Sunday, January 06, 2013

इण नै देखण नै वै कोनी.....


श्री कन्हैयालाल भाटी (४ जुलाई, १९४२ - १४ जनवरी २०१२)
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"......इचरज तौ इण बात रौ है कै सितर बरसां री उमर रै अड़ै-गड़ै आय लेखक कन्हैयालाल भाटी कहाणियां री पैली पोथी छपाई है जद कै वां री कहाणियां केई बरसां सूं न्यारी न्यारी पत्रिकावां में छपती रैयी है। ...... कहाणियां में कठैई जीवण रा राग-रंग है तो कठैई दुख रा दरसाव, कठैई दोगाचींती है तो कठैई आपै रा अंतर विरोध। केई दूजी-चीजां ई है जिंया उदासी, अवसाद अर अणबूझ सपन, मरजादा में पजियोड़ी नारी री अंतस-पीड़ा, चौफेर पसरियोड़ो सरणाटो, अबखायां सूं जूझता मिनखां रो हौसलो, एकलखोरी आदत रो सूगलवाड़ो अर मांयलै घमसाण नै बारै लावण री खेचळ। इण सगळै तांणै-बांणै नैं अंगेजता थका लेखक उण नै अरथावण सारू एक ओपती असरदार, रंजक अर रळकवीं भासा ई काम में ली है। एक इसी भासा जिकी अंतर दीठ री आफळ नै साकार रूप देय सकै।..."
शिक्षा विभाग राजस्थान री मासिक पत्रिका "शिविरा" रा पूर्व-संपादक अर ख्यातनांव कवि श्री भवानीशंकर व्यास "विनोद" आ बात राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी, बीकानेर री मासिक पत्रिका "जागती जोत" रै दिसम्बर, 2011 अंक मांय लिखी। ऐ ओळ्यां "कन्हैयालाल भाटी री कहाणियां" पोथी री परख लिखतां वां लिखी ही, परख नै बांच'र म्हैं मानजोग कन्हैयालाल भाटी नै सीरांथै बैठ'र सुणाई। वै कैंसर सूं जूझ रैया हा अर वां री हालत ठीक कोनी ही। "जागती जोत" रै इणी अंक में वां री छेहली कहाणी अटकळ छपी। वां रो माननो हो कै हरेक कहाणी बांचणियै रै काळजै उतरै जिसी लिखणी चाइजै अर कहाणी-पोथीपरख पेटै घणा राजी हा।
अठै ओ खुलासो करणो लाजमी है कै वां री तकलीफ अणमाप ही पण वै उपन्यास "अणसार" अर "जोगाजोग" रै अनुवाद नै लेय'र चिंता करै हा कै ओ काम किंया पार पड़सी। साहित्य अकादेमी कानी सूं गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर रै "जोगजोग" उपन्यास रै अनुवाद नै वै पूरो करियो ही हो अर आ ई बात गुजराती उपन्यासकार वर्षा अडाजला रै "अणसार" बाबत ही। अणसार एक मोटो उपन्यास हो अर उण री प्रेस कॉपी तैयार हुया पछै कन्हैयालालजी भाटी चावतां हा कै ओ उपन्यास राजस्थानी रा लूंठा अनुवाद श्री सत्यनारायण स्वामी नै समरपित करियो जावणो है। आं दोनूं कामां खातर कीं बगत री दरकार ही पण म्हे घर-परिवार रा सगळा मन ही मन में डरै हा कांई ठाह भाग मांय कांई लिख्योड़ो है। वै जीवण अर मरण रै बिचाळै हुयां उपरांत ई घणा ऊरमावान अर जोस सूं पूरमपूर हा। म्हैं वां री तकलीफ मांय इण जूण मांय खुद रो मरण जैड़ी पीड़ सैन करी है। वां री पाटी-पोळी रै बगत दोय बार वां रै कैयै मुजब वां रै पाखती रैय'र जाणियो कै वै बिरला मिनख हा जिण अणथाग दरद रै समंदर में तिरै हा, म्हैं म्हारै जीव रै ऊपरिया कर वा पीड़ परतख देखी अर वो देखणो ई खरोखरो कैवूं कै खुद रै मरण दांई हो। उण सगतीवान लेखक-अनुवादक नै निवण करूं कै अखूट ताकत रै पाण मौत सूं वां घणी जूझ मांडी।
श्री कन्हैयालालजी भाटी म्हारै पिता श्री सांवर दइया रा सगळा सूं गैरा भायला हा। पिताश्री जद संसार छोड़ग्या तद म्हनै घणी हिम्मत देवणियां मांय आदरजोग भाटीजी बाबोसा नै म्हैं म्हारै मन रै घणो नजीक आवतां देख्यो। माइत रै रूप मांय बरसां वां आपरो हाथ राख्यो। म्हनै नौकरी रै सिलसिलै में बारै रैवणो पड़ियो अर वां सूं मेळ-मुलाकात कमती हुयगी। बरस 2011 रै दिसम्बर महीनै रै एक दिन वां रो बुलायो आयो अर म्हैं वां रै घरै पूग्यो तो म्हारै पगां हेठली जमीन जाणै खिसकती लागी। म्हैं ओळमो ई दियो कै म्हनै बीमारी री खबर क्यूं कोनी करी तद वां घणी हिम्मत सूं कैय तो दियो बुढापो है हारी-बेमारी चालती ई रैवै पण उणी दिन जद म्हैं दोनूं घरै एकला बैठा तद वै रोवण लागग्या कै बेटा नीरज बीस दिन होयग्या रोटी कोनी खाई। म्हैं हिम्मत बंधाई कै सब ठीक हो जासी... म्हैं आयग्यो हूं नीं, पण कांई ठीक कोनी होयो। उण बगत पूरी विगत जाण'र भाटी बाबोसा नै म्हैं कैयो कै आं अनुवाद रै कामां सूं तो बेसी जरूरी आपरी कहाणियां री पोथी राजस्थानी में आवणी समझूं... हरख है वां री मंजूरी सूं वो काम बगतसर होयो। उण पोथी रै लोकार्पण री जबरी जुगत बैठी कै "मुक्ति" संस्थान रा भाई श्री राजेंद्र जोशी अर श्री बुलाकी शर्मा कन्हैयालाल भाटी रो सम्मान करण री सोचै हा अर म्हारी बात पछै 27 दिसम्बर, 2011 नै ओ काम होयो। महीनो मळ रो अर वां रो कैवणो नीरज अबार ठीक रैसी कांई? म्हैं कैयो मळ पछै "अणसार" अर "जोगाजोग"। वै "कन्हैयालाल भाटी री कहाणियां" पोथी नै देख'र जित्ती आसीस दी वां म्हारै अंतस मांय हाल जीवै। उण लोकार्पण अर सम्मान समारोह री जाणै वां रै जीवण मांय कसर बाकी ही कै मळ उतरण रै साथै ही 14 जनवरी 2012 नै साहित्य पेटै पूरी जूण अरपण करणिया लेखक अनुवादक श्री कन्हैयालाल भाटी रामसरण होयग्या। वां रो जलम 4 जुलाई 1942 नै होयो अर "शिविरा", "नया शिक्षक" मांय बरस 1967 सूं 1996 तांई सहायक संपादक रै रूप मांय उल्लेखजोग काम करियो अर बरस 2000 में सेवानिवृति पछै कैंसर री बीमारी सूं जूझता थकां भी सिरजणरत रैया। वां रै जीवण मांय हिंदी में केई पोथ्यां छपी अर मान सम्मान मिल्या। राजस्थानी पोथी कहाणियां री वै देख सक्या अर आज जद "अणसार" पोथी आपां साम्हीं आई है तो इण नै देखण नै वै कोनी। वां रै नीं रैयां म्हारी बडिया श्रीमती पुष्पादेवी भाटी अर तीन भाई योगेंद्र, प्रदीप अर संदीप भेळै दोय बैनां सुमन, अंजु नैं लखदाद कै बाबोसा श्री कन्हैयालाल भाटी रै काम नैं साम्हीं लावण रा जतन में सैयोग दियो। म्हैं पूरै राजस्थानी साहित्य-परिवार कानी सूं आं रो गुण मानूं। इण पोथी रै भाग में कोनी हो कै आ वां रै रैंवता राजस्थानी में छपै अर वै इण टाणै आपरी बात लिखै सो म्हैं वां कानी सूं "अणसार" री मूळ लेखिका बैन वर्षा अडाजला रो जस मानू कै वां इण री मंजूरी दी अर आप बांचणियां नै अरज करूं कै पोथी बाबत आपरी टीप जरूर लिखजो।
-डॉ. नीरज दइया


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