Friday, October 10, 2014

मुक्ति संस्था द्वारा सांवर दइया जयंति का आयोजन





बीकानेर/ 10 अक्टूबर/ मुक्ति संस्था द्वार प्रख्यात साहित्यकार सांवर दइया की 66 वीं जयंती स्मृति-सभा के रूप में स्थानीय नत्थूसर बास स्थित ब्रह्म बगेचा परिसर में आयोजित की गई। कार्यक्रम में अध्यक्ष के रूप में प्रख्यात कहानीकार और संपादक भंवर लाल ‘भ्रमर’ ने कहा कि राजस्थानी का आधुनिक साहित्य और मेरे मित्र स्वर्गीय सांवर दइया दोनों इस रूप में अभिन्न है कि बिना उनके अवदान की कोई भी चर्चा अधूरी कही जाएगी। विविध विधाओं में दइया का योगदान अविस्मरणीय है। उन्होंने कहा कि सांवर दइया की पहचान एक कवि, कहानीकार, व्यंग्यकार, अनुवाद और संपादक के साथ-साथ भाषा के प्रबल पैरोकार के रूप में निर्विवादित रूप से उल्लेखनीय है। मुझे इस बात का गर्व है कि मैंने राजस्थानी को लेखक के रूप में एक कोहीनूर हीरे जैसा लेखक दिया। उन जैसे सरल, सहज और महान लेखक को डॉ. नीरज दइया जैसा पुत्र भगवान ने दिया जिससे उनका अप्रकाशित साहित्य प्रकाश में आया किंतु मूलचंद प्राणेश जैसे अनेक लेखक ऐसे भी हैं जिनके जाते ही उनका साहित्य धीरे-धीरे लुप्त सा हो गया।
कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि व्यंग्यकार कहानीकार बुलाकी शर्मा ने कहा कि आज की स्मृति सभा कार्यक्रम की सार्थकता इस रूप में होगी कि हम भी सांवर दइया के बारे में एक एक संस्मरण लिखें और वह प्रकाशित हो। शर्मा ने दइया के कहानी लेखन के साथ उनके द्वारा किए संपादन को रेखांकित करते हुए कहा कि राजस्थानी की अब तक की कहानी संपादन की यात्रा में रावत सारस्वत और सांवर दइया की दृष्टि वर्षों तक उल्लेखनीय और प्रेरणास्पद मानी जाती रहेगी। मुक्ति के सचिव कवि एवं संस्कृतिकर्मी राजेंद्र जोशी ने कहा कि बाजारवाद के इस दौर में आज जहां स्वयं को स्थापित करने का संघर्ष हमारे मूल्यों को बदल रहा है वही कुछ लेखकों की रचनाओं की विशेषताएं किसी एक-दो रचना विशेष के संदर्भ में ही महत्त्वपूर्ण आंकी जाने से उनका समग्र मूल्यांनक नहीं हो पाता। जोशी ने आवश्यकता जताई की बीकानेर के इतिहास में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाने वाले कलाकारों का स्मरण और उनके कार्यों का प्रचार प्रसार निरंतर होना आवश्यक है जिससे कि युवा और नए लोग इस सब से जुड़ कर विरासत को संभाल सके।
कार्यक्रम में सांवर दइया को पिता और साहित्यकार के रूप में याद करते हुए उनके पुत्र कवि आलोचक डॉ. नीरज दइया ने अनेक प्रसंग साझा किए वहीं अपने पिता की राजस्थानी और हिंदी कविताओं का पाठ प्रस्तुत किया।  आगंतुकों का स्वागत करते हुए कहानीकार श्रीलाल जोशी ने कहा कि सांवर दइया को निराले और अनूठे साहित्यकार के रूप में याद करते हुए अपने संस्मरण साझा करते हुए कहा कि सांवर दइया की भाषा शैली और शिल्प से नए रचनाकारों को प्रेरणा ग्रहण करनी चाहिए। कवि कहानीकार कमल रंगा ने कहा कि सांवर दइया बहुआयामी रचनाकार थे और उनकी अंतरंगता के अनेक प्रसंगों में अपनापन और एक लेखक की जीवटता के साथ अपनी भाषा के रचनाकारों से जुड़ाव को रेखांकित किया।
युवा शायर मो. इरशाद ने उनको साहित्य का नक्षत्र बताते हुए कहा कि सांवर दइया सरीखे लेखक से हम खामोशी के साथ बिना किसी शोर-शराबे के साहित्य में बुनियादी और उम्दा लेखन का हुनर हासिल कर सकते हैं। कवि कहानीकार नवनीत पाण्डे कहा कि बीकानेर को अपनी परंपरा के अनुरूप पुरोधाओं का स्मरण करते रहना चाहिए जिससे कि नई पीढी का जुड़ाव बना रहे। कार्यक्रम में अनुवाद डॉ. सत्यनारायण स्वामी ने विगत दिनों का स्मरण करते हुए कहा उन्होंने कि वे मेरे लिए इस लिए भी यादगार लेखक है कि मुझे किसी साहित्यिक कार्यक्रम में बोलने का अवसर देने वाले वे थे। सांवर दइया के अभिन्न मित्र सत्यनारायाण शर्मा ने वर्ष 1977 में पूना के डेकन कॉलेज के दिनों के बारे में लिखे संस्मरण का पाठ किया जिसमें दइया की गुजराती भाषा के अध्येयता के रूप में गहरी रुचि देखी जा सकती है। कार्यक्रम में डॉ. नमामी शंकर आचार्य ने धन्यवाद दिया एवं वरिष्ट कवि सरल विशारद, प्रमोद कुमार शर्मा, हरीश बी. शर्मा, रमेश भोजक ‘समीर’, सुनील गज्जाणी, विष्णु शर्मा, कासिम बीकानेरी, महेंद्र जैन, बृजेंद्र गोस्वामी,  आदि उपस्थित थे।   




















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