Tuesday, July 05, 2011

आलोचना रचना की पैरोकार

नगर संवाददाता & हनुमानगढ़  / 

विख्यात कवि व आलोचक डॉ. नीरज दइया का मानना है कि आलोचना रचना की पैरोकार है। लेखकों के मन में उठ रहे द्वंद्व को सही तरीके से आलोचक ही समझ पाता है और समीक्षा के माध्यम से उन्हें उन कमियों से रूबरू करवाता है जो लेखन के दौरान रह जाती है। डॉ. दइया की पुस्तक आलोचना रै आंगणैहाल में प्रकाशित हुई है। इसमें उन्होंने राजस्थानी साहित्य के पिछले साठ साल का विश्लेषण किया है। माध्यमिक शिक्षा बोर्ड राजस्थान के राजस्थानी पाठ्यक्रम विषय समिति के संयोजक दइया राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी से जुड़े रहे हैं। पेशे से अध्यापक नीरज दइया केंद्रीय विद्यालय संगठन में पीजीटी थिंक क्वेस्टसंदर्भ व्यक्ति हैं। एक दिन के प्रवास पर हनुमानगढ़ पहुंचे डॉ. दइया से भास्करने राजस्थानी साहित्य से जुड़े तमाम बिंदुओं पर विस्तार से चर्चा की। 


राजस्थानी साहित्य में आलोचना की दशा व दिशा क्या है? सवाल पर दइया कहते हैं राजस्थानी साहित्य का दायरा निरंतर सिकुड़ता जा रहा है। अकादमी का काम ठप है। इससे साहित्य सृजन भी अवरुद्ध हुआ है। जब साहित्य का सृजन ही नहीं होगा तो उसकी आलोचना कैसे होगी? राजस्थानी साहित्य अति प्राचीन है। करीब दो लाख प्राचीन पांडुलिपियों का प्रकाशन नहीं हो पाया। फिर भी स्थिति संतोषजनक है।राजस्थानी साहित्य के भविष्य पर उनका कहना था कि इसमें असीम संभावना है। बदलते परिवेश में जब हिंदी व अंग्रेजी का बोलबाला है तो इससे राजस्थानी सहित सभी क्षेत्रीय भाषाओं पर असर पड़ा है। ठेठ राजस्थानी शब्दों को क्षरण से जूझना पड़ रहा है लेकिन इसके लिए सामूहिक प्रयासों की जरूरत है। आम राजस्थानी अगर भाषा को लेकर गंभीर होगा तभी इसके गौरवशाली अतीत को बरकरार रखा जा सकता है। 


भाषा की लोकप्रियता में सरकारी प्रयास को बाधक तथा निजी स्तर पर प्रयासों पर चर्चा करते हुए दइया ने कहा कि अंग्रेजी व हिंदी के बढ़ते प्रभाव से राजस्थानी भाषा की उपेक्षा हुई है। भाषा को लेकर जन आकांक्षा जरूरी है। टीवी चैनलों पर कार्टून व कॉमिक्स आदि के प्रचलन से भाषा को चुनौती मिली है। फिर भी राजस्थानी भाषा को मान्यता मिलने पर स्थिति में बदलाव की उम्मीद है। राजस्थानी साहित्य की आलोचना में कोई बदलाव आया है? दइया बोले जी हां, आलोचना का तरीका बदल रहा है। कुछ आलोचक पुस्तक के प्रकाशन व आवरण देखकर समीक्षा करते हैं तो कोई परिचयात्मक समीक्षा को महत्व देते हैं। आलोचना के क्षेत्र में नवीन युग का सूत्रपात हुआ है अब आलोक रचना को आलोचना के नवीन मानदंडों से परखते हैं। 

आलोचना व आलोचक के बीच द्वंद्व संबंधी बात पर वे बोले हर पंक्ति का अलग अर्थ है। आलोचक लेखक के मंतव्य को जानने का प्रयास करता है। रचना में लेखकीय दबाव को खोजा जाता है। जिन विषयों तक लेखक जाने से रह जाता है, आलोचक वहां तक पैठ करता है। कुल मिलाकर कहा जाए तो आलोचक सेतु का काम करता है। वह रचना में तमाम संभावनाओं की तलाश करता है। 


आलोचना व बुराई में अंतर को लेकर पूछे सवाल पर दइया ने कहा कि आलोचना का मूल भाव है समालोचना। प्राय: रचना को विपक्ष की तरह देखता है। लेखक व आलोचक की अपनी सीमाएं हैं। सजग व ईमानदार आलोचना हो तो बेहतर परिणाम की उम्मीद करते हैं। कवि, आलोचक व लेखक होने के कारण किस विधा में सर्वाधिक वक्त देते हैं? दइया कहते हैं कविताओं के साथ लेखन की शुरुआत की थी। फिर अनुवाद की तरफ रुख किया। इसलिए सभी विधाओं के निकट रहकर न्याय करने की कोशिश कर रहा हूं।

हनुमानगढ़ भास्कर

  1 comment:

  1. बहुत ही सार्थक बातचीत है..राजस्थानी भाषा के लिए जन आकांक्षा की जरूरत है सब जानते हैं, मानते हैं पर यह कहते हुए दुख होता है कि राजस्थानी में सिर्फ़ आकांक्षाओं का ही बोलबाला है, जन की भागीदारी है ही नहीं और जब तक राजस्थानी के लिए जन की सक्रिय भागीदारी नहीं होगी..राजस्थानी का उन्नयन और विकास नहीं होगा

    ReplyDelete

लेबल

2011 2013 Dayanand Sharma INDIAN LITERATURE Neeraj Daiya अकादमी पुरस्कार अतिथि संपादक अनिरुद्ध उमट अनुवाद अनुवाद पुरस्कार अन्नाराम सुदामा अपरंच अब्दुल वहीद 'कमल' अरविन्द सिंह आशिया आईदान सिंह भाटी आकाशवाणी बीकानेर आत्मकथ्य आपणी भाषा आलेख आलोचना आलोचना रै आंगणै उचटी हुई नींद उचटी हुई नींद. नीरज दइया ऊंडै अंधारै कठैई ओम एक्सप्रेस ओम पुरोहित 'कागद' ओळूं री अंवेर कथारंग कन्हैयालाल भाटी कन्हैयालाल भाटी कहाणियां कविता कविता कोश योगदानकर्ता सम्मान 2011 कविता पोस्टर कविता महोत्सव कविता संग्रह कविता-पाठ कविताएं कहाणीकार कहानी काव्य-पाठ कुंदन माली खारा पानी गणतंत्रता दिवस गद्य कविता गवाड़ गोपाल राजगोपाल घोषणा चित्र चेखव की बंदूक छगनलाल व्यास जागती जोत जादू रो पेन डा. नीरज दइया डेली न्यूज डॉ. तैस्सितोरी जयंती डॉ. नीरज दइया तैस्सीतोरी अवार्ड 2015 थार-सप्तक दिल्ली दिवाली दुनिया इन दिनों दुलाराम सहारण दुलाराम सारण दुष्यंत जोशी दूरदर्शन दूरदर्शन जयपुर देशनोक करणी मंदिर दैनिक भास्कर दैनिक हाईलाईन सूरतगढ़ नगर निगम बीकानेर नगर विरासत सम्मान नंद भारद्वाज नमामीशंकर आचार्य नवनीत पाण्डे नवलेखन नागराज शर्मा नानूराम संस्कर्ता निर्मल वर्मा निवेदिता भावसार निशांत नीरज दइया नेगचार नेगचार पत्रिका पठक पीठ पत्र वाचन पत्र-वाचन पत्रकारिता पुरस्कार परख पाछो कुण आसी पाठक पीठ पारस अरोड़ा पुण्यतिथि पुरस्कार पुस्तक समीक्षा पोथी परख फोटो फ्लैप मैटर बंतळ बलाकी शर्मा बातचीत बाल साहित्य बाल साहित्य पुरस्कार बाल साहित्य सम्मेलन बिणजारो बिना हासलपाई बीकानेर अंक बीकानेर उत्सव बीकानेर कला एवं साहित्य उत्सव बुलाकी शर्मा बुलाकीदास "बावरा" भंवरलाल ‘भ्रमर’ भवानीशंकर व्यास ‘विनोद’ भारत स्काउट व गाइड भारतीय कविता प्रसंग भाषण भूमिका मंगत बादल मंडाण मदन गोपाल लढ़ा मदन सैनी मधु आचार्य मधु आचार्य ‘आशावादी’ मनोज कुमार स्वामी माणक माणक : जून मीठेस निरमोही मुक्ति मुक्ति संस्था मुलाकात मोनिका गौड़ मोहन आलोक मौन से बतकही युगपक्ष रजनी छाबड़ा रवि पुरोहित राज हीरामन राजकोट राजस्थली राजस्थान पत्रिका राजस्थान सम्राट राजस्थानी राजस्थानी अकादमी बीकनेर राजस्थानी कविता राजस्थानी कविताएं राजस्थानी कवितावां राजस्थानी भाषा राजस्थानी भाषा का सवाल राजेंद्र जोशी राजेन्द्र जोशी रामपालसिंह राजपुरोहित लघुकथा लघुकथा-पाठ लालित्य ललित लोक विरासत लोकार्पण लोकार्पण समारोह विचार-विमर्श विजय शंकर आचार्य वेद व्यास व्यंग्य शंकरसिंह राजपुरोहित शतदल शिक्षक दिवस प्रकाशन श्रद्धांजलि-सभा संजय पुरोहित समाचार समापन समारोह सम्मान सम्मान-पुरस्कार सम्मान-समारोह सरदार अली पडि़हार सवालों में जिंदगी साक्षात्कार साख अर सीख सांझी विरासत सावण बीकानेर सांवर दइया सांवर दइया जयंति सांवर दइया जयंती साहित्य अकादेमी साहित्य अकादेमी पुरस्कार साहित्य सम्मान सुधीर सक्सेना सूरतगढ़ सृजन साक्षात्कार हम लोग हरीश बी. शर्मा हिंदी अनुवाद हिंदी कविताएं

स्मृति में यह संचयन "नेगचार"

स्मृति में यह संचयन "नेगचार"
श्री सांवर दइया; 10 अक्टूबर,1948 - 31 जुलाई,1992
© Dr. Neeraj Daiya. Powered by Blogger.

कविता रो क

कविता रो क

आंगळी-सीध

Google+ Followers