविता ‘आधी शताब्दी’ की पंक्तियां यहां इसी संदर्भ में उल्लेखनीय है- ‘अब भरोसा है/ जूझती जिंदगी पर/ दोस्ती हो गई/ पेचीदा रास्तों से/ बची हुई तू सुन !/ आधी शताब्दी !!’
    प्रथम खंड में जिन कविताओं को उल्लेखनीय कहा जाएगा, उन में एक है- ‘शब्द- 3' जिसमें कवि शब्द के अजेय-अमर होने के उद्घोष के साथ ही, शब्द की अपरिमितता और सर्वव्यापकता प्रस्तुत करते हुए उपलब्धियों में अव्यक्त को शामिल कर व्यंजित करता है। अनेकानेक जीवन सत्यों को इस खंड में अपनी सधी हुई काव्य-भाषा के साथ कवि ने प्रस्तुत किया है। एक उदाहरण कविता ‘बूढ़ा जो हो गया’ से, जिसमें बहुत कम शब्दों में कवि ने बहुत गहरी बात कही है। हमें ‘बात, जो बात है’ उसे देखने का ज्ञात यर्थाथ भाषा में  नए शब्द-क्रम से यहां नया-सा लगने लगता है- ‘बूढ़ा जो हो/ गया वह/ जिंदा रहकर भी/ जिंदा नहीं जो !’
    ‘सूखी पत्तियां’ खंड की कविताओं में जीवन-मृत्यु के क्रम में जहां जीवन का प्यार के साथ स्वागत और स्वीकार का भाव है, वहीं मृत्यु को भी जीवन के अभिन्न अंग के रूप में स्वीकारते हुए कवि ने लिखा है- ‘उडीक रहती है-/ मुझको/ पतझड़ की।’ यहां जीवन की सम्पूर्णता और समग्रता में फिर फिर हरे हो जाने का विश्वास भी अभिव्यक्त हुआ है। राजेन्द्र जोशी की काव्य-भाषा में ‘उडीक’ जैसे शब्दों से आंचलिकता की महक है, वहीं हिंदी के अनुशासन का निर्वाह एक नई और मौलिक भाषा को गढ़ने का उपक्रम भी यहां है। जिसका उदाहरण इसी खंड की कविता- ‘पतझड़ से पहले’ की इन पंक्तियां में देखें-
    कितने ही बूढ़े हों/ नहीं बदलते/ वे अपना रंग।
    वे हरे रहते हैं/ पतझड़ से पहले तक।
    लगते हो भले फल/ किसी भी रंग के/ और न लगे/ तब भी/ वे हरे ही रहते हैं।
    दरख्तों पर/ वे नहीं बदलते/ अपना रंग ! [पृ.51]
    उत्तर आधुनिकता के इस दौर में भी यह प्रतीक्षा, धैर्य, आत्मीयता का भाव किसी भी जीवन के लिए अनुकरणीय है, वहीं अपनी भाषा को बूढ़ी होने से बचाने के उपक्रम में हरी बनाए रखने की वह एक यात्रा भी है।
    ‘मेरे हिस्से का आकाश’ खंड की कविताएं कुछ निजता में कवि के घर-परिवार, रिस्तों और विचारों के साथ मान्यताओं के काव्य-बिंब हैं। कहीं बेहद सीधे और सरलीकृत रूप में कुछ काव्यांश अभिधा में अपनी कहानियां कहते हैं तो कुछ स्थलों पर वे प्रतीकों के माध्यम से व्यष्टि से समष्टि की दिशा में अग्रसर होते हैं। यहां यह अनायस नहीं है कि अग्रज कवि हरीश भादानी की काव्य-पंक्ति 'राज बोलता सुराज बोलता' की अनुगूंज कविता ‘शहर नीलाम होने को है’ में ‘हर शख्स बोलता है’ के स्थाई अंतरे से प्रगट होती है, वहीं नंदकिशोर आचार्य के काव्य-शिल्प में भाषा के क्रम के कुछ साम्य भी धैयवान पाठक जान सकते हैं। यह अपनी काव्य-परंपरा में नई परंपरा का पोषण एवं विकास है।  
    अंत में बस इतना ही कि कवि राजेन्द्र जोशी जिस काव्यालोक में पहुंचे हैं वह सघन से सघनतर हो। उनका कवि-रूप हिंदी कविता-प्रांगण में अपनी कविताओं व नाम के साथ पढ़े जाने वाले कवियों में शामिल हो, यही आकांक्षा व प्रार्थना है।
    राजेन्द्र जोशी की इन पंक्तियों को आप सभी को समर्पित करता हूं- ‘दिए की लौ/ चूल्हे की आग/ चिंगारी की आंच/ सूरज की तपिश/ और लाल होती आंखें।/ मौन रहकर/ कहती हैं-/ बहुत कुछ।’ [लाल होती आंखें, पृ. 56] इस बहुत कुछ कहे को सहेजने की आवश्यकता है, जिससे कविता की लौ दूर तक रोशन रहे। इन्हीं शब्दों के साथ कवि राजेन्द्र जोशी को बधाई और मुक्ति संस्था का आभार कि मुझे इस अवसर पर अपनी बात कहने का सम्मान दिया।
•    एक रात धूप में/ कविता संग्रह/ राजेन्द्र जोशी
प्रकाशक- सूर्य प्रकाशन मंदिर, बीकानेर/ संस्करण- 2016/ पृष्ठ- 96/ मूल्य- 200/-


•    नीरज दइया



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