Thursday, January 08, 2015

हिंदी मेरे संस्कारों की भाषा है : कवि राज हीरामन



बीकानेर । हिंदी मेरे संस्कारों की भाषा है तथा आज के युग में भाषा और संस्कृति को बचाना बेहद जरूरी हो गया है। यह मर्म की बात मुझे स्वामी कृष्णानंद ने 14 वर्ष की आयु में समझा दी और उसी के बल पर मॉरीशस और स्वामी कृष्णानंद का शिष्य नहीं वरन एक बेटा आप सब के सामने खड़ा हूँ। उक्त उद्गार मॉरीशस निवासी प्रख्यात लेखक कवि राज हीरामन ने अपने नागरिक अभिनंदन के पश्चात् बोलते हुए व्यक्त किए।
स्थानीय ढोला मारू टूरिस्ट बंगला में स्वामी कृष्णानंद फाउण्डेशन तथा मुक्ति संस्था के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित श्री राज हीरामल नागरिक अभिनंदन कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए नगर निगम के महापौर एडवोकेट नारायण चौपड़ा ने कहा कि स्वामी विवेकानन्द की श्रेणी के स्वामी कृष्णानंद ने जीवन पर्यंत मानव-जाति की सेवा का लक्ष्य लेकर अनेक यात्राएं की तथा परिवर्तन की क्रांति के अग्रदूत बने। राज हीरामल के लेखन तथा साहित्यिक सेवाओं पर अतिरिक्त जिला कलेक्टर नगर अजय कुमार पाराशर ने बोलते हुए कहा कि जैसे विवेकानन्द ने शिकागो में जो सनातन धर्म की पताका लहराई , वैसा ही कार्य स्वामी कृष्णानन्द ने मॉरीशस में किया और हीरामल साहित्य में कर रहे हैं।
मुक्ति के सचिव राजेन्द्र जोशी ने बीकानेर तथा मॉरीशस को जुड़वां करने की बात रखते हुए मॉरीशस में संस्कृति-साहित्यिक यात्रा पर जाने की बात कही। नागरिक अभिनंदन के समन्वयक व्यंग्यकार बुलाकी शर्मा ने व्यक्तित्व व कृतित्व पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए उनकी साहित्यिक सेवाओं को रेखांकित किया। नई दिल्ली से आए विशिष्टि अतिथि उद्योगपति कपिल धींगड़ा ने मानव जीवन और सेवा से संबंधित संस्मरण सुनते हुए स्वामी जी की शिक्षाओं को दैनिक व्यवहार में अपनाने की बात कही।
विशिष्ट अतिथि भंवर पृथ्वीराज ने कहा कि इन्सान जन्म से किसी धर्म को अपने साथ नहीं लाता । हम इन्सानियत के मर्म को समझते हुए स्वामी जी के उपदेशों का प्रचार-प्रसार कर जन-धन के कल्याण हेतु कार्य करें।
विशिष्ट अतिथि पत्रकार-साहित्यकार मधु आचार्य आशावादी ने कहा कि साहित्य सेवा भी मानव सेवा ही है। वह समाज को नई दृष्टि देता है। मॉरीशस निवासी राज हीरामल बीकानेर और मॉरीशस के रिश्तों को मजबूत बनाने के कार्य करें।

कवि डॉ. नीरज दइया ने अभिनंदन पत्र का वाचन किया तथा हिंगलाज दान रतनू , गिरिराज सिंह बारहठ सहित अनेक विद्वानों -साहित्यकारों ने विचार प्रकट किए। आभार ज्ञापन कवि-संपादक भवानी शंकर व्यास विनोद ने किया तथा कार्यक्रम का संचालन आनंद वी. आचार्य ने किया।

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